School Anniversary Essay In Hindi | विद्यालय का वार्षिकोत्सव पर निबन्ध

School Anniversary Essay In Hindi विद्यालय का वार्षिकोत्सव पर निबन्ध
विद्यालय का वार्षिकोत्सव संकेत बिंदु:

  • उत्सवों का महत्व
  • वार्षिकोत्सव की तैयारियाँ
  • उत्सव का वर्णन

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

विद्यालय का वार्षिकोत्सव पर निबन्ध | Essay on School Anniversary In Hindi

उत्सव और समारोह मानव-मन में उत्साह और आनंद का संचार करते हैं। इनसे जीवन में ताज़गी और स्फूर्ति आती है व अधिकाधिक कार्य करने की लगन पैदा होती है। विद्यालय में होने वाले वार्षिकोत्सव का अपना एक विशेष महत्व होता है पुरस्कृत विद्यार्थियों को देखकर अन्य विद्यार्थियों के मन में भी उमंग की लहर पैदा होती है और वे भी कुछ अधिक करने के लिए प्रोत्साहित होते हैं।

हमारा विद्यालय नगर के प्रतिष्ठित विद्यालयों में गिना जाता है। इसका नाम अरविंद सीनियर सेकेंडरी स्कूल है। हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव प्रतिवर्ष वसंत पंचमी के दिन मनाया जाता है। इस अवसर पर मौसम बड़ा सुहावना और रमणीय होता है। इन दिनों न तो अधिक सर्दी पड़ती है और न अधिक गर्मी। प्रात:काल शीतल, मंद और सुगंधित वायु बहती है। चारों ओर प्रकृति का निखरा हुआ सौंदर्य दिखाई देता है। प्रकृति नववधू की भाँति हरी साड़ी पहने हुए रंग-बिरंगे फूलों से अलंकृत बहुत प्यारी और सुहावनी लगती है।

पिछले वर्ष 25 फरवरी के दिन वसंत पंचमी थी। हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव इसी दिन मनाया गया। इसके लिए एक महीने पहले से तैयारियाँ होने लगी। प्रधानाचार्य ने अध्यापकों और विद्यार्थियों को मिलाकर कई समितियाँ बनाईं जिनको अलग-अलग कार्य सौंप दिए गए। सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य था सांस्कृतिक समिति का। समूह गान, वाद्यवृंद और नृत्यनाटिका में भाग लेने वाले विद्यार्थी मन लगाकर अभ्यास करने लगे।

विद्यालय में अवकाश हो जाने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने वाले सभी विद्यार्थी एक घंटे अभ्यास के लिए रुकते थे। अध्यापक और विद्यार्थी अपने-अपने कार्यों में व्यस्त थे। निमंत्रण पत्र छपवाए गए और आमंत्रित व्यक्तियों को भेज दिए गए। इस अवसर पर एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई जिसमें हर विषय के मॉडल और चार्ट बनवाए गए। विशेष रूप से विज्ञान विषय के वर्किंग मॉडल तैयार किए गए। इस कार्य में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

25 फरवरी को वार्षिकोत्सव सायं छह बजे से प्रारंभ होना था। विद्यार्थी और अध्यापक 10 बजे प्रातः विद्यालय पहुँच गए थे। सभी अपने-अपने अपूर्ण कार्य को पूरा करने में लग गए।

विद्यालय के क्रीडांगण में एक बड़ा शामियाना लगाया गया। मंच के सामने विशेष अतिथियों के बैठने के लिए सोफे लगाए गए। सोफों के पीछे दर्शकों के बैठने के लिए कुर्सियों की पंक्तियाँ थीं। मंच पर रंग-बिरंगे बल्बों का प्रकाश हो रहा था। फ़र्श पर लाल कालीन बिछे थे। मुख्य द्वार की साज-सज्जा देखने योग्य थी। लाल कपड़े की पट्टी पर सुनहरे बड़े अक्षरों में वार्षिकोत्सव के साथ विद्यालय का नाम अंकित था। मुख्य द्वार से पंडाल तक के मार्ग के दाएँ-बाएँ लाल रंग के कपड़े की दीवार थीं और फ़र्श पर कालीन बिछे थे।

6 बजकर 10 मिनट पर मुख्य अतिथि उपशिक्षा मंत्री की कार स्कूल के द्वार पर थी। प्रधानाचार्य और प्रबंध समिति के सदस्यों ने उनका स्वागत किया। एक छात्र ने उन्हें पुष्पमाला पहनाई तथा एक अन्य छात्र ने उन्हें फूलों का गुलदस्ता भेंट किया। प्रधानाचार्य उपमंत्री महोदय को मंच पर ले गए। वहाँ पंडाल में बैठे दर्शकों ने ताली बजाकर उनका स्वागत किया।

सरस्वती वन्दना के साथ कार्यक्रम आरंभ हुआ। मिडिल कक्षाओं के विद्यार्थियों ने एक समूहगान प्रस्तुत किया। तदुपरांत एक वाद्यवृंद रचना प्रस्तुत की गई। प्रधानाचार्य ने विद्यालय का वार्षिक-विवरण पढ़कर सुनाया। इसके बाद पुरस्कार वितरण का कार्य हुआ।

इस अवसर पर. 50 विद्यार्थी पुरस्कृत किए गए। प्रत्येक कक्षा में गत वर्ष की वार्षिक परीक्षा में प्रथम स्थान पाने वाले छात्र को मुख्य अतिथि महोदय द्वारा पुरस्कार दिया गया। वार्षिक खेलकूद में अलग-अलग प्रतियोगिता के विजेताओं को भी पुरस्कृत किया गया। अंत में नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की गई। यह उत्सव का मुख्य आकर्षण था। सबने इसकी सराहना की। मुख्य अतिथि के भाषण के बाद राष्ट्रगान से उत्सव का समापन हुआ।

Hard Work Success Essay In Hindi | परिश्रम ही सफलता पर निबंध

Hard Work Success Essay In Hindi परिश्रम ही सफलता पर निबंध
परिश्रम सफलता का रहस्य संकेत बिंदु:

  • परिश्रम का महत्व
  • भाग्य और परिश्रम
  • परिश्रम से ही सफलता

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परिश्रम ही सफलता पर निबन्ध | Essay on Hard Work Success In Hindi

