त्योहारों पर निबंध हिंदी में – Festivals Essay In Hindi

Festivals Essay In Hindi

त्योहारों पर निबंध हिंदी में – Essay On Festivals In Hindi

श्रम से थके-हारे मनुष्य ने समय-समय पर ऐसे अनेक साधन खोजे जो उसे थकान से छुटकारा दिलाए। जीवन में आई नीरसता से उसे छुटकारा मिल सके। इसी क्रम में उसने विभिन्न प्रकार के उत्सवों और त्योहारों का सहारा लिया। ये त्योहार अपने प्रारंभिक काल से ही सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक तथा जनजागृति के प्रेरणा स्रोत हैं।

हमारे त्योहार का महत्व (Hamaare Tyohaar Ka Mahatv)- Importance of our festival

भारत एक विशाल देश है। यहाँ नाना प्रकार की विभिन्नता पाई जाती है, फिर त्योहार इस विभिन्नता से कैसे बच पाते। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराओं तथा धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रक्षाबंधन, दीपावली, दशहरा, होली, ईद, ओणम, पोंगल, गरबा, पनिहारी, बैसाखी आदि त्योहार मनाए जाते हैं। इनमें दीपावली और दशहरा ऐसे त्योहार हैं जिन्हें पूरा भारत तो मनाता ही है, विदेशों में बसे भारतीय भी मनाते हैं। बैसाखी तथा वसंतोत्सव ऋतुओं पर आधारित त्योहार हैं। इस प्रकार यहाँ त्योहारों की कमी नहीं है। आए दिन कोई-न-कोई त्योहार मनाया जाता है।

भारतवासियों को स्वभाव से ही उत्सव प्रेमी माना जाता है। वह कभी प्रकृति की घटनाओं को आधार बनाकर तो कभी धर्म को आधार बनाकर त्योहार मनाता रहता है। इन त्योहारों के अलावा यहाँ अनेक राष्ट्रीय पर्व भी मनाए जाते हैं। इनसे महापुरुषों के जीवन से हमें कुछ सीख लेने की प्रेरणा मिलती है।

गाँधी जयंती हो या नेहरू जयंती इसके मनाने का उद्देश्य यही है। इस तरह त्योहार जहाँ उमंग तथा उत्साह भरकर हमारे अंदर स्फूर्ति जगाते हैं, वहीं महापुरुषों की जयंतियाँ हमारे अंदर मानवीय मूल्य को प्रगाढ़ बनाती हैं। त्योहरों के मनाने के ढंग के आधार पर इसे कई भागों में बाँटा जा सकता है।

कुछ त्योहार पूरे देश में राष्ट्रीय तथा राजनीतिक आधार पर मनाए जाते हैं; जैसे-15 अगस्त, गणतंत्र दिवस, गाँधी जयंती (साथ ही लालबहादुर शास्त्री जयंती) इन्हें राष्ट्रीय पर्व कहा जाता है। कुछ त्योहार अंग्रेजी वर्ष के आरंभ में मनाए जाते हैं; जैसे-लोहिड़ी, मकर संक्रांति। कुछ त्योहार भारतीय नववर्ष शुरू होने के साथ मनाए जाते हैं; जैसे-नवरात्र, बैसाखी, पोंगल, ओणम। पंजाब में मनाई जाने वाली लोहड़ी, महाराष्ट्र की गणेश चतुर्थी. पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा को प्रांतीय या क्षेत्रीय त्योहार कहा जाता है।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, फिर ये त्योहार ही परिवर्तन से कैसे अप्रभावित रहते। समय की गति और समाज में आए परिवर्तन के परिणामस्वरूप इन त्योहारों, उत्सवों तथा पर्वो के स्वरूप में पर्याप्त परिवर्तन आया है। इन परिवर्तनों को विकृति कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। आज रक्षाबंधन के पवित्र और अभिमंत्रित रूप का स्थान बाजारू राखी ने लिया है।

अब राखी बाँधते समय भाई की लंबी उम्र तथा कल्याण की कामना कम, मिलने वाले उपहार या धन की चिंता अधिक रहती है। मिट्टी के दीपों में स्नेह रूपी जो तेल जलाकर प्रकाश फैलाया जाता था, उसका स्थान बिजली की रंग-बिरंगी रोशनी वाले बल्बों ने ले लिया है। सबसे ज्यादा विकृति तो होली के स्वरूप में आई है।

टेसू के फूलों के रंग और गुलाल से खेली जाने वाली होली जो दिलों का मैल धोकर, प्रेम, एवं सद्भाव के रंग में रंगती थी, वह अश्लीलता और हुड़दंग रूपी कीचड़ में सनकर रह गई है। राह चलते लोगों पर गुब्बारे फेंकना, जबरदस्ती ग्रीस, तेल, पेंट पोतने से इस त्योहार की पवित्रता नष्ट हो गई है। आज दशहरा तथा दीपावली के समय करोड़ों रुपये केवल आतिशबाजी और पटाखों में नष्ट कर दिया जाता है।

