एड्स पर निबंध – Aids Essay In Hindi

Aids Essay In Hindi

एड्स पर निबंध – Essay On Aids In Hindi

रहमिन बहुभेषज करत, व्याधि न छाँड़त साथ।
खग मृग बसत अरोग वन, हरि अनाथ के नाथ।।

कवि रहीम की ये पक्तियाँ उस समय जितनी प्रासंगिक थी, उतनी या उससे कहीं अधिक आज भी प्रासंगिक हैं। विज्ञान के कारण भले ही नाना प्रकार की चिकित्सा सुविधाएँ बढ़ी हैं पर नयी-नयी बीमारियों के कारण मनुष्य पूरी तरह चिंता मुक्त नहीं हो पाया। कुछ बीमारियाँ थोड़े-से इलाज से ठीक हो जाती हैं तो कुछ थोड़े अधिक इलाज से, परंतु कुछ बीमारियाँ ऐसी हैं जो थोड़ी लापरवाही के कारण जानलेवा साबित हो जाती हैं। ऐसी ही एक बीमारी है-एड्स।

एड्स-कारण और निवारण – (Aids-Kaaran Aur Nivaaran)

विश्व के अनेक देशों की तरह भारत भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। हमारे देश में लाखों लोग एच० आई० वी० के संक्रमण से पीड़ित हैं। दुर्भाग्य से युवा और लड़के भी इससे संक्रमित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 3 करोड़, 61 लाख वयस्क इससे पीड़ित हैं। वहीं 14 लाख बच्चे भी संक्रमणग्रस्त पाए गए हैं।

इसकी बढ़ती गति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1991 में यह संख्या आधी थी। देश के जिन राज्यों में इसके रोगियों की संख्या अधिक है उनमें आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र, नागालैंड और मणिपुर प्रमुख हैं। इस रोग के संक्रमण से 75% से अधिक पुरुष हैं जिनमें से 83% को यह यौन कारणों से हुआ है।

अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिणी भाग में 38 लाख के करीब लोग इसके शिकार बन गए। वहाँ एच० आई० वी० और एड्स से प्रभावितों की संख्या ढाई करोड़ पार कर चुकी है। सही बात तो यह है कि एड्स ने अपने पैर दुनिया भर में पसार दिया है।

किसी देश-विशेष को ही नहीं वरन् विश्व को एकजुट होकर इसके निवारण के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए। एड्स एक भयंकर एवं लगभग लाइलाज बीमारी है जो एच० आई० वी० नामक वायरस से फैलती है। एड्स (AIDS) का पूरा नाम (Acquired) (एक्वायर्ड), I (Immuno)(इम्यूनो), D (Deficiency)(डिफेसेंसी) और S (Syndrome) (सिंड्रोम) है।

वास्तव में एड्स बहुत-से लक्षणों का समूह है जो शरीर की रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देता है, जिससे संक्रमित व्यक्ति को आसानी से कोई भी बीमारी हो जाती है और रोगी असमय काल-कवलित हो जाता है।

एच० आई वी० वायरस जब एक बार किसी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है तो इस संक्रमण के लक्षण सात से दस साल तक प्रकट नहीं होते हैं और व्यक्ति स्वयं को भला-चंगा महसूस करता है। उसे स्वयं भी इस संक्रमण का ज्ञान नहीं होता है, किंतु जब संक्रमण अपना असर दिखाता है तो व्यक्ति रोगग्रस्त हो जाता है।

एच० आई० वी० संक्रमित व्यक्ति का इलाज असंभव होता है। उसकी जिंदगी उस नाव के समान हो जाती है जिसका खेवनहार केवल ईश्वर ही होता है। किसी स्वस्थ व्यक्ति को एड्स किन कारणों से हो सकता है, इसकी जानकारी लोगों में विशेषकर युवाओं को जरूर होनी चाहिए। एड्स को यौन रोग की संज्ञा दी गई है, क्योंकि यह रोग एच० आई० वी० संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संबंध स्थापित करने से होता है।

यदि महिला एच० आई० बी० संक्रमित है तो संबंध बनाने जाले पुरुष को और यदि पुरुष संक्रमित है तो संबंधित महिला को एड्स होने की संभावना हो जाती है। इसके प्रसार का दूसरा कारण है-दूषित सुइयों कर प्रयोग।

जब कोई डॉक्टर किसी एच० आई० वी० संक्रमित व्यक्ति को सुई लगाता है और उसी सुई का प्रयोग स्वस्थ व्यक्ति के लिए करता है तो यह रोग फैलता है। मादक पदार्थों का सुई द्वारा सेवन करने से भी एड्स फैलने की संभावना बनी रहती है। एड्स फैलने का तीसरा कारण है-संक्रमित रोगी का रक्त स्वस्थ व्यक्ति को चढ़ाना। इसके फैलने का चौथा और अंतिम कारण है-एच० आई वी० संक्रमित माता द्वारा बच्चे को स्तनपान कराना।

जिस व्यक्ति को एड्स हो जाता है उसके शरीर के वजन में धीरे-धीरे कमी आने लगती है। उसके बगल, गर्दन और जाँघों की ग्रंथियों में सूजन आ जाती है। बुखार होने के साथ मुँह और जीभ पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं। ये लक्षण अन्य रोग के भी हो सकते हैं, अत: इसकी पुष्टि करने के लिए एलिसा टेस्ट (Elisa Test) तथा वेस्टर्न ब्लाक (Westem Block) नामक खून की जाँच द्वारा की जाती है।

इन जाँचों द्वारा पुष्टि होने पर ही किसी व्यक्ति को एड्स का रोगी समझना चाहिए। समूचा विश्व 1 दिसंबर को प्रतिवर्ष एड्स दिवस मनाता है। एड्स का अंतर्राष्ट्रीय प्रतीक लाल फीता (रिबन) है जिसे पहनकर लोग इसके विरुद्ध अपनी वचनबद्धता दर्शाते हैं।

एड्स दिवस दुनिया के सभी देशों के बीच एकजुट होकर प्रयास करने तथा इसके खिलाफ एकजुटता विकसित करने का संदेश देता है। अब समय आ गया है कि लोगों को एड्स के बारे में भरपूर जानकारी दी जाए। एड्स के विषय में जानकारी ही इसका बचाव है। युवाओं और छात्रों को इसके विषय में अधिकाधिक जानकारी दी जानी चाहिए।

आम लोगों के बीच कुछ भ्रांतियाँ फैली हैं कि यह छुआछूत की बीमारी है, जबकि सच्चाई यह है कि एड्स साधारण संपर्क करने से, हाथ मिलाने, गले लगाने, संक्रमित व्यक्ति के साथ उठने-बैठने से नहीं फैलता है। अत: हमारा कर्तव्य बन जाता है कि संक्रमित व्यक्ति या एड्स रोगी की उपेक्षा न करें तथा उसका साथ देकर उसका मनोबल बढ़ाने का प्रयास करें। आइए, हम सब मिलकर लोगों को जागरूक बनाएँ तथा पूरी जानकारी दें, क्योंकि जानकारी ही इसका बचाव है।

भूकंप पर निबंध – Earthquake Essay In Hindi

Earthquake Essay In Hindi

भूकंप पर निबंध – Essay On Earthquake In Hindi

यद्यपि प्राकृतिक आपदा जब भी गुस्सा दिखाती है तो कहर ढहाए बिना नहीं मानती है। आकाश तारों को छू लेने वाला विज्ञान प्राकृतिक आपदाओं के समाने विवश है। अनेक प्राकृतिक आपदाओं में कई आपदाएँ मनुष्य की अपनी दैन हैं। कुछ वर्षों में प्रकृति के गुस्से के जो रूप दिखे हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता है कि प्रकृति के क्षेत्र में मनुष्य जब-जब हस्तक्षेप करता है तो उसका ऐसा ही परिणाम होता है जो सुनामी के रूप में और गुजरात के भयावह भूकंप के रूप में देखने और सुनने में आया।