वेद के एक मंत्र में कहा गया है-‘कृतं में दक्षिणे हस्ते, जयो में सव्य अहिते’-मेरे दाएँ हाथ में कर्मठता हो तो बाएँ हाथ में विजय होगी। इस मंत्र ने एक सच्चाई को प्रस्तुत किया है। जो व्यक्ति परिश्रम और साहस से कार्य करते हैं, उन्हें सदा सफलता प्राप्त होती व्याकरण संधान है। श्रम के महत्व को सभी ने स्वीकार किया है। यह वह शक्ति है जिस पर विश्वास और भरोसा किया जा सकता है। एक प्राचीन कहावत के अनुसार यह पृथ्वी परिश्रमी और पुरुषार्थी व्यक्तियों द्वारा ही भोगी जा सकती है-‘वीरभोग्या वसुंधरा’ परिश्रमी व्यक्ति ही इस संसार के ऐश्वर्य को भोग सकते हैं। किसी महान कार्य को पूरा करने के लिए परिश्रम ही एक मात्र साधन है।

जो मनुष्य परिश्रम न करके आलस्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं, सफलता उनसे दूर रहती है। पछतावा करने के सिवाय उन्हें कुछ हाथ नहीं लगता ‘अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।’ ऐसे मनुष्य भाग्य को बड़ा मानते हैं। भाग्य को विधाता मानकर वे परिश्रम से बचते हैं। उनके अनुसार ‘मनुष्य भाग्य के हाथों का खिलौना’ होता है। भाग्यवादी प्रायः सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र और भगवान श्री राम के जीवन का उदाहरण देते हैं। उनका कहना है कि भाग्य बड़ा बलवान होता है, उसी के कारण राजा हरिश्चंद्र को राज-त्याग कर श्मशान में दासता करनी पड़ी तथा भगवान राम को चौदह वर्ष तक वन में रहकर कष्ट भोगने पड़े।

जीवन का यथार्थ कुछ और ही कहानी कहता है। भाग्य पर भरोसा न करके परिश्रम की पतवार के सहारे ही जीवन नौका में बैठकर संसार-सागर के उस पार पहुंचा जा सकता है। जो लोग आलसी और निष्क्रय होते हैं वही ‘भाग्यं फलति सर्वत्र’ का नारा लगाते हैं। वे मनुष्य को नितांत शक्तिहीन और असमर्थ मानते हैं। ऐसे व्यक्ति हीन भावना से ग्रस्त होते हैं, उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है तथा वे स्वयं को असहाय समझते हैं। वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। परिश्रम को तिलांजलि देकर वे निराशापूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। इसके विपरीत भाग्य या संयोग को कल्पना की वस्तु मानने वाले परिश्रमशील व्यक्ति दूसरों को दोष नहीं देते। वे कठोर श्रम और दृढ़ संकल्प शक्ति को ही सफलता की कुंजी मानते हैं। नेपोलियन की मान्यता थी, “भाग्य उन्हीं का साथ देता है जो सबसे अधिक कुशल, सबसे अधिक साहसी और दृढ़ निश्चयी होते हैं।” ऐसे वीर पुरुषों के सामने ऊँचे पर्वत भी सिर झुका देते हैं। नियति को तुच्छ मानने वाले ऐसे महापुरुष जीवन की विषम परिस्थितियों तथा बड़ी-से-बड़ी बाधाओं की चुनौती को स्वीकार करते हैं। महाराजा रणजीतसिंह की तरह उनके चरणों में भी नदी की भयंकर ऊँची लहरें नतमस्तक हो जाती हैं। कवि अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने ऐसे ही पुरुषों के लिए कहा है-

देखकर बाधा विविध बहु विज घबराते नहीं,
रह भरोसे भाग्य के दुख भाग पछताते नहीं।

उद्यम से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं, केवल मन में विचार करने से कार्य-सिद्धि नहीं होती। भगवान भी उन्हीं की मदद करता है जो अपनी मदद आप करते हैं। इसलिए मनुष्य को परिश्रम के महत्व को पहचानना चाहिए। कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि परिश्रम करने के बाद भी कार्य सिद्ध नहीं होता, ऐसी स्थिति में निराशा का दामन थामने से काम नहीं चलता। यत्न करने पर भी यदि कार्य में सफलता नहीं मिलती तो उसके लिए परिश्रमी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। महाराज भर्तृहरि ने उचित ही कहा है-

उद्योगिन पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी,
दैवेन देयमिति कापुरुषा वदंति।
दैव निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या,
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः।

सिद्धि या सफलता का मूल मंत्र निःसंदेह उद्यम या उद्योग है। असफल होने पर परिश्रमी व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि उसकी कार्य-विधि में कहाँ त्रुटि रह गई। उस दोष का निवारण कर उसे तत्परतापूर्वक पुनः कार्य में जुट जाना चाहिए। निश्चय ही सफलता उसके चरण चूमेगी।

Dussehra Essay In Hindi | दशहरा पर निबन्ध

Dussehra Essay In Hindi | दशहरा पर निबन्ध
दशहराविजयदशमी संकेत बिंदु:

  • महत्व
  • आयोजन और मनाया जाना
  • प्रभाव

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दशहरा पर निबन्ध | Essay on Dussehra In Hindi

बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है-दशहरा। इस दिन सचमुच ऐसा लगता है कि सतयुग का रामराज्य पुनः लौट आया है। इस पर्व का धार्मिक महत्व रामायण की कथा पर आधारित है। इस दिन अयोध्या के राजा राम ने लंका के अत्याचारी राजा रावण को पराजित कर विजय प्राप्त की थी। उसी विजय की स्मृति में इस पर्व को विजयदशमी भी कहते हैं। सहस्रों वर्षों की घटना को हिंदुओं के दृढ़ विश्वास ने इसे सजीव बना दिया है।

हिंदू इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाते हैं। दस दिन पहले ही हर नगर, हर गली में रामलीला आरंभ हो जाती है। श्री राम के जीवन को चित्रित करने वाली झाँकियाँ निकाली जाती हैं, जिसे राम जी की सवारी कहते हैं। राजधानी दिल्ली की रामलीलाएँ विशेष रूप से दर्शनीय होती हैं।

इस पर्व के दिन बाजारों में विशेष चहल-पहल होती है। बाजारों में बिक रहे रामलीला के पात्रों के मुखौटे, धनुष-बाण और गदा आदि खिलौने बच्चे बड़े चाव से खरीदते हैं। शाम होते ही सभी दशहरा मैदान की तरफ चल पड़ते हैं। इस दिन सवारी की शोभा भी निहारने योग्य होती है।

सवारी के दशहरा मैदान पहुँचते ही राम-रावण युद्ध दिखाया जाता है। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले मैदान में पहले ही खड़े कर दिए जाते हैं। इनमें बारूद, पटाखे और आतिशबाजी भर दी जाती है। शाम होते ही इन पुतलों को कागज़ की लंका सहित अग्नि की भेंट कर दिया जाता है।