इन त्योहारों को सादगी तथा शालीनतापूर्वक मनाने से इस धन को किसी रचनात्मक या पवित्र काम में लगाया जा सकता है, जिससे समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर होने में मदद मिलेगी। इससे त्योहारों का स्वरूप भी सुखद तथा कल्याणकारी हो जाएगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि लोग इन त्योहारों को विकृत रूप में न मनाएँ हमारे जीवन में त्योहारों, उत्सवों एवं पर्वो का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

एक ओर ये त्योहार भाई-चारा, प्रेम, सद्भाव, धार्मिक एवं सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ाते हैं तो दूसरी ओर धर्म-कर्म तथा आरोग्य बढ़ाने में भी सहायक होते हैं। इनसे हमारी सांस्कृतिक गरिमा की रक्षा होती है तो भारतीय संस्कृति के मूल्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से पहुँच जाते हैं। ये त्योहार ही हैं जिनसे हमारा अस्तित्व सुरक्षित था, सुरक्षित है और सुरक्षित रहेगा।

हमारे त्योहारों में व्याप्त कतिपय दोषों को छोड़ दिया जाए या उनका निवारण कर दिया जाए तो त्योहार मानव के लिए बहुपयोगी हैं। ये एक ओर मनुष्य को एकता, भाई-चारा, प्रेम-सद्भाव बढ़ाने का संदेश देते हैं तो दूसरी ओर सामाजिक समरसता भी बढ़ाते हैं। हमें इन त्योहरों को शालीनता से मानाना चाहिए, ताकि इनकी पवित्रता एवं गरिमा चिरस्थायी रहे।

विज्ञान की अद्भुत खोज कंप्यूटर पर निबंध – Vigyan Ki Khoj Kampyootar Essay In Hindi

Vigyan Ki Khoj Kampyootar Essay In Hindi

विज्ञान की अद्भुत खोज कंप्यूटर पर निबंध – Essay On Vigyan Ki Khoj Kampyootar In Hindi

सकेत बिंदु :

  • विज्ञान का चमत्कार
  • कंप्यूटर की आवश्यकता
  • अद्भुत क्रांति
  • कंप्यूटर का वर्णन
  • उपयोगिता
  • निष्कर्ष।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

विज्ञान की अद्भुत खोज कंप्यूटर (Vigyaan Kee Adbhut Khoj Kampyootar) – Amazing discovery of science computer

विज्ञान ने मनुष्य को नाना प्रकार की वस्तुएँ उपलब्ध कराकर उसका जीवन सुखमय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है। आज जिघर भी दृष्टि डालिए उसका करिश्मा नजर आता है। उसने अनेक चमत्कारी वस्तुएँ उपलब्ध कराई हैं, मनुष्य जिनकी कल्पना किया करता था। ऐसे ही चमत्कारी यंत्रों में एक है-कंप्यूटर।

वर्तमान युग को कंप्यूटर का युग कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। चारों ओर कंप्यूटर का बोलबाला है। यह आज के युग की आवश्यकता बन गया है। प्रायः सभी छोटे-बड़े कार्यालयों में इसका अनिवार्य रूप से प्रयोग होने लगा है। जैसे पहले मेज पर रखी फाइलें देखकर लगता था कि यह कोई ऑफिस है, आज उसी प्रकार कंप्यूटर देखकर यह अनुमान सहज लगाया जा सकता कंप्यूटर नित नया आकर्षक रूप और आकार ग्रहण करते जा रहे हैं।

पहले इनका बड़ा-सा मॉनीटर परी मेज को घेर लेता था। मेज के नीचे इनका सी.पी.यू. तथा अन्य उपकरण रखे जाते थे। मॉनीटर के सामने बड़ा सा की-बोर्ड रखकर काम किया जाता था पर आज विज्ञान के प्रभाव के कारण मॉनीटर एक दम पतले और छोटे हो गए हैं जिनमें सी.पी.यू. भी शामिल होता है। इनका बोर्ड छोटा और आकर्षक बन गया है। अब इन्हें कम जगह में रखा जा सकता है।

आज कंप्यूटर पर लगभग हर प्रकार का काम किया जा रहा है। लेखा विभाग हो या अन्य विभाग, फाइलें रखने, बनाने, खोने, सँभालने, दीमकों के चट जाने की समस्या खत्म हो गई है। कर्मचारियों के वेतन बिल, कर्मचारियों का लेखा-जोखा, लाखों-करोड़ों खातों का काम इसमें सुरक्षित रहता है। बस एक क्लिक करते ही मन चाहा आँकड़ा हमारे सामने होता है। रेल, मोटर, वायुयान आदि के टिकटों का आरक्षण कंप्यूटर की मदद से किया जाता है।