इन दृश्यों को देखकर अनायास ही लोगों के मुँह से निकल पड़ता है कि जनसंख्या के संतुलन को बनाए रखने के लिए प्रकृति में ऐसी हलचल होती रहती है, जो अनिवार्य रूप में हमेशा से होती रही है। वर्षा का वेग बाढ़ बनकर कहर ढहाता है तो कभी ओला, तूफान, आँधी और सूखा आदि के रूप में प्रकृति मनुष्यों को अपनी चपेट में लेती है। अपनी प्रगति का डींग हाँकने वाला विज्ञान और वैज्ञानिक यहाँ असहाय दिखाई देते हैं अर्थात् प्राकृतिक आपदाओं से संघर्ष करने की मनुष्य में सामथ्र्य नहीं है।

धरती हिलती है, भूचाल आता है। जब यही भूचाल प्रलयंकारी रूप ले लेता है, तो भूकंप कहलाता है। सामान्य भूकंप तो जहाँ-तहाँ आते रहते हैं, जिनसे विशेष हानि नहीं होती है। जब जोर का झटका आता है तो गुजरात के दृश्य की पुनरावृत्ति होती है। ये भूकंप क्यों होता है, कहाँ होगा, कब होगा? वैज्ञानिक इसका सटीक उत्तर अभी तक नहीं दे सके हैं।

हाँ भूकंप की तीव्रता को नापने का यंत्र विज्ञान ने जैसे-तैसे बना लिया है। सर्दी से बचने के लिए हीटर लगाकर, गर्मी से बचने के लिए वातानुकूलित यंत्र लगाकर, प्रकृति को अपने अनुकूल बनाने में सामान्य सफलता प्राप्त कर ली है, पर वर्षों के प्रयास के बावजूद भी इससे निजात पाने की बात तो दूर उसके रहस्यों को भी नहीं जान पाया है। यह उसके लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है। कुछ आपदाएँ तो मनुष्य की देन हैं।

अनुमानित वैज्ञानिक घोषणाओं के अनुसार अंधाधुंध प्रकृति को दोहन और पर्यावरण का तापक्रम बढ़ने से धरती के अंदर हलचल होती है और यह हलचल तीव्र हो जाती है तो भूकंप के झटके आने लगते हैं। धरती हिलने या भूकंप के बारे में अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। कुछ धार्मिक व्याख्याओं के कारण यह धरती सप्त-मुँह वाले नाग के सिर पर टिकी है। जब नाग सिर बदलता है तो धरती हिलती है।

दूसरी किंवदंती है कि धरती धर्म की प्रतीक गाय के सींग पर टिकी है और जब गाय सींग बदलती है तो तब धरती हिलती है। कुछ धर्माचार्यों का मानना है कि जब पृथ्वी पर पाप-स्वरूप भार अधिक बढ़ जाता है तो धरती हिलती है और जहाँ पाप अधिक वहाँ धरती कहर ढहा देती है। इसके विपरीत वैज्ञानिक का मानना है कि पृथ्वी की बहुत गहराई में तीव्रतम आग है।

जहाँ आग है वहाँ तरल पदार्थ है। आग के कारण पदार्थ में इस तरह की हलचल होती रहती है। जब यह उथल-पुथल अधिक बढ़ जाती है तब झटके के साथ पृथ्वी की सतह से ज्वालामुखी फूट पड़ता है। पदार्थ निकलने की तीव्रता के अनुसार पृथ्वी हिलने लगती है। इनमें से कोई भी तथ्य हो, परंतु ऐसे दैवीय-प्रकोप से अभी सुरक्षा का कोई साधन नहीं है।

मनुष्य-जाति के अथक प्रयास से निर्मित, संचित सभ्यता एक झटके में मटियामेट हो जाती है। सब-कुछ धराशायी हो जाता है। वहाँ जो बच जाते हैं, उनमें हाहाकार मच जाती है। राजा और रंक लगभग एकसमान हो जाते हैं क्योंकि ऐसे दैवीय प्रकोप बिना किसी संकोच और भेदभाव के समान रूप से पूरी मानवता पर कहर ढहा देती है।

गुजरात में एकाएक, तीव्रगति से भूकंप हुआ। इस भूकंप ने शायद गुस्से से दिन चुना गणतंत्र दिवस 26 जनवरी। संपूर्ण देश गणतंत्र के राष्ट्रीय उत्सव में मग्न था। गुजरात के लोग दूरदर्शन पर गणतंत्र दिवस का कार्यक्रम को देख रहे थे। तभी एकाएक झटका लगा धरती हिली। ऐसा लगा कि लंबे समय से धरती अपने गुस्से को दबाए हुए थी। आज उसका गुस्सा फूट पड़ा।

ऐसा फूटा कि लोग सोच भी न पाए कि क्या हुआ और थोड़ी ही देर में गगनचुंबी अट्टालिकाएँ, अस्पताल, विद्यालय, फैक्टरी और टेलीविजन के सामने बैठी भीड़ को उसने निगल लिया। शेष रह गई उन लोगों की चीत्कार, जो उसकी चपेट में आने से बच गए थे। बचने वाले लोगों के लिए सरकारी सहायता पहुँचने लगी। यह सहायता कुछ के हाथ लगी और कुछ वंचित रह गए।

वितरण की समुचित व्यवस्था न हो सकी। प्राकृतिक आपदा आकस्मिक रूप से अपना स्वरूप दिखाती है। ऐसे समय में मानवीय चरित्र के भी दर्शन होते हैं।

मानवता के नाते ऐसी आपदाओं में मनुष्य एकजुट होकर आपदा-ग्रसित लोगों का धैर्य बँधते हैं कि हम तुम्हारे साथ हैं। हम यथासंभव और यथासामथ्र्य तुम लोगों की सहायता करने के लिए तत्पर हैं। इस तरह टूटता हुआ धैर्य, ढाढस पाकर पुन: पुनर्जीवित हो उठता है। ऐसे समय में ढाढ़स की आवश्यकता भी होती है। यह मानवीय चरित्र भी है।

किंतु आश्चर्य तो तब होता है जब इस प्रकार के भयावह दृश्य को देखते हुए भी कुछ लोग अमानवीय कृत्य यानी पीड़ित लोगों के यहाँ चोरी, लूट आदि करने में भी संकोच नहीं करते हैं। एक ओर तो देश के कोने-कोने से और दूसरे देशों से सहायता पहुँचती है और दूसरी ओर व्यवस्था के ठेकेदार उसमें भी कंजूसी करते हैं और अपनी व्यवस्था पहले करने लगते हैं। ऐसे लोग ऐसे समय में मानवता को ही कलंकित करते हैं।

गुजरात में भूकंप के समय समाचार-पत्रों ने लिखा कि बहुत सी समाग्रियाँ वितरण की समुचित व्यवस्था न होने से बेकार हो गई। ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ मनुष्य को संदेश देती हैं कि जब-तक जिओ, तब-तक परस्पर प्रेम से जिओ। मैं कब कहर बरपा दूँ। उसका मुझे भी पूर्ण ज्ञान नहीं है।

प्राकृतिक आपदा गीता के उस संदेश को दोहराती है कि कर्म करने में तुम्हारा अधिकार है फल में नहीं। यह प्राकृतिक आपदा मनुष्य को सचेत करती है और संदेश देती है कि मैं मौत बनकर सामने खड़ी हूँ। जब तक जी रहे हो तब तक मानवता की सीमा में रहो और जीवन को आनंदित करो. निश्चित और सात्विक रहो।