आकाश में उड़ती फुलझड़ियों और आतिशबाज़ी की रंगबिरंगी रोशनी बड़ी भली लगती है। रावण का दाह संस्कार कर सब लोग प्रसन्नतापूर्वक घर लौटते हैं। इस अवसर पर शक्ति की देवी, पापियों का नाश करने वाली दुर्गा की भी पूजा होती है। शाम को प्रतिमा को धूमधाम से जल में विसर्जित कर दिया जाता है। यह पर्व भारतीय समाज में बहुत ही शुभ माना जाता है।

यह पर्व हमारे जीवन में नई स्फूर्ति, नए जीवन और नए उत्साह का संचार करता है। इस पर्व से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सदा सत्य की विजय और असत्य की पराजय होती है।

Paradheen Sapnehu Sukh Naahi Essay In Hindi | पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं पर निबंध

Paradheen Sapnehu Sukh Naahi Essay In Hindi | पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं पर निबंध
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहि संकेत बिंदु:

  • पराधीनता अभिशाप
  • पराधीनता के उदाहरण
  • स्वतंत्रता संघर्ष
  • स्वतंत्रता का महत्व

तुलसीदास ने स्वतंत्रता का महत्व प्रकट करते हुए ‘रामचरितमानस’ में पराधीनता के कष्टों का वर्णन किया है। उनके कथन ‘पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं’ का अर्थ है-पराधीनता का जीवन जीने वाला व्यक्ति सपनों में सुख नहीं पाता। इस संसार का प्रत्येक प्राणी स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना चाहता है। पशु-पक्षी तक बंधनमुक्त रहना चाहते हैं फिर मनुष्य की बात ही क्या है।

पराधीनता कलंक के समान होती है। पराधीन व्यक्ति अपनी इच्छानुसार जी नहीं सकता। उसका खाना-पीना, उठना-बैठना, सोना-जागना सब दूसरों की इच्छा पर निर्भर करता है। अमेरिका में दास-प्रथा थी। दासों को पशु के समान समझा जाता था। उन्हें पशुओं के समान खरीदा और बेचा जाता था। उन पर अमानवीय अत्याचार किए जाते थे। उनके अधिकारों की रक्षा के लिए वर्षों तक संघर्ष चला। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने दास-प्रथा समाप्त करने में अहम भूमिका निभाई थी।

भारत में आज भी बेगारी की प्रथा का अंत नहीं हुआ है। संवैधानिक रूप से तो बेगारी की प्रथा समाप्त हो चुकी है परंतु आज भी देश के विभिन्न भागों में निर्धनता के कारण सैकड़ों पुरुष और महिलाएँ ही नहीं छोटे-छोटे बालक-बालिकाएँ दासों के समान जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसका कारण है घोर निर्धनता। आज भी नगरों, महानगरों में धनियों के घरों में नौकर-नौकरानियाँ दासता का जीवन जीने को विवश हैं। उनके घरों में दो समय का भोजन तक उपलब्ध नहीं होता। वे निर्धनता के कारण भुखमरी की स्थिति में जीते हैं। वे उस भुखमरी की स्थिति से तंग आकर दो समय के भोजन और कुछ वस्त्रों के लिए कार्य करने को तैयार हो जाते हैं।

असंख्य कारखानों और छोटे-छोटे काम-धंधों में पुरुष, महिलाएँ, बच्चे बहुत कम वेतन पर कार्य करते हैं। बेरोजगारी के कारण वे इसे करने को सहमत हो जाते हैं। पूंजीपति मालिक उनके साथ दुर्व्यव्यवहार करते हैं। उनका शोषण करते हैं। वे उन्हें भाँति-भाँति से अपमानित और प्रताड़ित करते हैं। निर्धनता और बेरोज़गारी के चंगुल में फँसे लोग इस प्रकार के अपमानजनक जीवन को जीने के लिए विवश हो जाते हैं। उनका दिन-रात का सुख-चैन छिन जाता है। उन्हें सपनों में भी मालिकों के धमकाने के स्वर सुनाई देते हैं।

पराधीनता का जीवन ऐसा ही होता है। मनुष्य को अपने भीतर इतनी सामर्थ्य उत्पन्न कर लेनी चाहिए जिससे वह पराश्रित न हो सके। शिक्षा ग्रहण करके स्वयं पर आश्रित होना चाहिए। उसे विभिन्न कार्यों का प्रशिक्षण लेकर स्वावलंबी बनना चाहिए। उन्हें स्वतंत्रता के महत्व को समझना चाहिए। पेट की भूख मिटाने के लिए उन्हें आत्मसम्मान नहीं गँवाना चाहिए। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने स्वतंत्रता का महत्व प्रकट करते हुए कहा है-

स्वातंत्र्य गर्व उनका जो नर फाकों में प्राण गँवाते हैं,
पर नहीं बेच मन का प्रकाश, रोटी का मोल चुकाते हैं।

पराधीन वही व्यक्ति होता है जिसकी संघर्ष-शक्ति समाप्त हो जाती है। वह व्यक्ति जो मान-अपमान में भेद नहीं करता, पराधीनता का जीवन स्वीकार कर लेता है। शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से कमजोर व्यक्ति पराधीन होता है। ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं जिन्होंने सुख-सुविधाओं के प्रलोभनों को स्वीकार नहीं किया। वे आजीवन कष्ट सहते रहे। महाराणा प्रताप ने अकबर के अत्याचारों के समक्ष सिर नहीं उठाया। वे आजीवन अकबर के विरुद्ध संघर्ष करते रहे। उन्हें और उनके परिवार के समक्ष भूखों मरने की स्थिति आ गई। अकबर के साथ संधि करके वे सुख-सुविधाओं भरा जीवन जी सकते थे। उन्होंने सुख-सुविधाओं से अधिक स्वतंत्रता को महत्व दिया। इसीलिए उनका उल्लेख इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में किया जाता है।

झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के समक्ष अंग्रेज़ों ने पराधीनता का प्रस्ताव रखा। लक्ष्मीबाई को पेंशन मिल जाती। वे आराम सुख-सुविधाओं भरा जीवन जीती रहतीं। उन्होंने पराधीनता की अपेक्षा संघर्ष का मार्ग अपनाया। वे जानती थीं कि अंग्रेज़ी सेना के मुकाबले उनकी स्थिति कमज़ोर है। उन्होंने नारी होकर भी अंग्रेज़ों को पराजित कर दिया। उन्होंने इतनी कुशलता से युद्ध किया कि अंग्रेज़ आश्चर्यचकित रह गए। उस वीरांगना ने स्वतंत्रता की रणभेरी बजाकर देशवासियों में नव उत्साह जगा दिया। वे अंततः शहीद हो गईं परंतु पराधीनता को नहीं स्वीकारा। ऐसे वीरों और वीरांगनाओं के लिए ही कहा गया है-