बिजली, पानी, विभिन्न प्रकार के टैक्स, फोन आदि के बिल, राशन कार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाण इसकी मदद से बनाए जाते हैं। विद्यालयों के अभिलेख, उनसे संबंधित पत्राचार एवं प्रमाण-पत्रों का लेन-देन अब कंप्यूटर ने सुगम कर दिया है। चिकित्सा क्षेत्र में कंप्यूटर ने क्रांति ला दी है। विभिन्न जाँचों की रिपोर्ट इसकी मदद से बनने लगी हैं, जिसमें गलतियों की संभावना न के बराबर होती है। पुस्तकीय छपाई और चित्रांकन को कंप्यूटर ने नया रूप देकर आकर्षक बना दिया है।

कंप्यूटर ने मनोरंजन को नया रूप प्रदान किया है। अब बच्चों को धूल-मिट्टी और धूप में खेलने की आवश्यकता नहीं रही। वे घर में कंप्यूटर पर विविध प्रकार के खेल-खेलकर अपना मनोरंजन करते हैं।

कंप्यूटर समय, धन, और श्रम बचाने वाला अद्भुत उपकरण है। यह दैनिक जीवन की जरूरत बनता जा रहा है, पर हमें इसके साथ अधिक समय बिताने से बचना चाहिए।

महंगाई पर निबंध – Mehangai Par Nibandh In Hindi

Mehangai Par Nibandh In Hindi

महंगाई पर निबंध – Hindi Mein Mehangai Par Nibandh

सकेत बिंदु:

  • दीर्घकालिक परेशानी-महँगाई
  • निम्न और मध्य-वर्ग सर्वाधिक परेशान
  • राजनैतिक पार्टियाँ व नेता जिम्मेदार
  • महँगाई बढ़ने के कारण
  • महँगाई रोकने के उपाय।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

जीना मुश्किल करती महँगाई (Jeena Mushkil Karti Mehangai) – Inflation makes it difficult to live

संघर्ष का दूसरा नाम ही जीवन है। मनुष्य को जीवन में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इनमें से कुछ समस्याएँ अल्पकालिक होती हैं तो कुछ आजीवन चलती हैं। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए ऐसी ही दीर्घकालिक परेशानी का नाम है-महँगाई।

वर्तमान में निम्न और मध्यमवर्ग महँगाई से सबसे ज्यादा परेशान है। यह मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं रोटी, कपड़ा, और मकान पर सर्वाधिक चोट करती है। सरकारी आँकड़ों में यह भले ही स्थिर दिखे या अल्पकाल के लिए कुछ कम हो पर सत्य तो यह है कि निरंतर बढ़ती ही रहती है।

सरकार भी अपना पल्ला झाड़ने के उद्देश्य से पहले तो मौसम, प्रकृति आदि के प्रतिकूल होने का बहाना बनाती है, फिर इसका दोष दूसरों पर डालकर अपना पल्ला झाड़ लेती है।

चुनाव करीब आते ही हमारे तथाकथित भाग्यविधाता गरीबों का वोट पाने के लालच में महँगाई कम करने का दिवास्वप्न दिखाते हैं, पर चुनाव जीतते ही अपनी सुविधाएँ अपना वेतन-भत्ता बढ़ाकर उसका भार आम जनता पर डाल देते हैं।

चुनाव से पूर्व विभिन्न राजनैतिक पार्टियाँ औद्योगिक इकाइयों से गुप्त से चंदे के नाम पर मोटी रकम वसूलती हैं। चुनाव के बाद इन इकाइयों के मालिक अपने उत्पादों पर मनमर्जी मूल्य वृद्धि करते हैं। उन्हें कोई रोकने वाला नहीं होता है क्योंकि रिश्वत रूपी चंदा पहले ही दिया जा चुका होता है।

महँगाई बढ़ने का प्रमुख कारण है-माँग और पूर्ति के बीच असंतुलन होना। जब किसी वस्तु की आपूर्ति कम होती है और माँग बढ़ती है तो वस्तुओं का मूल्य स्वयमेय बढ़ जाता है क्योंकि अधिक क्रयशक्ति रखने वाले लोग उसे ऊँचे दाम पर खरीद लेते हैं। प्राकृतिक प्रकोप जैसे-बाढ़, सूखा, अतिवृष्टि भूकंप आदि महँगाई बढ़ाने में सहायक होते हैं।

इनसे खेती की उपज घट जाती है और खाद्यान्न व अन्य वस्तुएँ बाहर से मँगानी पड़ती हैं। जमाखोरी, काला बाज़ारी आदि मानव निर्मित कारण हैं। इसके अलावा दोषपूर्ण वितरण प्रणाली, असफल सरकारी नियंत्रण तथा मनुष्य की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति भी इसके लिए उत्तरदायी हैं।

महँगाई रोकने के लिए सरकार और व्यापारी वर्ग दोनों को आगे आना होगा। सरकार को वितरण प्रणाली सुव्यवस्थित तथा सुचारु बनानी होगी। प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों से दैनिकोपयोगी वस्तुएँ शीघ्रातिशीघ्र उपलब्ध करानी होंगी।