बिनु भय होय न प्रीति पर निबंध – Binu Bhaya Hot Na Preet Essay In Hindi

Binu Bhaya Hot Na Preet Essay In Hindi

बिनु भय होय न प्रीति पर निबंध – Essay On Binu Bhaya Hot Na Preet In Hindi

प्राय: कहा जाता है कि मिमियाते बकरे कसाई के हृदय में परिवतन नहीं कर सकते और घिघियाते मनुष्य दुष्टों के हृदय में करुणा नहीं जगा सकते हैं। दया-ममता का उपदेश कोई नहीं सुनता है। भय के बिना तो प्रीति का राग नहीं सुना जा सकता। संसार में चमत्कार को नमस्कार किया जाता है।

भय बिनु होइ न प्रीति (Binu Bhaya Hot Na Preet) – Fear without preaching

आज मनुष्य की विनम्रता को उसका संस्कार नहीं, अपितु उसकी कमजोरी समझी जाने लगी है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय स्तर पर विचार किया जाए कि भारत की विनम्रता या भारत की अहिंसावादी नीति को इसकी कमजोरी समझ कर पाकिस्तान कभी सीमा-उल्लंघन तो कभी आतंकवादी-घुसपैठ या अन्य हरकतें करता रहता है।

उसकी इस दुष्प्रवृत्ति में निरंतर वृद्ध होती जा रही है जिसका मुख्य कारण राजनैतिक इच्छाशक्ति व दृढ़ता में कमी है। ऐसी ही प्रवृत्ति के प्रतीक समुद्र से तीन दिन तक श्री राम रास्ता देने के लिए विनम्रतापूर्वक अनुरोध करते रहे परंतु समुद्र पर कोई असर नहीं पड़ा। फलस्वरूप उनका पौरुष धधक उठा और उन्होंने लक्ष्मण से अग्निबाण लाने के लिए कहा-

विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब , भय बिनु होई न प्रीति।
लक्ष्मण बाणा सरासन आना
सोखौं बारिधि बिसिखि कृसाना।

अन्याय का विरोध न होने पर उसका प्रचार-प्रसार बढ़ता जाता है। धीरे-धीरे वह इतना प्रचार-प्रसार पा लेता है कि फिर उसको रोकना कठिन हो जाता है और जन-जीवन को इतना संत्रस्त कर देता है कि लोगों का जीवन जीना दूभर हो जाता है। समयोपरांत प्रबुद्ध-वर्ग भी अन्यायी का मुँह कुचलने की हिमायत करता है।

वह चाहता है कि येन-केन प्रकारेण अन्यायी का सिर इस प्रकार कुचल दिया जाए कि वह फिर कभी सिर न उठा सके। न्याय और सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए भी उचित है कि अन्यायी का प्रतिकार दंड से किया जाए, क्योंकि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं।

भारतीय समाज अपनी घिघियाने की प्रवृत्ति और निरीहता को प्रदर्शित कर शत्रुओं को आक्रमण के लिए आमंत्रित करता रहा है। इतिहास-प्रसिद्ध घटना ‘सोमनाथ’ के मंदिर की प्रतिष्ठा लोगों की प्रार्थना, चीख और करुण-क्रदन के कारण जाती रही।

आक्रांता सबको पद्दलित कर लूटकर चला गया। लोगों की चीख-पुकार ने आक्रांता के कार्य को सरल तथा सुगम बना दिया। इसलिए अन्याय के सम्मुख सिर झुकाकर अपना स्वत्व छोड़ देना मनुष्य धर्म नहीं है, अपितु कायरता ही है।

मनुष्य कुछ हद तक तो सामान्य स्थितियों तक अन्याय को सहन कर सकता है, किंतु अन्याय सिर पर चढ़कर बोलने लगता है या आसमान को छूने लगता है तो सामान्य आदमी भी प्रतिकार करने के लिए खड़ा हो जाता है। अंत: हृदय से यही अवाज निकलती है कि अन्याय को सहन करना कायरतापूर्ण अधर्म है और अन्याय का प्रतिकार करना मानव-धर्म है।

अन्याय को सहन कर लेने से अपराधी के अपराध बढ़े हैं, घटे नहीं हैं। असहाय अवस्था में अन्याय के प्रति सहिष्णुता विवशता है, किंतु निरंतर विवश बने रहना निष्क्रियता और दब्बूपन ही है। अन्याय का विरोध न्याय ही कहा जा सकता है। न्याय का पक्ष मनुष्य को युद्ध की स्थिति तक भी ले जा सकता है।

महाभारत का युद्ध अन्याय के विरोध के लिए ही तो था। अपराधों को सहन करना या उसका विरोध न करना, अनदेखा करना उसको बढ़ावा देना है। कभी-कभी तो इतना दुष्परिणाम देने वाला होता है जिसका खामियाजा सदियों तक भुगतना पड़ता है।

अंग्रेजों का प्रतिकार न होने से सदियों तक अंग्रेजों के पैरों तले भारतीय कुचले जाते रहे। अन्याय का विरोध उचित है, किंतु उसके विरोध के लिए मजबूत साहस की आवश्यकता होती है। मानव का मनोबल अन्याय और अन्यायी को धराशायी करने में सहायता देता है।

दुष्ट की दुष्टता तब तक विराम नहीं लेती है जब-तक उसका मुकाबला डटकर नहीं किया जाता है। हालाँकि मुकाबला करने के लिए मनोबल और उत्साह की आवश्यकता होती है। दुष्ट तब तक भयावह दिखाई देता है जब तक उसके शरीर पर जख्म नहीं होता है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी के उत्साह और सकारात्मक सोच ने पाक की रोज बढ़ती हुई उच्छुखलता पर जो निशान दिए, उसके बाद दशकों तक पाकिस्तान ने कोई गलती नहीं की। दुष्ट-जनों को सबक सिखाने के लिए स्वयं सामथ्र्यवान होना बहुत जरूरी है। आचार्य चाणक्य ने कहा है कि पैर में मजबूत जूता होने पर काँटे को कुचलते हुए चलो जिससे किसी और के न चुभ जाए और जूता कमजोर है तो रास्ता बदल कर चले जाना ही उचित है। शस्त्रों से सुसज्जित होने पर भी साहस और मनोबल के अभाव में बड़े-बड़े आततायी उदित होकर स्वयं अस्त हो जाते हैं। पाक के साथ ऐसा ही हुआ था कि अमेरिका से खैरात में मिले युद्ध-विमानों के होते हुए भी प्राकृतिक मनोबल के अभाव में भारत-पाक युद्ध के दौरान मुँह की खाकर रह गया। दार्शनिकों का विचार है कि दुष्टों के साथ प्रीति तभी तक सार्थक होती है जब तक वे भय के सानिध्य में रहते हैं।

परिस्थितियों का आकलन करते हुए दुष्ट की दुष्टता का प्रतिकार करना सामाजिक और पुण्यात्मक कृत्य है। ऐसा न होने पर दृष्ट की दुष्टता समाज और राष्ट्र के लिए त्रासदी बन जाती है और इतनी बड़ी त्रासदी कि जिसकी बहुत बड़ी कीमत मानव समाज को चुकानी पड़ती है। जीवन कठिन हो जाता है। मानवता, सहिष्णुता कलकित हो जाती है। प्रमाणस्वरूप इतिहास के पृष्ठों का अवलोकन करें तो चंगेज, तैमूर, मुसोलिनी आदि के रूप में ये दुष्ट शक्तियाँ आम नागरिक को समय-समय पर परेशान करती रही हैं। तत्कालिन मानव-समाज द्वारा प्रतिकार न करना ही इसका मुख्य कारण रहा है। कलम का सिपाही होने के नाते हमारे देश के कवियों व लेखकों ने इन दुष्ट लोगों के विरोध में अपनी लेखनी के माध्यम से जनमत तैयार करने का काम किया है। उनका कहना है कि क्षमाशील होना अच्छी बात तब है जब आप समर्थवान है अन्यथा आप निरीह हैं। यदि आप समर्थवान हैं फिर भी विरोध नहीं करते हैं तो भी आपको कायर समझा जाएगा। दिनकर जी ने भी कहा है