स्वातंत्र्य गर्व उनका, जिन पर संकट की घात न चलती है,
तूफ़ानों में जिनकी मशाल, कुछ और तेज़ हो जलती है।

मनुष्य को सदा स्वतंत्र रहना चाहिए। इसी प्रकार देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। भारत ने वर्षों की पराधीनता से मुक्ति पाने के लिए लंबा संघर्ष किया। हज़ारों भारतीयों ने अपने प्राण गँवा दिए। इसके सुपरिणाम स्वरूप देश स्वाधीन हुआ। स्वाधीनता प्राप्त करना कठिन होता है तो उसकी रक्षा करना और कठिन होता है। इसलिए व्यक्ति हो अथवा राष्ट्र स्वाधीनता ही सम्मान दिलाती है। पक्षी तक पिंजरे में बंद कर दिए जाएँ तो वे भी गा उठते हैं-

हम पंछी उन्मुक्त गगन के, पिंजरबद्ध न गा पाएँगे,
कनक तीलियों से टकराकर, पुलकित पंख टूट जाएँगे।

School of My Dreams Essay In Hindi | मेरे सपनों का विद्यालय पर निबन्ध

School of My Dreams Essay In Hindi मेरे सपनों का विद्यालय पर निबन्ध
मेरे सपनों का विद्यालय संकेत बिंदु:

  • विद्यालयों का महत्व
  • आदर्श विद्यालय
  • चरित्र निर्माण और अनुशासन
  • गतिविधियाँ

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मेरे सपनों का विद्यालय पर निबन्ध | Essay on School of My Dreams In Hindi

विद्यालय शिक्षा प्रदान करने के केंद्र होते हैं। इनमें प्राथमिक, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर की शिक्षा प्रदान की जाती है। तीन-चार वर्ष के नन्हें-नन्हें बालक-बालिकाएँ इनमें प्रवेश करते हैं और सत्रह-अठारह वर्ष की आयु में बारहवीं कक्षा उत्तीर्ण करके जीवन के नए क्षेत्र में पदार्पण करते हैं।

विद्यालय का प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में महत्व होता है। विद्यालयों का जैसा स्तर होता है, उनसे शिक्षा ग्रहण करके निकले विद्यार्थियों का वैसा ही शैक्षिक स्तर होता है। विद्यालय कई प्रकार के होते हैं। नगर निगमों द्वारा चलाए जाने वाले विद्यालय प्रायः प्राथमिक स्तर की शिक्षा प्रदान करते हैं। राज्य सरकारों द्वारा संचालित विद्यालयों में उच्चतर माध्यमिक स्तर की शिक्षा प्रदान की जाती है। श्रेष्ठ शिक्षा प्रदान करने वाले पब्लिक स्कूल होते हैं। इन्हें निजी संस्थाएँ चलाती हैं।

मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं एक विद्यालय खोलूँ जो आदर्श विद्यालय हो। इसमें नर्सरी से बारहवीं कक्षा तक की उच्चस्तरीय शिक्षा प्रदान की जाएगी। शिक्षा प्रदान करने का दायित्व अध्यापक-अध्यापिकाओं पर निर्भर करता है। मैं इस विद्यालय में उच्चतम शिक्षा प्राप्त अध्यापक-अध्यापिकाओं को नियुक्त करूँगा। उन्हें अन्य विद्यालयों की अपेक्षा अधिक वेतन दूंगा। उन्हें विद्यालय परिसर में ही आवास प्रदान किए जाएंगे। उनको सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी। मेरा प्रयास होगा कि वे सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्त रहें। ऐसे अध्यापक-अध्यापिकाएँ पूर्ण रूप से विद्यालय के उच्च स्तर निर्माण में अपना योगदान करेंगे। वे पूर्णतया विद्यार्थियों के हित के लिए समर्पित रहेंगे।

विद्यालय परिसर में छात्रावास बनाया जाएगा। इसमें दो तरह के विद्यार्थियों के रहने की व्यवस्था होगी। ऐसे प्रतिभावान विद्यार्थी जिनके माता-पिता निर्धन होंगे उन्हें छात्रावास में रखा जाएगा। उनके भोजन, निवास और शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था होगी। दूसरे वे विद्यार्थी होंगे जो अनुशासनबद्ध रहकर सच्चे अर्थों में शिक्षा ग्रहण करना चाहेंगे।

विद्यालय में विज्ञान की बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाएँ होंगी। इनमें नए-नए प्रयोग करने की सुविधा रहेगी। ये सभी प्रकार के उपकरणों से सुसज्जित होंगी। विद्यालय का कंप्यूटर-विभाग सबसे बड़ा होगा। विद्यालय के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए कंप्यूटर सीखना अनिवार्य होगा। नर्सरी के नन्हें बच्चे से लेकर बारहवीं कक्षा तक के विद्यार्थी जब कंप्यूटर सीखकर निकलेंगे तो वे देश को नए युग में ले जाएँगे।

विद्यालय के खेल-कूद विभाग में सभी प्रकार के खेलों के सामान उपलब्ध होंगे। विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने के लिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को नियुक्त किया जाएगा। उनकी देखरेख में विद्यार्थी खेलों का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण ग्रहण कर सकेंगे। इस प्रकार वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम ऊँचा कर सकेंगे।

विद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर बल दिया जाएगा। हिंदी और अंग्रेजी भाषा में कविता, वाद-विवाद, निबंध लेखन, नाटक आदि के कार्यक्रम आयोजित कराए जाएंगे। भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए इन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का बहुत महत्व होता है। संगीत और नृत्य के साथ-साथ चित्रकला और मूर्तिकला आदि विभागों की स्थापना की जाएगी।

विद्यालय में चरित्र-निर्माण और अनुशासन पर सबसे अधिक बल दिया जाएगा। अध्यापक-अध्यापिकाओं और विद्यार्थियों की वेशभूषा आदर्श होगी। अध्यापिकाओं की वेशभूषा इस प्रकार की होगी जिससे छात्राओं में शालीनता का भाव जाग्रत हो सके। प्रत्येक अध्यापक-अध्यापिका बारी-बारी से प्रात:कालीन प्रार्थना सभा में अपने विचार रखा करेंगे। प्रत्येक विद्यार्थी एक बार प्रार्थना सभा को अवश्य संबोधित करेगा।