जमाखोरों और कालाबाजारी करने वाले पर कड़ा जुर्माना लगाते हुए कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए। इसके अलावा सरकार को अपने खर्चों में कटौती करना चाहिए। धनाढ्य वर्ग को अपनी विलासितापूर्ण जीवन शैली में बदलाव लाना चाहिए तथा ऐसे लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए जो अपनी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संघर्षरत हैं।

देश के प्रति मेरा कर्त्तव्य पर निबंध – My Duty Towards My Country Essay In Hindi

My Duty Towards My Country Essay In Hindi

देश के प्रति मेरा कर्त्तव्य पर निबंध – Essay On My Duty Towards My Country In Hindi

संकेत बिंदु :

  • देश सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण
  • देश के प्रति लगाव
  • देश के प्रति ईमानदारी
  • देश के प्रति सम्मान
  • निःस्वार्थ प्रेम
  • कर्तव्य का भली प्रकार से निर्वहन।

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‘देश हमें देता है सब कुछ हम भी तो कुछ देना सीखें।’ यह पंक्ति हमें उनके कर्तव्यों की याद दिला रही है जो किसी देश के प्रति वहाँ के निवासियों के होने चाहिए। हम मातृऋण, पितृऋण की बात तो करते हैं पर देश के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं, जो इन ऋणों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है।

कोई भी व्यक्ति जिस देश में जन्म लेता है, उसका अन्न, जल ग्रहण कर पोषित होता है, जिसकी रज में लोट-लोटकर पुष्ट बनता है, उस देश की मातृभूमि के प्रति माता के समान सम्मान भाव रखना चाहिए। उस देश के राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए। व्यक्ति में देश-प्रेम, देशभक्ति की उत्कट भावना होनी चाहिए और मातृभूमि पर आँख उठाने वालों को मुँह तोड़ जवाब देना । चाहिए तथा आवश्यकता पड़ने पर अपना सर्वस्व अर्पित कर देना चाहिए।

किसी देश के प्रति वहाँ के नागरिकों को कर्तव्य बनता है कि वे उसकी प्रगति में भरपूर योगदान दें। राष्ट्र को स्वावलंबी बनाने में मदद करें। देशवासी ऐसा तभी कर सकते हैं जब वे अपने-अपने कार्य को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से करें। देश को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए वहाँ के नागरिकों को ईमानदारीपूर्वक करों का भुगतान करना चाहिए।

देश के नागरिक कहीं भी हों किसी भी हाल में हों, उन्हें राष्ट्र के सम्मान का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। हमें कोई ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए, जिससे राष्ट्र के सम्मान पर आँच आए। हमें राष्ट्र-सम्मान को आहत करने वाली बातें भी नहीं करनी चाहिए। हमें उस जापानी नवयुवक, जिसने स्वामी रामकृष्ण को फलों का टोकरा देते हुए यह कहा था कि ‘आप अपने देश जाकर यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते हैं की तरह कार्य-व्यवहार कर राष्ट्र का मान-सम्मान बढ़ाने वाला कार्य करना चाहिए।

एक नागरिक के रूप में हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम देशद्रोह जैसे किसी काम में शामिल न हों। हम आतंकवादियों या देशद्रोहियों के बहकावे में न आएँ और राष्ट्र विरोधी किसी कार्य को अंजाम न दें। देखा गया है कि कुछ लोग अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए या थोड़े से धन के लोभ में देश की गुप्त सूचनाएँ, आतंकवादियों या विदेशियों को देकर देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करते हैं और देश को खतरा पैदा करते हैं।

हमें देश में व्याप्त बुराइयों की रोकथाम के लिए भी यथासंभव सहयोग देना चाहिए। इसके आलावा प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छता, वृक्षारोपण, सर्वशिक्षा अभियान जैसे कार्यक्रमों में समय-समय पर भाग लेकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए, ताकि देश सफलता एवं उन्नति की ओर बढ़ता रहे।

चुनाव स्थल के दृश्य का वर्णन निबन्ध – An Election Booth Essay In Hindi

An Election Booth Essay In Hindi

चुनाव स्थल के दृश्य का वर्णन निबन्ध – Essay On An Election Booth In Hindi

संकेत बिंदु:

  • भारत एक लोकतांत्रिक देश
  • दिल्ली नगर निगम का चुनाव 2012
  • मतदान केंद्र का वर्णन
  • दो पार्टियों ।
  • में झगड़ा
  • पुलिस द्वारा बीच-बचाव।

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मतदान केंद्र का आँखों देखा वर्णन (Matdan Kendra Ka Aankhon Dekha Varnan) – Polling station eyes seen description