क्षमा शोभती उसी भुजंग को
जिस के पास गरल हो।

त्योहारों का बदलता स्वरूप निबंध – Parvo Ka Badalta Swaroop Essay In Hindi

Parvo Ka Badalta Swaroop Essay In Hindi

त्योहारों का बदलता स्वरूप निबंध – Essay On Parvo Ka Badalta Swaroop In Hindi

भारतीय स्वभावत: उत्सवप्रिय होते हैं। वे समय-असमय उत्सव मनाने का बहाना खोज लेते हैं। यह उनके स्वभाव में प्राचीन काल से शामिल रहा है। मनुष्य अपने थके-हारे मन को पुन: स्फूर्ति तथा उल्लासमय बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के पर्व मनाता रहा है। मनुष्य के जीवन में पर्वो का महत्वपूर्ण स्थान है, क्योंकि ये मानव-जीवन को खुशियों से भर देते हैं तथा हमें निराशा एवं दुख से छुटकारा दिलाते हैं। वास्तव में पर्व सांस्कृतिक चेतना के वाहक हैं।

पर्वों का बदलता स्वरूप (Parvon Ka Badalata Svaroop) – Changing nature of festivals

भारत में आए दिन कोई-न-कोई पर्व और त्योहार मना लिया जाता है। यहाँ कभी महापुरुषों की प्रेरणाप्रद पुण्यतिथियों तथा जयंतियों का आयोजन किया जाता है तो कभी ऋतु मौसम, महीने के आगमन और प्रस्थान पर पर्व मनाए जाते हैं। साथ ही धार्मिक तथा क्षेत्रीय पर्व एवं त्योहर भी मनाए जाते हैं।

इनमें से राष्ट्रीय और धार्मिक पर्व विशेष महत्व रखते हैं। कुछ पर्व ऐसे होते हैं, जिन्हें सारा देश बिना किसी भेदभाव के मनाता है और इनको मनाने का तरीका भी लगभग एक-सा होता है। ये राष्ट्रीय पर्व कहलाते हैं।

स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती (2 अक्टूबर) को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। इनके अलावा कुछ त्योहार धर्म के आधार पर मनाए जाते हैं। इनमें से कुछ को हिंदू मनाते हैं तो मुसलमान नहीं और मुसलमान मनाते हैं तो सिख या इसाई नहीं, क्योंकि ये उनके धर्म से संबंधित होते हैं। दीपावली, दशहरा, रक्षाबंधन, होली, मकर संक्राति तथा वसंत पंचमी हिंदुओं से संबंधित पर्व या त्योहार माने जाते हैं तो, ईद-उल-जुहा, बकरीद, मोहर्रम आदि मुसलिम धर्म मानने वालों के त्योहार हैं।

बैसाखी. लोहिड़ी सिख धर्म से संबंधित त्योहार हैं तो क्रिसमस ईसाई धर्म मानने वालों का त्योहार है। भारत में पर्व मनाने की परंपरा कितनी पुरानी है, इस संबंध में सही-सही कुछ नहीं कहा जा सकता है। हाँ, त्योहारों में एक बात जरूर हर समय पाई जाती रही है कि इनके मूल में एकता, हर्ष, उल्लास तथा उमंग का भाव निहित रहा है। त्योहारों को मनाने के पीछे कोई-न-कोई घटना या कारण अवश्य रहता है, जो हमें प्रतिवर्ष इसे मनाने के लिए प्रेरित करता है।

उदाहरणार्थ-दीपावली के दिन भगवान रामचंद्रजी के वनवास की अवधि बिताकर अयोध्या वापस आए तो लोगों ने खुश होकर घी के दीप जलाकर उनका स्वागत किया। उसी घटना की याद में आज भी प्रतिवर्ष घी के दीपक जलाकर उस घटना की याद किया जाता है और खुशी प्रकट की जाती है। बाजार के प्रभाव के कारण हमारा जीवन काफी प्रभावित हुआ है, तो हमारे पर्व इसके प्रभाव से कैसे बच पाते। पर्वो पर बाजार का व्यापक प्रभाव पड़ा है।

पहले बच्चे राम लीला करने या खेलने के लिए अपने आसपास उपलब्ध साधनों से धनुष-बाण, गदा आदि बना लेते थे, चेहरे पर प्राकृतिक रंग आदि लगाकर किसी पात्र का अभिनय करते थे, पर आज धनुष-बाण हो या गदा, मुखौटा हो या अन्य सामान सभी कुछ बाजार में उपलब्ध है।

इसी प्रकार दीपावली के पर्व पर मिट्टी के दीप में घी या तेल भरकर दीप जलाया जाता था, बच्चों के खेल-खिलौने भी मिट्टी के बने होते थे, पर आज मिट्टी के दीप की जगह फैसी लाइटें, मोमबत्तियाँ तथा बिजली की रंग-बिरंगी लड़ियों ने ले ली है।

बच्चों के खिलौनों से बाजार भरा है। सब कुछ मशीन निर्मित हैं। रंग-बिरंगी आतिशबाजियाँ कितनी मनमोहक होती हैं. यह बताने की आवश्यकता नहीं है। सब बाजार के बढ़ते प्रभाव का असर है। कोई भी पर्व या त्योहार हो उससे संबंधित काडों से बाजार भरा है। समय की गति और युग-परिवर्तन के कारण युवकों के धार्मिक सोच में काफी बदलाव आया है।

युवाओं का प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति लगाव कम होता जा रहा है। वे विदेशी संस्कृति, रीति-रिवाज, फैशन को महत्व देने लगे हैं। इस कारण आज हमारे समाज में पाश्चात्य पर्वो को स्वीकृति मिलती जा रही है।

युवाओं का ‘वेलेंटाइन डे’ मनाने के प्रति बढ़ता क्रेज इसक: जीता-जागता उदाहरण है। आज की पीढ़ी को परंपरागत भारतीय त्योहारों की जानकारी भले न हो पर वे पाश्चात्य पर्वो की जरूर जानते हैं। पर्वो-त्योहरों के मनाने के तौर-तरीके और उनके स्वरूप में बदलाव आने का सबसे प्रमुख कारण मनुष्य के पास समय का अभाव है। आज मनुष्य के पास दस दिन तक बैठकर राम-लीला देखने का समय नहीं है।

वे महँगाई की मार से परेशान हैं उनके लिए दो जून की रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है। जिनके पास मूलभूत सुविधाएँ हैं वे सुखमय जीवन जीने की लालसा में दिन-रात व्यस्त रहते हैं और पर्व-त्योहार के लिए भी मुश्किल से समय निकाल पाते हैं। बदलते समय के साथ-साथ पर्व-त्योहार के स्वरूप में बदलाव आया है। महँगाई, समयाभाव, बाजार के बढ़ते प्रभाव ने इन्हें प्रभावित जरूर किया है, पर इनकी उपयोगिता हमेशा बनी रहेगी। इनके बिना जीवन सूखे रेगिस्तान के समान हो जाएगा।

मनोरंजन के साधन पर निबंध – Manoranjan Ke Sadhan Essay In Hindi

Manoranjan Ke Sadhan Essay In Hindi

मनोरंजन के साधन पर निबंध – Essay on Manoranjan Ke Sadhan In Hindi

मनुष्य कर्मशील प्राणी है। जीवन की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वह कर्म में लीन रहता है। काम की अधिकता उसके जीवन में नीरसता लाती है। नीरसता से छुटकारा पाने के लिए उसे मनोविनोद की आवश्यकता होती है। इसके अलावा काम के बीच-बीच में उसे मनोरंजन मिल जाए तो काम करने की गति बढ़ती है तथा मनुष्य का काम में मन लगा रहता है।