मेरे सपनों के विद्यालय में सभी धर्मों के प्रति समान आदर भाव जाग्रत करने के लिए भिन्न-भिन्न त्योहार मनाए जाएंगे। महापुरुषों की जयंतियाँ आयोजित की जाएंगी। विद्यालय की पत्रिका में सर्वधर्म समभाव की रचनाएँ प्रकाशित की जाएँगी। मेरे सपनों के विद्यालय में सभी विद्यार्थी इतने योग्य होंगे कि वे अनुत्तीर्ण शब्द को ही भूल जाएँगे।

मेरा सपना पूरा होगा, यह मैं नहीं जानता। कहते हैं सपने देखना बुरा नहीं होता। यदि सपने नहीं देखेंगे तो उन्हें पूरा करने की भावना कैसे जाग्रत होगी? संभव है मेरे पास बहुत धन आ जाए। संभव है कि मैं देश का शिक्षामंत्री बन जाऊँ। तब तो मेरे सपनों का विद्यालय अवश्य बन जाएगा। मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं एक दिन ऐसा आदर्श विद्यालय बनाऊँगा।

Holi Colors Essay In Hindi | होली पर रंग क्यों लगाते हैं पर निबन्ध

Holi Colors Essay In Hindi होली पर रंग क्यों लगाते हैं पर निबन्ध
होली पर रंग क्यों लगाते हैं संकेत बिंदु:

  • होली का त्योहार कब आता है
  • कथाएँ
  • कथा
  • मनाने का ढंग

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होली पर रंग क्यों लगाते हैं पर निबन्ध | Essay on Holi Colors In Hindi

होली का त्योहार वसंत ऋतु का संदेशवाहक बनकर आता है। प्रति वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को यह त्योहार मनाया जाता है। रंगों भरे इस त्योहार में जहाँ एक ओर हर्ष और उल्लास की वर्षा होती है वहीं दूसरी ओर मैत्री और स्नेह की नदी उमड़ पड़ती है।

धार्मिक दृष्टि से भी इस त्योहार का बहुत अधिक महत्व है। इसका आधार हिरण्यकश्यप नामक दानव राजा और उसके ईश्वरभक्त पुत्र प्रहलाद की कथा है। यह दानव राजा बहत अत्याचारी था और अपने को भगवान समझकर जनता से अपनी पूजा करवाता था। उसने अपने ईश्वरभक्त पुत्र को मार डालने के अनेक प्रयास किए पर भगवान किसी-न-किसी रूप में आकर अपने भक्त की रक्षा करते हैं। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के पास वरदान की एक ऐसी चादर थी जिसे ओढ़कर आग नहीं लग सकती थी।

प्रह्लाद को मार डालने की इच्छा से होलिका स्वयं वह चादर ओढ़कर प्रहलाद को गोदी में बिठाकर जलती चिता में जा बैठी। होनी को कुछ और ही मंजूर था। चादर उड़कर प्रह्लाद पर जा पड़ी और होलिका जलकर भस्म हो गई। भक्त प्रह्लाद जीवित बच गया। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की विजय का भी प्रतीक है। हर वर्ष यह संदेश देने यह त्योहार आता है।

रंगों का यह त्योहार दो दिन तक मनाया जाता है। पानी वाले और सूखे रंगों, अबीर-गुलाल से लोग अपने मित्रों, परिचितों और संबंधियों से होली खेलते हैं। बच्चों के लिए तो यह त्योहार कई दिन पहले से शुरू हो जाता है। अपनी मनपसंद पिचकारियाँ खरीदकर वे अपने मित्रों के साथ होली खेलने लगते हैं। इस अवसर पर बाज़ारों की रौनक भी देखते ही बनती है।

गाँवों में तो लोग कई दिन पहले से ही नाचते और गीत गाते हुए इस त्योहार का आनंद लेते हैं। भारत भर में प्रसिद्ध है बरसाने की लट्ठमार होली। इसे देखने के लिए देश और विदेश से लोग यहाँ एकत्र होते हैं। कृष्ण और गोपियों की रासलीला का भी आयोजन किया जाता है। होली के दूसरे दिन को ‘धुलैंडी’ कहते हैं। इस दिन लोग नए वस्त्र पहनकर अपने मित्रों, संबंधियों से मिलने जाते हैं। गले मिलकर और मिष्ठान खिलाकर अतिथियों का स्वागत किया जाता है और स्नेह को ताज़ा किया जाता है।

पारस्परिक मेल-मिलाप के इस पवित्र त्योहार को कुछ लोग अपने कुकृत्यों से गंदा बना देते हैं। वे रंग के स्थान पर कीचड़, ग्रीस आदि गंदी वस्तुएँ एक-दूसरे पर फेंकते हैं। जबरदस्ती रंग डालने की कोशिश करते हैं। इससे कभी-कभी लड़ाई-झगड़ा भी हो जाता है। कई लोग इस त्योहार में भांग और शराब का सेवन भी आवश्यक मनाते हैं, यह उचित नहीं है। होली स्नेह और मैत्री का त्योहार है। आपसी भाईचारा बढ़ाने का त्योहार है। इसे इसी रूप में मनाना चाहिए। जीवन को रंगमय करने वाला यह त्योहार सबके जीवन को रंगमय कर जाता है।

Diwali Essay In Hindi | दीपावली पर निबन्ध

Diwali Essay In Hindi दीपावली पर निबन्ध
दीपावली संकेत बिंदु:

  • दीपावली से जुड़ी कथाएँ
  • दीपावली की तैयारी
  • दीपावली मनाना
  • महत्व

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दीपावली पर निबन्ध | Essay on Diwali In Hindi

दीपावली-सी लोकप्रियता और महत्ता हिंदुओं के अन्य किसी भी पर्व को प्राप्त नहीं है। दीपों के इस पर्व को भारत के सभी लोग किसी-न-किसी रूप में मनाते हैं। इस पर्व के साथ अनेक पौराणिक और दंतकथाएँ जुड़ी हुई हैं। इसी दिन श्री राम चौदह वर्ष का वनवास समाप्त कर सीता के साथ अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में नगर को दीपमालिकाओं से सजाया था। घर-घर मिष्ठान बँटे थे। तभी से यह पर्व आनंद, उल्लास और विजय का प्रतीक बन गया है। यह पर्व श्री राम के लोकरक्षक रूप का स्मरण कराता हुआ हमें उन्हीं के समान आदर्श भाई, पति और मित्र बनने की प्रेरणा देता है। पौराणिक गाथाओं के आधार पर सागर मंथन होने पर इसी दिन लक्ष्मी का आविर्भाव हुआ था। अतः इस दिन लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है। इसी कारण यह पर्व आर्थिक सम्पन्नता का प्रतीक बन गया है।