स्वतंत्रता के बाद भारत में लोकतंत्र की स्थापना हुई। भारत एक लोकतांत्रिक देश बना। लोकतांत्रिक सरकार के गठन में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य निष्पक्ष मतदान का प्रावधान किया गया। जनता अपना बहुमूल्य मत देकर अपने प्रतिनिधि चुनकर राज्य की विधानसभाओं और संसद में भेजती है।

अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए लोग मतदान करते वर्तमान में दिल्ली को राज्य का दर्जा प्रदान किया गया है, जिसकी विधानसभा और नगर निगम के लिए प्रत्येक पाँच वर्ष पर चुनाव होते हैं। 2012 में हुए नगर निगम के चुनाव के एक मतदान केंद्र पर मुझे पिता जी के साथ जाने का अवसर मिला, जहाँ मुझे यह विशेष अनुभव प्राप्त हुआ।

मैं चुनाव के दिन लगभग 11 बजे मतदान केंद्र पहुँचा। यह केंद्र द्वारका में स्थित था। मतदान केंद्र के बाहर सड़क पर बहुत से लोग और विभिन्न पार्टियों के कार्यकर्ता जमा थे। वे अपनी-अपनी पार्टी के झंडे और बैनर टाँगे थे। कुछ तख्त पर यूँ बैठे थे, मानो दुकानदार हों। वे लोगों को पर्चियों देने का प्रयास कर रहे थे, जिन पर पता, मतदाता क्रमांक, बूध संख्या आदि लिखे थे। मैंने उत्साहपूर्वक पिता जी के नाम की पर्ची ले ली।

मतदान केंद्र के बड़े से द्वार पर सशस्त्र जवान तैनात थे। वे गहन तलाशी के बाद ही अंदर प्रवेश की अनुमति दे रहे थे। उन्होंने पिता जी के अनुरोध पर मुझे भी अंदर जाने दिया। अंदर कई-कई कतारें लगी थीं। सभी कतारों के लिए अलग-अलग बूथ बने थे।

धूप थी, पर मन में उमंग थी, सो मैं भी पिता जी के साथ लाइन में लग गया। इतने में एक बूथ पर अंदर कुछ लोगों के झगड़ने की आवाजें आने लगीं। बाद में पता चला कि किसी पार्टी का एजेंट किसी को विशेष चुनाव-चिहून का बटन दबाने को कह गया था, जिस पर दूसरे लोगों ने आपत्ति की।

मैंने देखा कि सभी कतारों में युवा, प्रौढ़ और वृद्ध उत्साहपूर्वक अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे।

करीब बीस मिनट बाद मैं भी पिता जी के साथ अंदर गया। वहाँ आवश्यक कार्यवाही के बाद कोने में रखी ई.वी.एम. का बटन दबाते ही विप बज उठी और मतदान हो गया। मैं पिता जी के साथ हर्षोल्लास के साथ बाहर आ गया। अभी कैंपस के बाहर निकल ही रहा था कि कुछ कार्यकर्ता अपने नेता के समर्थन में नारे लगाने लगे।

अपने नेता को देख वे जोश में होश खोकर दूसरी पार्टी के नेता को अपशब्द कह बैठे, जिसका उस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी अपशब्दों से ही जवाब दिया। अब तक झगड़ा शुरू हो गया। वे मारपीट पर उतारू हो गए, पर सतर्क पुलिस के जवानों ने स्थिति सँभाल ली और उनके नेता को वहाँ से हटाया, तब स्थिति सामान्य हो सकी। मतदान केंद्र का एक नया अनुभव लिए मैं घर वापस आ गया।

विज्ञापन के प्रभाव – Paragraph Speech On Vigyapan Ke Prabhav Essay In Hindi

Paragraph Speech On Vigyapan Ke Prabhav Essay In Hindi

विज्ञापन के प्रभाव – Paragraph Speech On Vigyapan Ke Prabhav Essay In Hindi

संकेत बिंदु :

  • विज्ञापन का अर्थ
  • विज्ञापन का प्रभाव
  • विज्ञापन से लाभ
  • विज्ञापन भारतीय
  • संस्कृति के लिए घातक।

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विज्ञापन-कितने सच्चे कितने झूठे (Vigyapan Kitne Sache Kitne Jhoothe)- Advertisement – How True How False

मनुष्य अपने जीवन को सुख-सुविधामय बनाने के लिए विभिन्न वस्तुओं का उपयोग और उपभोग करता है। उसे लगने लगा है कि उपभोग ही सुख है। उस पर पाश्चात्य उपभोक्तावाद का असर हो रहा है, इसी का फायदा उठाकर उत्पादक अपनी वस्तुओं को बढ़ा-चढ़ाकर उसके सामने प्रस्तुत करते हैं। इसे ही विज्ञापन कहा जाता है। आजकल इसका प्रचार-प्रसार इतना अधिक हो गया है कि वर्तमान को विज्ञापन का युग कहा जाने लगा है।