मनोरंजन के साधन (Manoranjan Ke Sadhan) – Recreation Equipment

मनुष्य ने जब से विकास की ओर कदम बढ़ाया, उसी समय से उसकी आवश्यकता बढ़ती गई। दूसरों के सुखमय जीवन से प्रतिस्पर्धा करके उसने अपनी आवश्यकताएँ और भी बढ़ा लीं, जिसके कारण उसे न दिन को चैन है न रात को आराम। ऐसे में उसका मस्तिष्क, तन, मन यहाँ तक कि उसका अंग-अंग थक जाता है।

एक ही प्रकार की दिनचर्या से मनुष्य उकता जाता है उसे अपनी थकान मिटाने और जी बहलाने के लिए मनोरंजन की आवश्यकता होती है, जो उसकी थकान भगाकर उसके मन को पुन: उत्साह एवं उमंग से भर देता है। यही कारण है कि मनुष्य आदि काल से ही किसी-न-किसी रूप में अपना मनोरंजन करता आया है।

मानव ने प्राचीन काल से ही अपने मनोरंजन के साधन खोज रखे थे। अपने मनोविनोद के लिए पक्षियों को लड़ाना, विभिन्न जानवरों को लड़ाना, रथों की दौड़, धनुष-बाण से निशाना लगाना, लाठी-तलवार से मुकाबला करना, कम तथा बड़ी दूरी की दौड़, वृक्ष पर चढ़ना, कबड्डी, कुश्ती, गुल्ली-डंडा, गुड्डे-गुड़ियों का विवाह, रस्साकशी करना, रस्सी कूदना, जुआ, गाना-बजाना, नाटक करना, नाचना, अभिनय, नौकायन, भाला-कटार चलाना, शिकार करना, पंजा लड़ाना आदि करता था। मनुष्य के जीवन में विकास के साथ-साथ मनोरंजन के साधनों में भी बदलाव आने लगा।

आधुनिक युग में मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध हैं। यह तो मनुष्य की रुचि, सामथ्र्य आदि पर निर्भर करता है कि वह इनमें से किनका चुनाव करता है। विज्ञान ने मनोरंजन के क्षेत्र में हमारी सुविधाएँ बढ़ाई हैं। रेडियो पर हम लोकसंगीत, फिल्म संगीत, शास्त्रीय संगीत का आनंद लेते हैं तो सिनेमा हॉल में चित्रपट पर विभिन्न फिल्मों का। इसके अलावा ताश, शतरंज, सर्कस, प्रदर्शनी, फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, टेनिस, खो-खो, बैडमिंटन आदि ऐसे मनोरंजन के साधन हैं, जो स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद हैं।

हमारे सामने आजकल मनोरंजन के अनेक विकल्प मौजूद हैं, जिनमें से अपनी रुचि के अनुसार साधन अपनाकर हम अपना मनोरंजन कर सकते हैं। आज कवि सम्मेलन सुनना, ताश एवं शतरंज खेलना, फिल्म देखना, रेडियो सुनना, विभिन्न प्रकार के खेल खेलना तथा संगीत सुनकर मनोरंजन किया जा सकता है। सिनेमा हॉल में फिल्म देखना एक लोकप्रिय साधन है।

मजदूर या गरीब व्यक्ति कम कमाता है, फिर भी वह समय निकालकर फिल्म देखने अवश्य जाता है। युवकों से लेकर वृद्धों तक के लिए यह मनोरंजन का सबसे लोकप्रिय साधन है। आज मोबाइल फोन पर गाने सुनने का प्रचलन इस प्रकार बढ़ा है कि युवाओं को कानों में लीड लगाकर गाने सुनते हुए देखा जा सकता है।

मनोरंजन करने से मनुष्य अपनी थकान, चिंता, दुख से छुटकारा पाता है या यूँ कह सकते हैं कि मनोरंजन मनुष्य को खुशियों की दुनिया में ले जाते हैं। उसे उमंग, उत्साह से भरकर कार्य से छुटकारा दिलाते हैं। बीमारियों में दर्द को भूलने का उत्तम साधन मनोरंजन है। यह मनुष्य को स्वस्थ रहने में भी मदद करता है।

‘अति सर्वत्र वर्जते’ अर्थात् मनोरंजन की अधिकता भी मनुष्य को आलसी एवं अकर्मण्य बनाती है। अत: मनुष्य अपने काम को छोड़कर आमोद-प्रमोद में न डूबा रहे अन्यथा मनोरंजन ही उसे विनाश की ओर ले जा सकता है। हमें मनोरंजन के उन्हीं साधनों को अपनाना चाहिए, जिससे हमारा चरित्र मजबूत हो तथा हम स्वस्थ बनें।

भाग्य और पुरुषार्थ पर निबंध – Bhagya Aur Purusharth Essay In Hindi

Bhagya Aur Purusharth Essay In Hindi

भाग्य और पुरुषार्थ पर निबंध – Essay On Bhagya Aur Purusharth In Hindi

भाग्य और पुरुषार्थ दोनों सहोदर, किंतु वैचारिक और व्यावहारिक स्वभाव से विपरीत प्रवृत्ति वाले हैं। दोनों में संघर्ष होता रहता है। दोनों ही अपना वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास करते हैं। जहाँ भाग्य ने स्थान बना लिया वहाँ मनुष्य अकर्मण्य और आलसी बन जाता है और अपने भाग्य को कोसता है। परिस्थितियों का दास बनता जाता है। अनेक विषमताओं से घिर जाता है।

पुरुषार्थ और भाग्य दैव दैव आलसी पुकारा – Purushaarth Aur Bhaagy Daiv-Daiv Aalasee Pukaara

आगे कदम बढ़ाने में डरने लगता है। दूसरी ओर पुरुषार्थ के स्थान पा लेने पर मनुष्य साहसी हो जाता है। कर्म करने में अधिकार समझता है। विषमताओं को भी धता बताते हुए आगे बढ़ता है। परिस्थितियाँ उसकी दास हो जाती हैं। प्रसन्न रहता है, सफलताएँ उसके चरण चूमने को आतुर रहती हैं। इस तरह हर मनुष्य के विचारों में द्वंद्व चलता है। मनुष्य की प्रवृत्ति के अनुसार ही भाग्य और पुरुषार्थ में से कोई स्थान बनाने में सफल हो जाता है।

जीवन में सफलता भाग्य के आधार पर नहीं मिलती है, अपितु पुरुषार्थ से मिलती है। हमारे जीवन में अनेक विपत्तियाँ आती हैं। ये विपत्तियाँ हमें रुलाने के लिए नहीं, अपितु पौरुष को चमकाने के लिए आती हैं। जीवन में यदि किंचित भी भाग्य के आधार पर अकर्मण्यता ने प्रवेश पा लिया तो सफलता दूर हो जाती है। विद्वानों का विचार है कि पहाड़ के समान दिखाई देने वाली बाधाओं को देखकर विचलित होना पौरुषता का चिहन नहीं है।

हताशा, निराशा, तो कायरता के चिहन हैं। मनुष्य के अंदर वह शक्ति है जो यमराज को भी ललकार सकती है। केवल एक बार संकल्प करने की आवश्यकता होती है। असफलता की जो चट्टान सामने दिखाई देती है वह इतनी मजबूत नहीं है जो गिराई न जा सके। सिर्फ एक धक्का देने की आवश्यकता है, चकनाचूर हो जाएगी। ठहरें नहीं, रुकें नहीं, संघर्ष हमें चुनौती दे रहा है।