आज इस पर्व के साथ कुछ आधुनिक कारण भी जुड़ गए हैं और इसका महत्व भी बढ़ गया है। आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती का इसी दिन निर्वाण हुआ था। अतः आर्यसमाजी इस दिन को बहुत पवित्र मानते हैं। जैनियों के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी को भी इसी दिन निर्वाण प्राप्त हुआ था। जैन समाज इस उपलक्ष्य में इस पर्व को मनाता है।

लोग अपने घरों, दुकानों और व्यवसाय केंद्रों की लिपाई-पुताई कराकर उन्हें सजाते हैं। इस तरह दीपावली स्वच्छता का पर्व भी बन . गया है। शाम को रंगबिरंगी रोशनी से सारा नगर जगमगा जाता है। बाजारों की सजावट का तो क्या कहना। मिठाइयों और उपहार की दुकानों पर लोग अपनी पसंद का सामान खरीदते हैं। वे सगे संबंधियों और इष्ट मित्रों के यहाँ जाकर उन्हें दीपावली की शुभकामनाएँ देते हुए मिठाई और उपहार भेंट करते हैं। इस दिन कोई आपसी मनमुटाव हो तो उसे भी भुलाकर संबंध सामान्य बनाने की कोशिश की जाती है।

इस पर्व में एक ओर जहाँ इतने सारे गुण हैं वहीं कुछ लोगों ने इसके साथ एक अवगुण भी जोड़ दिया है। बहुत से लोग इस दिन इस विश्वास के साथ जुआ खेलते हैं कि आज जीत गए तो वर्ष भर लक्ष्मी की कृपा बनी रहेगी। इस बुरी प्रथा के कारण अक्सर लोग ऋण के भार से दब जाते हैं। देश और जाति की समृद्धि का यह पर्व उल्लास और हमारी आर्थिक प्रगति का सूचक तो है ही अत्यंत मनोरम और महत्वपूर्ण भी है।

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाने वाला यह पर्व अंधकार रूपी अज्ञान पर प्रकाश रूपी ज्ञान की विजय का प्रतीक है। इस प्रकार यह पर्व ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ के आदर्श को प्रतिष्ठापित करता है।

दीपावली का त्योहार वर्षा ऋतु के समाप्त होने पर मनाया जाता है। वर्षा के कारण उत्पन्न होने वाले कीटाणुओं तथा घर की गंदगी को नष्ट करने के लिए घरों की लिपाई-पुताई होती है। घरों और बाज़ारों को सजाया जाता है। सरसों के तेल के दिए जलाए जाते हैं, बिजली के रंग-बिरंगे बल्ब भी उत्सव की शोभा में वृद्धि करते हैं। बच्चे खुशी से आतिशबाजी पटाखे-फुलझड़ी चलाते हैं। शरद ऋतु के आगमन के साथ ही नववर्ष का आरंभ भी माना जाता है। नए अनाज के आने की खुशी में कृषक विशेष उल्लास के साथ इस पर्व को मनाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इस अवसर पर यूत-क्रीड़ा तथा मदिरापान आदि दूषित प्रथाओं को तिलांजलि देकर आशा और उल्लास से भरपूर यह ज्योतिपर्व उत्साहपूर्वक मनाया जाए।

True Friend Essay In Hindi | सच्चा मित्र पर निबन्ध

True Friend Essay In Hindi सच्चा मित्र पर निबन्ध
सच्चा मित्र संकेत बिंदु:

  • मनुष्य सामाजिक प्राणी
  • सच्चा मित्र
  • सच्चे मित्र के उदाहरण
  • मित्र बनाना

मनुष्य अकेला नहीं रह सकता। उसे ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जिसके समक्ष वह अपने मन के भाव प्रकट कर सके। वह जिसके साथ सुख के आनंद भरे क्षण व्यतीत कर सके। उसके दुःख और कष्टमय जीवन में जो उसका सहायक हो। वह परिवार के सदस्यों के साथ जी सकता है परंतु मन के समस्त भावों को उन पर प्रकट नहीं कर सकता। वह केवल मित्र के साथ ही मन की भावनाएँ प्रकट कर सकता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में मित्र बनाता है।

मित्र को भाई से भी बढ़कर माना जाता है। सच्चे मित्र के विषय में प्रसिद्ध विद्वान भर्तृहरि ने सत्य ही लिखा है-

पापन्निवारयति, योजयते हिताय
गुह्यानि गुह्याति गुणान प्रकट करोति।
आपद्गतं च न जहाति, ददाति काले,
सन्मित्र लक्षणमिदं प्रवदंति संतः।

सच्चा मित्र पापकर्म करने से रोकता है। कल्याण के कार्यों में प्रवृत्त करता है। दोषों को छिपाता है। गुणों को प्रकट करता है। विपत्ति के समय साथ नहीं छोड़ता। आवश्यकता पड़ने पर सहायता करता है।

सच्चा मित्र अपने मित्र का हितैषी होता है। वह अपने मित्र को उचित परामर्श देकर सुपथ पर ले जाता है। वह मित्र के अवगुणों को दूर करता है। उसका एकमात्र लक्ष्य मित्र को अधिक-से-अधिक लाभ पहुंचाना होता है। मित्रता पावन संबंध है। इसमें किसी प्रकार का स्वार्थ नहीं होता।

बाल्यकाल से ही मित्र बनाने की भावना जाग्रत होने लगती है। बालक-बालिकाएँ अपनी आयु के मित्र और सखियाँ बनाते हैं। कक्षा के सहपाठियों को मित्र बनाते हैं। मित्र बनाने की प्रक्रिया जीवनपर्यंत चलती रहती है। मित्र अवश्य बनाने चाहिए परंतु मित्र का चयन सावधानी से करना चाहिए। मित्र बनाने से पूर्व उसके गुणों, अवगुणों, स्वभाव और रुचियों को जान लेना चाहिए। उसकी आर्थिक स्थिति समान स्तर की होनी चाहिए। सच्चा मित्र नाविक के समान होता है जो मँझदार में फँसी नाव को किनारे पर लगा देता है।

श्री राम सीता की खोज करने निकले तो उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की। श्री राम ने सुग्रीव को बालि के भय से मुक्त कराया तो सुग्रीव ने हनुमान के द्वारा सीता की खोज की। महाकवि तुलसीदास ने इस प्रसंग में सच्चे मित्र को परिभाषित करते हुए ‘रामचरितमानस’ में लिखा है-

कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटै अवगुनहि दुरावा॥
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥
विपत्तिकाल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा॥