विज्ञापन ने हमारे जीवन को अत्यंत गहराई से प्रभावित किया है। यह हमारा स्वभाव बनता जा रहा है कि दुकानों पर वस्तुओं के उन्हीं ब्रांडों की माँग करते हैं जिन्हें हम समाचार पत्र, दूरदर्शन या पत्र-पत्रिकाओं में दिए गए विज्ञापनों में देखते हैं। हमने विज्ञापन में किसी साबुन या टूथपेस्ट के गुणों की लुभावनी भाषा सुनी और हम उसे खरीदने के लिए उत्सुक हो उठते हैं।

विज्ञापनों की भ्रामक और लुभावनी भाषा बच्चों पर सर्वाधिक प्रभाव डालती है। बच्चे चाहते हैं कि वे उन्हीं वस्तुओं का प्रयोग करें जो शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन या प्रियंका चोपड़ा द्वारा विज्ञापित करते हुए बेची जा रही हैं। वास्तव में बच्चों का कोमल मन और मस्तिष्क यह नहीं जान पाता है कि इन वस्तुओं के सच्चे-झूठे बखान के लिए ही उन्होंने लाखों रुपये एडवांस में ले रखे हैं।

यह विज्ञापनों का असर है कि हम कम गुणवत्ता वाली पर बहुविज्ञापित वस्तुओं को धड़ल्ले से खरीद रहे हैं। दुकानदार भी अपने उत्पाद-लागत का बड़ा हिस्सा विज्ञापनों पर खर्च कर रहे हैं और घटिया गुणवत्ता वाली वस्तुएँ भी उच्च लाभ अर्जित करते हुए बेच रहे हैं। उत्पादनकर्ता मालामाल हो रहे हैं और उपभोक्ताओं की जाने-अनजाने जेब कट रही है।

विज्ञापन का लाभ यह है कि इससे हमारे सामने चुनाव का विकल्प उपस्थित हो जाता है। किसी उत्पादक विशेष का बाज़ार से एकाधिकार खत्म हो जाता है। उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्य और गुणवत्ता का तुलनात्मक अध्ययन कर आवश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं, परंतु इसके लिए इनकी लुभावनी भाषा से बचने की आवश्यकता रहती है।

विज्ञापन भारतीय संस्कृति के लिए हितकारी नहीं। आज कोई भी विज्ञापन हो या किसी आयुवर्ग के विज्ञापन हों, पुरुषोपयोगी वस्तुओं का विज्ञापन हो, बच्चों या महिलाओं के प्रयोग की वस्तुओं का विज्ञापन हो, नारी के नग्नदेह के बिना पूरा नहीं होता। अनेक विज्ञापन परिवार के सदस्यों के साथ नहीं देखे जा सकते हैं।
एक ओर विज्ञापनों से वस्तुओं का मूल्य बढ़ रहा हैं, तो दूसरी ओर बच्चों का कोमल मन विकृत हो रहा है और वे जिद्दी होते जा रहे हैं। विज्ञापनों में छोटे होते जा रहे नायक-नायिका के वस्त्रों को देखकर युवावर्ग में भी अधनंगानप बढ़ रहा है। गरीब और मध्यम वर्ग का वजट विज्ञापनों के कारण बिगड़ रहा है। हमें बहुत सोच-समझकर ही विज्ञापनों पर विश्वास करना चाहिए।

रेलवे प्लेटफार्म का दृश्य पर निबंध – Railway Platform Ka Drishya Essay In Hindi

Railway Platform Ka Drishya Essay In Hindi

रेलवे प्लेटफार्म का दृश्य पर निबंध – Essay On Railway Platform Ka Drishya In Hindi

संकेत बिंदु :

  • भूमिका
  • पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का आँखें देखा वर्णन
  • टिकट लेने के दौरान संघर्ष
  • कोलाहलपूर्ण वातावरण
  • भीड़ देखकर वापस घर आना।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

घूमना-फिरना मनुष्य के स्वभाव का अंग है। वर्तमान की भागमभाग वाली जिंदगी में उसे कुछ ज्यादा ही घूमने-फिरने का अवसर मिल जाता है। पिछली गर्मियों में मुझे भी अपने मित्र के साथ हरिद्वार जाने का अवसर मिला, जब मैंने रेलवे स्टेशन पर ऐसा दृश्य देखा जो लंबे समय तक याद रहेगा।

रेल यात्रा द्रुतगामी और आरामदायक साधन है, यही सोचकर हम दोनों मित्रों ने रेल से हरिद्वार जाने का निर्णय लिया। जल्दी में वहाँ जाने का कार्यक्रम बनाने के कारण हमारा आरक्षण नहीं हो पाया और हमें अनारक्षित डिब्बे में यात्रा करना था। हमें रात दस बजे की ट्रेन पकड़नी थी। अतः हम आटो से साढ़े आठ बजे ही पुरानी दिल्ली स्टेशन पर पहुँच गए।