चुनौती स्वीकार करें और पूरी ताकत से प्रहार करें। सफलता मिल कर रहेगी। इस संबंध में भगवान श्रीकृष्ण का विचार था कि यदि तुम चाहते हो कि विजयी बनो, सफलता तुम्हारे चरण चूमे तो फिर रुकने की क्या आवश्यकता है? परिस्थितियाँ तुम्हारा क्या बिगाड़ लेंगी? विरोधी पस्थितियों से मित्रता नहीं, संघर्ष अपेक्षित है। अपने पुरुषार्थ पर विश्वास रखें। अवसर की प्रतीक्षा करें।

अवसर चूकना बुद्धमानी नहीं है। अत: याद रहे कि जलधारा के बीच पड़ा कंकड़ नदी के प्रवाह को बदल देता है। एक छोटी-सी चींटी भीमकाय हाथी की मृत्यु का कारण बन सकती है, फिर हम तो पुरुष हैं। अपने पुरुषार्थ से असंभव को संभव बना सकते हैं। जीवन में यदि संघर्ष और खतरों से खेलने की प्रवृत्ति न हो तो जीवन का आधा आनंद समाप्त हो जाता है। जिस व्यक्ति के मन में सांसारिक महत्वाकांक्षाएँ नहीं हैं उसे किसी भी प्रकार के संशय और विपदाएँ विचलित नहीं कर सकती हैं।

आत्मबल और दृढ़ संकल्प के सम्मुख तो बड़े-से-बड़ा पर्वत भी नत हो जाता है। कहा जाता है एक निर्वासित बालक श्रीराम के पौरुष के सामने समुद्र विनती करते हुए आ खड़ा हुआ, नेपोलियन बोनापार्ट के साहस को देखते हुए आल्पस पर्वत उसका रास्ता न रोक सका। महाराजा रणजीत के पौरुष को देखते हुए कटक नदी ने रास्ता दे दिया।

संसार को रौदता हुआ जब सिकंदर ने भारत में प्रवेश किया तो राजा पोरस के पौरुष को देखकर हतप्रभ रह गया और आचार्य चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य के सामने मुँह की खानी पड़ी। छत्रपति शिवाजी के सम्मुख अतुल सेना का मालिक औरंगजेब थर-थर काँपता रहा, वीरांगना झाँसी वाली रानी के शौर्य के सम्मुख अंग्रेज दाँतों तले अँगुली दबाकर रह गए।

स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में जाकर भारतीय संस्कृति की सर्वोत्कृष्टता की पताका फहराई। डॉ. हेडगेवार ने विषम परिस्थितियों में देश को राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत संगठन खड़ा किया।

लौह-पुरुष सरदार बल्लभभाई पटेल ने देश की सभी रियासतों को एक झंडे के तले खड़ा कर दिया। महात्मा-गाँधी जहाँ भी रहे, जहाँ भी गए, परिस्थितियों को चुनौती देते रहे। पुरुषार्थ से अलग भाग्यवादी लोग चलनी में दूध दुहते हैं और पश्चात्ताप करते हैं और भाग्य को कोसते हैं। भाग्यवादी मनुष्य सदैव रोता है, समय खोता है, शेखचिल्ली की कल्पना करता है, परिस्थितियों को देख घबराता है, समाज, देश, यहाँ तक कि स्वयं अपने लिए बोझ बनता है।

निराशाओं से घिरा रहता है, हाथ आए सुअवसर को भी हाथ से निकाल देता है। चलनी में दूध दुहता है। दूसरों से ईष्र्या करता है, दूसरों को दोष देता है। कल्पवृक्ष हाथ लगने की कल्पना करता है और रोता हुआ आता है; रोता हुआ चला जाता है।

जीवन निदित और तिरस्कृत होता है, कुंठित होता है। इस प्रकार सर्वथा निंदनीय और हेय होता है। संपूर्ण जीवन नारकीय बन जाता है। इतना ही नहीं परंपरा से विरासत में मिली पूर्वजों की संपत्ति, यश, समृद्ध को नष्ट कर कलकित हो जाता है। ऐसे लोगों को ही पाठ पढ़ाने की आवश्यकता होती है कि

उद्येमेन हि सिद्वायन्ति कार्याणि, न मनोरथै:
नहीं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।

हमारे सामने ऐसे अनेक उदाहरण हैं कि स्वतंत्रता के बाद जो छोटी-छोटी रियासतें थीं या कही छोटे-मोटे राजा थे, वे अपनी अतीत की परंपरा में परिवर्तन न कर सके। फलस्वरुप उन परिवारों की ओर कोई ‘आँखें’ उठाकर देखने वाला नहीं है। निरुद्यमी होने के कारण वे सड़क पर आ खड़े हुए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार दृष्टि जितनी ऊँची होगी तीर उतनी ही दूर जाएगा। पुरुषार्थ भी जितनी सही दिशा में होगा उतना ही पुरुष उन्नत होगा।

भाग्य के भरोसे बैठे रहना कायरता है, नपुंसकता है। अत: हमें ध्यान रखना चाहिए कि पुरुषार्थ मनुष्य को महान बना देता है। कार्य के प्रति निष्क्रियता मानव को पतन की ओर ले जाती है। तमिल में एक लोकोक्ति है ‘यदि पैर स्थिर रखोगे तो दुर्भाग्य की देवी मिलेगी और पैर चलेंगे तो श्री देवी मिलेगी।’ यह सटीक एवं सार्थक है।

त्योहारों पर निबंध हिंदी में – Festivals Essay In Hindi

Festivals Essay In Hindi

त्योहारों पर निबंध हिंदी में – Essay On Festivals In Hindi

श्रम से थके-हारे मनुष्य ने समय-समय पर ऐसे अनेक साधन खोजे जो उसे थकान से छुटकारा दिलाए। जीवन में आई नीरसता से उसे छुटकारा मिल सके। इसी क्रम में उसने विभिन्न प्रकार के उत्सवों और त्योहारों का सहारा लिया। ये त्योहार अपने प्रारंभिक काल से ही सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक तथा जनजागृति के प्रेरणा स्रोत हैं।

हमारे त्योहार का महत्व (Hamaare Tyohaar Ka Mahatv)- Importance of our festival

भारत एक विशाल देश है। यहाँ नाना प्रकार की विभिन्नता पाई जाती है, फिर त्योहार इस विभिन्नता से कैसे बच पाते। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराओं तथा धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रक्षाबंधन, दीपावली, दशहरा, होली, ईद, ओणम, पोंगल, गरबा, पनिहारी, बैसाखी आदि त्योहार मनाए जाते हैं। इनमें दीपावली और दशहरा ऐसे त्योहार हैं जिन्हें पूरा भारत तो मनाता ही है, विदेशों में बसे भारतीय भी मनाते हैं। बैसाखी तथा वसंतोत्सव ऋतुओं पर आधारित त्योहार हैं। इस प्रकार यहाँ त्योहारों की कमी नहीं है। आए दिन कोई-न-कोई त्योहार मनाया जाता है।

भारतवासियों को स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी माना जाता है। वह कभी प्रकृति की घटनाओं को आधार बनाकर तो कभी धर्म को आधार बनाकर त्योहार मनाता रहता है। इन त्योहारों के अलावा यहाँ अनेक राष्ट्रीय पर्व भी मनाए जाते हैं। इनसे महापुरुषों के जीवन से हमें कुछ सीख लेने की प्रेरणा मिलती है।

गाँधी जयंती हो या नेहरू जयंती इसके मनाने का उद्देश्य यही है। इस तरह त्योहार जहाँ उमंग तथा उत्साह भरकर हमारे अंदर स्फूर्ति जगाते हैं, वहीं महापुरुषों की जयंतियाँ हमारे अंदर मानवीय मूल्य को प्रगाढ़ बनाती हैं। त्योहरों के मनाने के ढंग के आधार पर इसे कई भागों में बाँटा जा सकता है।