श्री कृष्ण और सुदामा सहपाठी थे। श्री कृष्ण राजा बन गए। सुदामा निर्धनता का कष्टमय जीवन व्यतीत करने लगा। जब सुदामा कृष्ण के पास गया तो श्री कृष्ण ने मित्रता का निर्वाह करते हुए सुदामा को गले से लगाया। उसे राजसिंहासन पर अपने साथ बिठाया। उसका मान-सम्मान किया। उसके भवन को महल-सा भव्य बनवाकर उसे निर्धनता के अभिशाप से मुक्त कर दिया। कर्ण ने मृत्युपर्यंत दुर्योधन का साथ देकर मित्रता का निर्वाह किया था। सच्चा मित्र स्वयं कष्ट सह लेता है परंतु अपने मित्र पर आँच नहीं आने देता। वह मित्र के लिए छायादार वृक्ष बनकर उसे धूप और गर्म हवाओं से बचाता है। मित्रता की कसौटी विपत्तिकाल में होती है-

विपत्ति कसौटी जे कसै सोई साँचे मीत।

सच्चा मित्र वह होता है जो विपत्ति आने पर दृढ़ चट्टान के समान मित्र का साथ देता है। वह मित्र के सभी प्रकार के कष्टों को बाँट लेता है। प्रसिद्ध साहित्यकार रामचंद्र शुक्ल के अनुसार-‘जीवन में मित्रों की भीड़ एकत्र करने से श्रेष्ठ होता है एक ही मित्र बनाना। वह सच्चा मित्र होना चाहिए।’

सच्चे मित्र पर आँख मूंदकर विश्वास करना चाहिए। संदेह मित्रता का नाश कर देता है। मित्रता की दीवार में संदेह की तनिक-सी चोट से दरार पड़ जाती है।

मित्रता भावनाओं में बहकर नहीं अपितु भली-भाँति सोच-विचारकर करनी चाहिए। प्रायः देखा जाता है कि लोग बिना-सोचे समझे मित्र बनाते चले जाते हैं। ऐसे लोगों को बाद में पछताना पड़ता है। परखकर ही मित्र बनाना चाहिए। सच्चा मित्र अमूल्य धरोहर होता है। सौभाग्यशालियों को ही सच्चे मित्र मिलते हैं। ऐसे मित्रों पर गर्व करना चाहिए।

Autobiography of Book Essay In Hindi | पुस्तक की आत्मकथा पर निबन्ध

Autobiography of Book Essay In Hindi | पुस्तक की आत्मकथा पर निबन्ध
पुस्तक की आत्मकथा संकेत बिंदु:

  • मेरा नाम
  • मेरा स्वरूप
  • मेरे भीतर की सामग्री
  • मेरी इच्छा

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

पुस्तक की आत्मकथा पर निबन्ध | Essay on Autobiography of Book In Hindi

मैं पुस्तक हूँ। मेरा नाम ‘फुलवारी गीत’ है। जिस प्रकार फुलवारी में भाँति-भाँति के फूल होते हैं उसी प्रकार मेरे पृष्ठों पर भाँति-भाँति के गीत अंकित हैं। प्रत्येक गीत के भावों के अनुसार रंग-बिरंगे चित्र भी बने हुए हैं। इन चित्रों के कारण मेरा रूप इतना आकर्षक हो गया है कि नन्हें-मुन्ने बालक और बालिकाएँ मुझे अपने हृदय से लगाए रखते हैं।

मुझमें नन्हें बालक-बालिकाओं को आकर्षित करने की अद्भुत क्षमता है। मैं जब उनके हाथों में पहुँच जाती हूँ तो वे मेरे गीतों को गाने लगते हैं। वे उन्हें इतने मधुर स्वर में गाते हैं कि मैं भी अपनी सुध-बुध खो देती हूँ। मैं कई स्कूलों की यात्रा करती रहती हूँ। राजधानी दिल्ली ही नहीं मैंने तो पंजाब, चंडीगढ. हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दक्षिण भारत के केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश तक अनेक प्रांत देख लिए हैं।

अध्यापिकाएँ मुझे हाथ में लेकर गाती हैं। उनके साथ छोटे-छोटे बच्चे अपने मधुर स्वर में गाते हैं। वे मेरा एक-एक पृष्ठ उलटकर उन्हें चित्र दिखाती हैं। इन चित्रों में चूहा, पैंट, कमीज़ और टाई बाँधकर पढ़ने जाता है। मेंढक टर्र-टर्र करके पढ़ने का संदेश देता है। वह कहता है-

मेंढक बोला टर-टर-टर, जल्दी-जल्दी पुस्तक पढ़।
न कर झगड़ा और न लड़, सबके मन में खुशियाँ भर।

इतना ही नहीं मेरे पृष्ठों में चंदा मामा है, शेर है, हाथी है, गेंद है, दूल्हा है, बिल्ली है, बादल और बिजली भी है। मेरे पृष्ठों पर बना भालूवाला डुगडुगी बजाकर भालू का तमाशा दिखाता है। पों-पों करती मोटर है। ऐसी सुंदर मोटर को देखकर सब उसमें बैठने के लिए दौड़ पड़ते हैं-

पों-पों करती मोटर आई, सबने कसकर दौड़ लगाई,
भीड़-भड़क्का, धक्कम-मुक्का, सबको सीट नहीं मिल पाई।

मेरा ऐसा सुंदर रूप एक दिन में नहीं बना। सबसे पहले कवि ने खूब सोचा। खूब सोचा। उन्होंने सोच-विचारकर गीत लिखे। फिर चित्रकार ने उन गीतों के अनुसार चित्र बनाए। इन गीतों और चित्रों को कंप्यूटर में डाला गया। मेरा आकार निश्चित किया गया। उतने आकार के कागज़ काटे गए। फिर छापेखाने में इन कागज़ों पर गीतों और चित्रों को छापा गया। वहाँ से इन्हें जिल्दसाज़ के पास लाया गया।

उसने गीतों को क्रम से लगाकर बाँध दिया। सबसे ऊपर आकर्षक कवर लगाया गया। इस पर मेरा नाम लिखा गया-फुलवारी गीत। इसके नीचे इन गीतों के रचयिता कवि का नाम लिखा गया। मुझे यह रूप जानते हैं किसके कारण मिला? मुझे यह रूप ‘प्रकाशक’ ने दिया। उसकी भाग-दौड़ के कारण मुझे इतना भव्य रूप तो मिला ही, उसने मुझे अलग-अलग नगरों के स्कूलों तक पहुँचाया। उनके कारण ही मैं देश भर के छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में पहुंची। मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं देश भर के सभी बच्चों तक पहुँचूँ। सभी बच्चे मेरे पृष्ठों पर अंकित गीतों को अपने मधुर स्वरों में गाएँ। वे गाते हैं तो मेरे पृष्ठों पर बनी मछली पानी में तैरने लगती है। चुहिया बिल्ली को देखकर बिल में घुस जाती है। गुड़िया नाचने लगती है। हवा फर-फर चलने लगती है। बंदर बाल काटते समय भयभीत हो जाता है। आसमान में टिमटिमाते तारे अपने पास बुलाने लगते हैं। मछली हाथों से फिसल जाती है।