मैं रेलवे स्टेशन के बाहर का दृश्य देखकर चकित ह गया। भव्य एवं विशाल स्टेशन के बाहर सड़क के किनारे स्कूटर, मोटर साइकिल, आटोरिक्शा, टैक्सी की भीड़ थी। कुछ सवारियाँ ला रहे थे तो कुछ गंतव्य की ओर जा रहे थे और बाकी सवारियों के इंतजार में खड़े थे। खाली जगहों पर लोग चादर बिछाए लेटे थे। बड़ी मुश्किल से हम अंदर गए।

टिकट काउंटर पर लंबी-लंबी कतारें लगी थीं। कुछ लोग खिड़की के पास बिना कतार के टिकट लेने की अनधिकृत चेष्टा कर रहे थे। हम पसीने में नहा रहे थे। ‘जेबकतरों से सावधान’ का बोर्ड पढ़कर मैं गर्मी को भूलकर सजग हो उठा। करीब चालीस मिनट बाद हमारा नंबर आया। हम टिकट लेकर प्लेटफार्म की ओर चले।

प्लेटफार्म पर कुछ लोगों के पास इतना सामान था कि दो-दो कुली उन्हें उठा रहे थे। प्लेटफार्म पर सामान और आदमियों के कारण तिल रखने की भी जगह नहीं बची थी। धक्का-मुक्की के कारण बुरा हाल था। चारों ओर शोर-ही-शोर था। कहीं बेंडर्स की आवाजें तो किसी अन्य प्लेटफार्म पर आती-जाती ट्रेन का। यात्रियों का शोर इन सबसे बढ़कर था। अत्यंत कोलाहलपूर्ण वातावरण था।

प्लेटफार्म पर अत्यंत छोटे-छोटे स्टॉल थे। इन पर अखबार विभिन्न प्रकार की पत्र-पत्रिकाएँ, चाय, बिस्कुट, पान, सिगरेट, खाने की वस्तुएँ (खाना), शीतल पेय, पर्स, बेल्ट, रूमालें, सुराहियाँ, गिलास आदि बिक रहे थे। लोग पानी की बोतलें, चाय, खाने-पीने की वस्तुएँ अधिक खरीद रहे थे, पर अधिक दाम लेने के कारण दुकानदारों से लड़-झगड़ रहे थे।

इतने में दूसरी ओर पटरी पर ट्रेन आकर रुकी। ठहरी भीड़ में हलचल मच गई। धक्का-मुक्की मच गई। यात्री चढ़ने-उतरने लगे और कुली डिब्बों की ओर भागने लगे। भगदड़ जैसा दृश्य उत्पन्न हो गया। इसी बीच हरिद्वार जाने वाली ट्रेन आ गई। जनरल डिब्बे की भीड़ देख हमारे पसीने छूट गए। लोग पहले से ही गेट और पायदान पर लटके थे। लाख प्रयास के बाद भी हम डिब्बे में न जा सके। मेरी जेब कट चुकी थी। मित्र के पास बचे पैसों से हम किसी तरह घर लौटकर आ सके।

पुस्तक मेला पर निबंध – Book Fair Essay In Hindi

पुस्तक मेला पर निबंध – Essay On Book Fair In Hindi

संकेत बिंदु:

  • पुस्तकें ज्ञान का भंडार
  • पुस्तक मेलों का उद्देश्य
  • बढ़ती लोकप्रियता
  • उपयोगिता
  • ज्ञान के आलोक को फैलाने में पुस्तक मेलों का योगदान।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

पुस्तकें ज्ञान का भंडार होती हैं। इनमें हर तरह का ज्ञान भरा होता है। ये मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती हैं। पुस्तकें सच्चे पथप्रदर्शक का काम करती हैं जो मनुष्य को गलत राह पर चलने से सदैव रोकती हैं। जनसाधारण तक ये सुगमता से पहुँच सकें, इसके लिए समय-समय पर पुस्तक मेलों का आयोजन किया जाता है।

लोगों की पुस्तकों से निकटता बढ़ाने के लिए, उनमें पठन की अभिरुचि पैदा करने के उद्देश्य से पुस्तक और पाठकों के मध्य दूरी कम करना आवश्यक है। इसके अलावा पुस्तकें छपकर यदि दुकानों तक सीमित रह जाती हैं या पुस्तक केंद्रों की शोभा बढ़ाती हैं तो आम आदमी उनसे अनभिज्ञ ही रह जाता है। ऐसे में पुस्तकों का प्रचार-प्रसार करना जरूरी हो जाता है। इस उद्देश्य के पूर्ति में पुस्तक मेले महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अब ऐसे मेलों की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है।

पुस्तक मेले कितने उपयोगी हैं? इस पर दो राय हैं। पहली राय यह कि ये मेले दिखावा बनकर रह जाते हैं। पाठक वर्ग इन तक नहीं पहुँचता है। ये मेले वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति में सफल नहीं हो पाते हैं। इसके विपरीत दूसरी राय यह है कि पुस्तक मेले अत्यंत उपयोगी होते हैं। जनसाधारण तक पुस्तकें पहुँचाने, पुस्तकों के विज्ञापन प्रकाशकों की बिक्री बढ़ाने का, ये सशक्त माध्यम हैं।