कुछ त्योहार पूरे देश में राष्ट्रीय तथा राजनीतिक आधार पर मनाए जाते हैं; जैसे-15 अगस्त, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयंती (साथ ही लालबहादुर शास्त्री जयंती) इन्हें राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। कुछ त्योहार अंग्रेजी वर्ष के आरंभ में मनाए जाते हैं; जैसे-लोहिड़ी, मकर संक्रांति। कुछ त्योहार भारतीय नववर्ष शुरू होने के साथ मनाए जाते हैं; जैसे-नवरात्र, बैसाखी, पोंगल, ओणम। पंजाब में मनाई जाने वाली लोहड़ी, महाराष्ट्र की गणेश चतुर्थी. पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा को प्रांतीय या क्षेत्रीय त्योहार कहा जाता है।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, फिर ये त्योहार ही परिवर्तन से कैसे अप्रभावित रहते। समय की गति और समाज में आए परिवर्तन के परिणामस्वरूप इन त्योहारों, उत्सवों तथा पर्वो के स्वरूप में पर्याप्त परिवर्तन आया है। इन परिवर्तनों को विकृति कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। आज रक्षाबंधन के पवित्र और अभिमंत्रित रूप का स्थान बाजारू राखी ने लिया है।

अब राखी बाँधते समय भाई की लंबी उम्र तथा कल्याण की कामना कम, मिलने वाले उपहार या धन की चिंता अधिक रहती है। मिट्टी के दीपों में स्नेह रूपी जो तेल जलाकर प्रकाश फैलाया जाता था, उसका स्थान बिजली की रंग-बिरंगी रोशनी वाले बल्बों ने ले लिया है। सबसे ज्यादा विकृति तो होली के स्वरूप में आई है।

टेसू के फूलों के रंग और गुलाल से खेली जाने वाली होली जो दिलों का मैल धोकर, प्रेम, एवं सद्भाव के रंग में रंगती थी, वह अश्लीलता और हुड़दंग रूपी कीचड़ में सनकर रह गई है। राह चलते लोगों पर गुब्बारे फेंकना, जबरदस्ती ग्रीस, तेल, पेंट पोतने से इस त्योहार की पवित्रता नष्ट हो गई है। आज दशहरा तथा दीपावली के समय करोड़ों रुपये केवल आतिशबाजी और पटाखों में नष्ट कर दिया जाता है।

इन त्योहारों को सादगी तथा शालीनतापूर्वक मनाने से इस धन को किसी रचनात्मक या पवित्र काम में लगाया जा सकता है, जिससे समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर होने में मदद मिलेगी। इससे त्योहारों का स्वरूप भी सुखद तथा कल्याणकारी हो जाएगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि लोग इन त्योहारों को विकृत रूप में न मनाएँ हमारे जीवन में त्योहारों, उत्सवों एवं पर्वो का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

एक ओर ये त्योहार भाई-चारा, प्रेम, सद्भाव, धार्मिक एवं सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाते हैं तो दूसरी ओर धर्म-कर्म तथा आरोग्य बढ़ाने में भी सहायक होते हैं। इनसे हमारी सांस्कृतिक गरिमा की रक्षा होती है तो भारतीय संस्कृति के मूल्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से पहुँच जाते हैं। ये त्योहार ही हैं जिनसे हमारा अस्तित्व सुरक्षित था, सुरक्षित है और सुरक्षित रहेगा।

हमारे त्योहारों में व्याप्त कतिपय दोषों को छोड़ दिया जाए या उनका निवारण कर दिया जाए तो त्योहार मानव के लिए बहुपयोगी हैं। ये एक ओर मनुष्य को एकता, भाई-चारा, प्रेम-सद्भाव बढ़ाने का संदेश देते हैं तो दूसरी ओर सामाजिक समरसता भी बढ़ाते हैं। हमें इन त्योहरों को शालीनता से मानाना चाहिए, ताकि इनकी पवित्रता एवं गरिमा चिरस्थायी रहे।

विज्ञान की अद्भुत खोज कंप्यूटर पर निबंध – Vigyan Ki Khoj Kampyootar Essay In Hindi

Vigyan Ki Khoj Kampyootar Essay In Hindi

विज्ञान की अद्भुत खोज कंप्यूटर पर निबंध – Essay On Vigyan Ki Khoj Kampyootar In Hindi

सकेत बिंदु :

  • विज्ञान का चमत्कार
  • कंप्यूटर की आवश्यकता
  • अद्भुत क्रांति
  • कंप्यूटर का वर्णन
  • उपयोगिता
  • निष्कर्ष।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

विज्ञान की अद्भुत खोज कंप्यूटर (Vigyaan Kee Adbhut Khoj Kampyootar) – Amazing discovery of science computer

विज्ञान ने मनुष्य को नाना प्रकार की वस्तुएँ उपलब्ध कराकर उसका जीवन सुखमय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। आज जिघर भी दृष्टि डालिए उसका करिश्मा नजर आता है। उसने अनेक चमत्कारी वस्तुएँ उपलब्ध कराई हैं, मनुष्य जिनकी कल्पना किया करता था। ऐसे ही चमत्कारी यंत्रों में एक है-कंप्यूटर।

वर्तमान युग को कंप्यूटर का युग कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। चारों ओर कंप्यूटर का बोलबाला है। यह आज के युग की आवश्यकता बन गया है। प्रायः सभी छोटे-बड़े कार्यालयों में इसका अनिवार्य रूप से प्रयोग होने लगा है। जैसे पहले मेज पर रखी फाइलें देखकर लगता था कि यह कोई ऑफिस है, आज उसी प्रकार कंप्यूटर देखकर यह अनुमान सहज लगाया जा सकता कंप्यूटर नित नया आकर्षक रूप और आकार ग्रहण करते जा रहे हैं।

पहले इनका बड़ा-सा मॉनीटर परी मेज को घेर लेता था। मेज के नीचे इनका सी.पी.यू. तथा अन्य उपकरण रखे जाते थे। मॉनीटर के सामने बड़ा सा की-बोर्ड रखकर काम किया जाता था पर आज विज्ञान के प्रभाव के कारण मॉनीटर एक दम पतले और छोटे हो गए हैं जिनमें सी.पी.यू. भी शामिल होता है। इनका बोर्ड छोटा और आकर्षक बन गया है। अब इन्हें कम जगह में रखा जा सकता है।

आज कंप्यूटर पर लगभग हर प्रकार का काम किया जा रहा है। लेखा विभाग हो या अन्य विभाग, फाइलें रखने, बनाने, खोने, सँभालने, दीमकों के चट जाने की समस्या खत्म हो गई है। कर्मचारियों के वेतन बिल, कर्मचारियों का लेखा-जोखा, लाखों-करोड़ों खातों का काम इसमें सुरक्षित रहता है। बस एक क्लिक करते ही मन चाहा आँकड़ा हमारे सामने होता है। रेल, मोटर, वायुयान आदि के टिकटों का आरक्षण कंप्यूटर की मदद से किया जाता है।

बिजली, पानी, विभिन्न प्रकार के टैक्स, फोन आदि के बिल, राशन कार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाण इसकी मदद से बनाए जाते हैं। विद्यालयों के अभिलेख, उनसे संबंधित पत्राचार एवं प्रमाण-पत्रों का लेन-देन अब कंप्यूटर ने सुगम कर दिया है। चिकित्सा क्षेत्र में कंप्यूटर ने क्रांति ला दी है। विभिन्न जाँचों की रिपोर्ट इसकी मदद से बनने लगी हैं, जिसमें गलतियों की संभावना न के बराबर होती है। पुस्तकीय छपाई और चित्रांकन को कंप्यूटर ने नया रूप देकर आकर्षक बना दिया है।

कंप्यूटर ने मनोरंजन को नया रूप प्रदान किया है। अब बच्चों को धूल-मिट्टी और धूप में खेलने की आवश्यकता नहीं रही। वे घर में कंप्यूटर पर विविध प्रकार के खेल-खेलकर अपना मनोरंजन करते हैं।