जल में तैरे छम-छम मछली,
उछले कूदे धम-धम मछली,
हाथ नहीं है आती मछली,
झट से फिसल है जाती मछली।

मैं बहुत सुंदर हूँ। मुझे अपनी सुंदरता पर घमंड नहीं है। मैं तो चाहती हूँ सभी पुस्तकें मेरी तरह ही सुंदर हों। उनमें रंग-बिरंगे चित्र हों। उन्हें देखकर बच्चे आनंद से झूम उठे। जिस दिन ऐसा हो जाएगा वह दिन मेरे जीवन का सबसे सुंदर दिन होगा।

If I Were a Teacher Essay In Hindi | यदि मैं अध्यापिका होती पर निबंध

If I Were a Teacher Essay In Hindi यदि मैं अध्यापिका होती पर निबंध
यदि मैं अध्यापिका होती संकेत बिंदु:

  • अध्यापिका क्यों बनना चाहती
  • अध्यापिका की भूमिका
  • आदर्श अध्यापिका

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

यदि मैं अध्यापिका होती पर निबंध | If I Were a Teacher Essay In Hindi

मैं जीवन में अध्यापिका बनना चाहती हूँ। इसके कई कारण हैं। मैं आज की अनेक अध्यापिकाओं से प्रभावित हुई हैं। उनके अनेक गुणों ने मुझे आकर्षित किया है। इसके साथ ही मैंने ऐसी अध्यापिकाएँ भी देखी हैं जो पूर्णतया अध्यापन को समर्पित हैं। ऐसी अध्यापिकाएँ मेरी आदर्श हैं।

यदि मैं अध्यापिका होती तो सबसे पहले मैं अपना सारा ध्यान विद्यार्थियों को सुशिक्षित बनाने में लगा देती। मैं अपने विषय का गहन अध्ययन करती। इससे मैं उस विषय को गहराई से समझा पाती। मैं देखती हूँ कि कई अध्यापिकाओं को विद्यार्थियों द्वारा पूछे प्रश्नों के उत्तर नहीं आते। मैं प्रत्येक विद्यार्थी को प्रश्न पूछने के लिए उत्साहित करके उसकी शंकाओं का समाधान करती।

मेरी कई अध्यापिकाएँ बहुत अच्छी हैं। मैं उनकी तरह शांत रहकर पढ़ाती। पढ़ाई के अतिरिक्त विद्यार्थियों के साथ अपनत्व से बातचीत करती। उनकी व्यक्तिगत समस्याएँ जानकर उनका समाधान करती। कमज़ोर विद्यार्थियों पर अधिक ध्यान देकर उन्हें और अच्छी तरह समझाती। कक्षा के पश्चात् उन्हें बुलाकर पढ़ाती।

मैं विद्यार्थियों को साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए उत्साहित करती। इनसे उनमें सुसंस्कार आते। प्रत्येक विद्यार्थी में कोई-न-कोई गुण अवश्य होता है। उनके उन गुणों को और विकसित करने के अवसर प्रदान करती।

मैं कक्षा में बैठकर न पढ़ाती। कक्षा में खड़े होकर पढ़ाने से प्रत्येक विद्यार्थी अच्छी तरह दिखाई देते हैं। इससे पीछे बैठे विद्यार्थी स्वयं को उपेक्षित नहीं समझते। मैं ब्लैकबोर्ड का प्रयोग भी करती। इसके अतिरिक्त पाठ से जुड़े चार्ट, चित्र आदि लाकर विद्यार्थियों को दिखाती और समझाती।

मैं तड़क-भड़क वाले वस्त्र न पहनती। मेरी वेशभूषा ऐसी होती जिससे विद्यार्थियों में शालीनता आती। मैं चिल्ला-चिल्लाकर नहीं अपितु मधुर स्वर में पढ़ाती। मैं क्रोध को स्वयं से कोसों दूर रखती। मैं कक्षा में अपनी व्यक्तिगत बातें न बताकर केवल पढ़ाई से जुड़ी बातें ही करती। मैं प्रत्येक विद्यार्थी से अपनी संतान के समान स्नेह करती। मैं कक्षा में कविता-पाठ, एकांकी, गायन, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी, अंत्याक्षरी आदि कार्यक्रम कराती।

मैं कक्षा में कभी भी विलंब से न पहुँचती। मैं अपने पारिवारिक कष्टों और समस्याओं की झलक तक विद्यार्थियों पर न पड़ने देती। मैं प्रत्येक विद्यार्थी के साथ मुस्कराकर मिलती। मैं उन्हें हर पल उत्साहित करती रहती।

मैं विद्यार्थियों को शैक्षिक-भ्रमण के लिए ले जाती। उन्हें गाँव में ले जाकर वहाँ के जीवन से परिचित कराती। मैं उन्हें झुग्गी-झोंपड़ियों की बस्तियों में ले जाकर वहाँ रह रहे लोगों के कष्टमय जीवन से साक्षात्कार कराती। अपने नगर के आसपास के महत्वपूर्ण और दर्शनीय स्थानों को दिखाकर विद्यार्थियों का ज्ञानवर्धन कराती।

आदर्श अध्यापिका बनना बहुत कठिन कार्य है। अध्यापिका में माँ-सा स्नेह और धैर्य होना चाहिए। उसमें नेतृत्व-शक्ति होनी चाहिए। उसमें राष्ट्रीयता की भावना कूट-कूटकर भरी होनी चाहिए। उसमें जाति-पाति और धार्मिक भेदभाव की भावना नहीं होनी चाहिए। यदि मैं अध्यापिका होती तो ऐसे समस्त गुणों को स्वयं में समाहित करती। मेरे यही गुण विद्यार्थियों में आते। इससे वे सुशिक्षित ही नहीं संस्कारवान बनते। वे भारत के सच्चे नागरिक बनते। इससे भारत का नया रूप बनता। अध्यापक-अध्यापिकाओं को राष्ट्र-निर्माता यूँ ही नहीं कहा जाता। यदि मैं अध्यापिका होती तो अपने इस उत्तरदायित्व का पालन भी करती।