Metropolitan Life Essay In Hindi

महानगरीय जीवन पर निबंध – Metropolitan Life Essay In Hindi

महानगरीय जीवन पर निबंध – Essay On Metropolitan Life In Hindi

संकेत-बिंदु –

  • भूमिका
  • शहरों की ओर झुकाव
  • शहरों की चकाचौंध
  • शहर सुविधा के केंद्र
  • शहरी जीवन का सच
  • दिखावापूर्ण जीवन
  • उपसंहार

महानगरीय जीवन की समस्याएँ (Mahaanagareey Jeevan Ke Samasyaen)- Problems Of Metropolitan Life

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

भूमिका – मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि उसे अधिक से अधिक सुख-सुविधाएँ मिलें। इन्हीं सुख-सुविधाओं को वह खोजता-खोजता शहर की ओर आता है। शहरी जीवन उसे बड़ा आकर्षक लगता है पर यहाँ की सच्चाई कुछ और ही होती है।

शहरों की ओर झुकाव – वर्तमान युग में चारों ओर विकास दिखाई पड़ता है, परंतु जिस रफ्तार से शहरों का विकास हुआ है, उस तरह से गाँवों का नहीं। शहरों की तुलना में गाँव सदा पिछड़े ही नज़र आते हैं। गाँवों में आजीक्किा का प्रमुख साधन कृषि है, परंतु बढ़ती आबादी के कारण कृषियोग्य जमीन का बँटवारा होता गया। कृषि कम होने से रोटी-रोजी का संकट उठना स्वाभाविक है। इसके अलावा गाँवों में सरकारी तथा गैर सरकारी मिल और फैक्ट्रियाँ तथा अन्य उद्योग धंधे नहीं हैं कि लोगों का मन शहर की ओर न झुके और वे यहीं के यहीं रह जाए।

शहरों की चकाचौंध – शहरी जीवन आकर्षण से भरपूर है। यहाँ की चमचमाती पक्की सड़कें, पार्क, उद्यान, ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ, घर-घर तक बिजली की पहुँच और अत्याधुनिक उपकरण, घरों के वातानुकूलित कमरे, सिनेमाघर और मल्टीप्लेक्स क्लब होटल आदि शहरों की चकाचौंध कई गुना बढ़ा देते हैं। इसके अलावा सरकारी-गैर सरकारी कार्यालय, मैट्रो रेल सेवा, वातानुकूलित बसें उनकी उपलब्धता देखकर गाँव से आया व्यक्ति सम्मोहित-सा हो जाता है। वह शहर की चकाचौंध में खो जाता है। उसे लगता है कि वह किसी और लोक में आ गया है।

शहर सुविधा के केंद्र – सरकारी योजनाओं का अधिकांश लाभ शहरों को मिलता है। यहाँ विकास की गति बहुत तेज़ होती है। शहरों में उच्च पदासीन अधिकारियों तथा नेताओं का निवास होने के कारण यहाँ सुविधाओं की कमी नहीं होती है। शहरों में एक ओर जहाँ रोज़गार के छोटे-बड़े अनेक अवसर उपलब्ध होते हैं, वहीं योग्यता के अनुसार नौकरी के अवसर भी उपलब्ध होते हैं, वहीं दूसरी ओर हमारे जीवन के लिए आवश्यक वस्तुएँ भी आसानी से मिल जाती हैं।

खाद्य वस्तुएँ, दूध, तेल, साबुन, कपड़ा आदि के लिए किसी विशेष दिन लगने वाली बाज़ार का न तो इंतज़ार करना है और न ज्यादा दूर जाना हैं। यहाँ परिवहन सेवा, चिकित्सा सेवा आदि सुलभ है। यहाँ दो कदम पर मॉल है तो चार कदम पर सिनेमाघर उपलब्ध है। यही स्थिति अन्य सुविधाओं की भी है।

शहरी जीवन का सच – अमीर लोगों के लिए शहर सुविधा के केंद्र हैं। यहाँ उनके लिए एक से बढ़कर एक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हैं, परंतु गरीब और आम आदमी के लिए शहर की सुविधाएँ दिवास्वप्न साबित होती है। व्यक्ति गाँव से शहर के आकर्षण से खिंचा आ जाता है, परंतु उसे फैक्ट्रियों में मजदूरी करनी पड़ती है या मंडी में पल्लेदारी करनी पड़ती है।

कम आय होने के कारण मुश्किल से वह अपना पेट भर पाता है। वह झग्गियों में रहने के लिए विवश होता है। पानी और शौच के लिए घंटों लाइन में लगना उसकी नियति बन जाती है। आने-जाने के लिए बसों के धक्के, साँस लेने के लिए न साफ़ हवा और न पीने को स्वच्छ पानी। उसकी जिंदगी कोल्हू के बैल के समान होकर रह जाती है। ऐसे जीवन में उसे शहर का सच पता चल जाता है।

दिखावापूर्ण जीवन – शहर की व्यस्त और भाग दौड़ भरी जिंदगी के कारण आत्मीयता में कमी आने लगती है। वह काम की मार से परेशान होता है। यह परेशानी उसके व्यवहार में झलकती है। वह फ़ोन, सोशल मीडिया, एस.एम.एस. से जुड़ने का दिखावा तो करता है, परंतु वह चाहकर अपने निकट संबंधियों से मिल नहीं पाता है। इसके अलावा शहरी जीवन में व्यक्ति आत्मकेंद्रित तथा स्वार्थी बनता जाता है।

उपसंहार – महानगरों का जीवन आकर्षण से भरपूर है। धनी लोग शहरों में सुख-सुविधाओं का लाभ उठाते हैं, पर आम आदमी और गरीब वहाँ नाटकीय जीवन जीने को विवश होता है। शहरी जीवन पर हर बात पूर्णतया लागू होती है कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

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