कंप्यूटर समय, धन, और श्रम बचाने वाला अद्भुत उपकरण है। यह दैनिक जीवन की जरूरत बनता जा रहा है, पर हमें इसके साथ अधिक समय बिताने से बचना चाहिए।

महंगाई पर निबंध – Mehangai Par Nibandh In Hindi

Mehangai Par Nibandh In Hindi

महंगाई पर निबंध – Hindi Mein Mehangai Par Nibandh

सकेत बिंदु:

  • दीर्घकालिक परेशानी-महँगाई
  • निम्न और मध्य-वर्ग सर्वाधिक परेशान
  • राजनैतिक पार्टियाँ व नेता जिम्मेदार
  • महँगाई बढ़ने के कारण
  • महँगाई रोकने के उपाय।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

जीना मुश्किल करती महँगाई (Jeena Mushkil Karti Mehangai) – Inflation makes it difficult to live

संघर्ष का दूसरा नाम ही जीवन है। मनुष्य को जीवन में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इनमें से कुछ समस्याएँ अल्पकालिक होती हैं तो कुछ आजीवन चलती हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए ऐसी ही दीर्घकालिक परेशानी का नाम है-महँगाई।

वर्तमान में निम्न और मध्यमवर्ग महँगाई से सबसे ज्यादा परेशान है। यह मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा, और मकान पर सर्वाधिक चोट करती है। सरकारी आँकड़ों में यह भले ही स्थिर दिखे या अल्पकाल के लिए कुछ कम हो पर सत्य तो यह है कि निरंतर बढ़ती ही रहती है।

सरकार भी अपना पल्ला झाड़ने के उद्देश्य से पहले तो मौसम, प्रकृति आदि के प्रतिकूल होने का बहाना बनाती है, फिर इसका दोष दूसरों पर डालकर अपना पल्ला झाड़ लेती है।

चुनाव करीब आते ही हमारे तथाकथित भाग्यविधाता गरीबों का वोट पाने के लालच में महँगाई कम करने का दिवास्वप्न दिखाते हैं, पर चुनाव जीतते ही अपनी सुविधाएँ अपना वेतन-भत्ता बढ़ाकर उसका भार आम जनता पर डाल देते हैं।

चुनाव से पूर्व विभिन्न राजनैतिक पार्टियाँ औद्योगिक इकाइयों से गुप्त से चंदे के नाम पर मोटी रकम वसूलती हैं। चुनाव के बाद इन इकाइयों के मालिक अपने उत्पादों पर मनमर्जी मूल्य वृद्धि करते हैं। उन्हें कोई रोकने वाला नहीं होता है क्योंकि रिश्वत रूपी चंदा पहले ही दिया जा चुका होता है।

महँगाई बढ़ने का प्रमुख कारण है-माँग और पूर्ति के बीच असंतुलन होना। जब किसी वस्तु की आपूर्ति कम होती है और माँग बढ़ती है तो वस्तुओं का मूल्य स्वयमेय बढ़ जाता है क्योंकि अधिक क्रयशक्ति रखने वाले लोग उसे ऊँचे दाम पर खरीद लेते हैं। प्राकृतिक प्रकोप जैसे-बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि भूकंप आदि महँगाई बढ़ाने में सहायक होते हैं।

इनसे खेती की उपज घट जाती है और खाद्यान्न व अन्य वस्तुएँ बाहर से मँगानी पड़ती हैं। जमाखोरी, काला बाज़ारी आदि मानव निर्मित कारण हैं। इसके अलावा दोषपूर्ण वितरण प्रणाली, असफल सरकारी नियंत्रण तथा मनुष्य की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति भी इसके लिए उत्तरदायी हैं।

महँगाई रोकने के लिए सरकार और व्यापारी वर्ग दोनों को आगे आना होगा। सरकार को वितरण प्रणाली सुव्यवस्थित तथा सुचारु बनानी होगी। प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों से दैनिकोपयोगी वस्तुएँ शीघ्रातिशीघ्र उपलब्ध करानी होंगी।

जमाखोरों और कालाबाजारी करने वाले पर कड़ा जुर्माना लगाते हुए कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए। इसके अलावा सरकार को अपने खर्चों में कटौती करना चाहिए। धनाढ्य वर्ग को अपनी विलासितापूर्ण जीवन शैली में बदलाव लाना चाहिए तथा ऐसे लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए जो अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संघर्षरत हैं।

देश के प्रति मेरा कर्त्तव्य पर निबंध – My Duty Towards My Country Essay In Hindi

My Duty Towards My Country Essay In Hindi

देश के प्रति मेरा कर्त्तव्य पर निबंध – Essay On My Duty Towards My Country In Hindi

संकेत बिंदु :

  • देश सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण
  • देश के प्रति लगाव
  • देश के प्रति ईमानदारी
  • देश के प्रति सम्मान
  • निःस्वार्थ प्रेम
  • कर्तव्य का भली प्रकार से निर्वहन।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

‘देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।’ यह पंक्ति हमें उनके कर्तव्यों की याद दिला रही है जो किसी देश के प्रति वहाँ के निवासियों के होने चाहिए। हम मातृऋण, पितृऋण की बात तो करते हैं पर देश के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं, जो इन ऋणों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।

कोई भी व्यक्ति जिस देश में जन्म लेता है, उसका अन्न, जल ग्रहण कर पोषित होता है, जिसकी रज में लोट-लोटकर पुष्ट बनता है, उस देश की मातृभूमि के प्रति माता के समान सम्मान भाव रखना चाहिए। उस देश के राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए। व्यक्ति में देश-प्रेम, देशभक्ति की उत्कट भावना होनी चाहिए और मातृभूमि पर आँख उठाने वालों को मुँह तोड़ जवाब देना । चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर अपना सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिए।

किसी देश के प्रति वहाँ के नागरिकों को कर्तव्य बनता है कि वे उसकी प्रगति में भरपूर योगदान दें। राष्ट्र को स्वावलंबी बनाने में मदद करें। देशवासी ऐसा तभी कर सकते हैं जब वे अपने-अपने कार्य को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करें। देश को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए वहाँ के नागरिकों को ईमानदारीपूर्वक करों का भुगतान करना चाहिए।

देश के नागरिक कहीं भी हों किसी भी हाल में हों, उन्हें राष्ट्र के सम्मान का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। हमें कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे राष्ट्र के सम्मान पर आँच आए। हमें राष्ट्र-सम्मान को आहत करने वाली बातें भी नहीं करनी चाहिए। हमें उस जापानी नवयुवक, जिसने स्वामी रामकृष्ण को फलों का टोकरा देते हुए यह कहा था कि ‘आप अपने देश जाकर यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते हैं की तरह कार्य-व्यवहार कर राष्ट्र का मान-सम्मान बढ़ाने वाला कार्य करना चाहिए।

एक नागरिक के रूप में हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम देशद्रोह जैसे किसी काम में शामिल न हों। हम आतंकवादियों या देशद्रोहियों के बहकावे में न आएँ और राष्ट्र विरोधी किसी कार्य को अंजाम न दें। देखा गया है कि कुछ लोग अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए या थोड़े से धन के लोभ में देश की गुप्त सूचनाएँ, आतंकवादियों या विदेशियों को देकर देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करते हैं और देश को खतरा पैदा करते हैं।

हमें देश में व्याप्त बुराइयों की रोकथाम के लिए भी यथासंभव सहयोग देना चाहिए। इसके आलावा प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छता, वृक्षारोपण, सर्वशिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रमों में समय-समय पर भाग लेकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए, ताकि देश सफलता एवं उन्नति की ओर बढ़ता रहे।