मेरे विचार से पुस्तक मेलों का आयोजन अत्यंत उपयोगी होता है। कई बार ऐसा होता है कि एक पुस्तक को खोजने के लिए हमें बाज़ार की कई दुकानों पर चक्कर लगाना पड़ता है। उपलब्ध न होने पर किसी अन्य बाज़ार में चक्कर लगाना पड़ता है। पुस्तक मेलों में एक ही प्रयास में विभिन्न प्रकाशकों, लेखकों, सुविख्यात विचारकों की पुस्तकें मिल जाती हैं।

यहाँ देश के ही नहीं विदेश के प्रकाशक भी अपना स्टॉल लगाते हैं, जिससे दुर्लभ पुस्तकें भी मिल जाती हैं। इतना ही नहीं ग्राहकों को लुभाने और अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए वे विशेष छूट भी देते हैं। ऐसे में पाठकों और क्रेताओं को दोहरा लाभ होता है।

पुस्तक मेलों का आयोजन और भी उपयोगी एवं लोकप्रिय हो सकता है, यदि इन्हें शहर में अनेक जगहों पर आयोजित किया जाए तथा इनके आयोजन के पूर्व संचार माध्यमों से विधिवत लोगों को जानकारी दी जाए। पुस्तकों को कम-से-कम मूल्य पर बेचा जाए, जिसमें प्रकाशकों को भी घाटा भी न हो और पाठकों को लाभ भी मिल जाए।

पुस्तक मेलों की उपयोगिता निस्संदेह है। गरीब विद्यार्थियों और पाठकों के लिए इनकी उपयोगिता और भी बढ़ जाती है। ज्ञान का आलोक फैलाने के लिए ऐसे मेलों का आयोजन किया जाना आवश्यक है।

बरसात का एक दिन पर निबंध – Barsat Ka Din Essay In Hindi

Barsat Ka Din Essay In Hindi

बरसात का एक दिन पर निबंध – Essay On Barsat Ka Din In Hindi

संकेत बिंदु :

  • भारत की ऋतुएँ
  • वर्षा का इंतजार
  • गर्मी से प्रकृति एवं व्यक्ति का बुरा हाल
  • तेज वर्षा का वर्णन
  • वर्षा का आनंद।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

वर्षा ऋतु का पहला दिन (Varsha Ritu Ka Pehla Din) – First day of rainy season

भारत में छह ऋतुएँ पाई जाती हैं-ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर और वसंत। इनमें वसंत को ऋतुराज और वर्षा को ‘ऋतुओं की रानी’ कहा जाता है। वास्तव में ‘वर्षा’ ही वह ऋतु है जिसका लोगों द्वारा सर्वाधिक इंतजार किया जाता है।

कुछ समय पूर्व तक भारतीय कृषि को ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता था। भारतीय कृषि पूरी तरह से वर्षा पर निर्भर होती थी तथा गर्मी के मारे पशु-पक्षी, मनुष्य सभी बेहाल हो जाते थे। छोटी-छोटी वनस्पतियाँ सूख जाती थीं, धरती गर्म तवा जैसी हो जाती थी, ऐसे में सभी अत्यंत उत्सुकता से वर्षा का इंतजार करते थे।

मुझे याद है-आषाढ़ माह के पंद्रह दिन यूँ ही तपते-तपते बीत चुके थे। गर्मी अपने चरम पर थी। सभी को वर्षा का इंतजार था, परंतु बादल मानो रूठ चुके थे। बच्चे कई बार टोली बनाकर जमीन पर लोट-लोटकर ‘काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे’ कहकर बादलों को बुला चुके थे, पर सब बेकार सिद्ध हो रहा था।

दोपहर का समय था। अचानक बादलों के कुछ टुकड़ों ने पहले तो सूर्य को ढंक लिया, फिर वे पूरे आसमान में छा गए। देखते-ही-देखते हवा में शीतलता का अहसास होने लगा। दिन में ही शाम होने का एहसास होने लगा। अचानक बिजली चमकी, बादलों ने अपने आने की सूचना मानो सभी को दी और आसमान से शीतल बूँदें गिरने लगीं। ये बूंदें घनी और बड़ी होने लगीं। धीरे-धीरे झड़ी लगी। हवा के एक-दो तेज झोंके आए और वर्षा शुरू हो गई।

वर्षा का वेग बढ़ने के साथ-साथ हमारे मन में उत्साह एवं उल्लास बढ़ता जा रहा था। हम बच्चे कब रुकने वाले थे। हम नहाने के लिए घर से निकल आए। ग्रीष्म ऋतु ने हमें जितना तपाया था, वह सारी तपन हम वर्षा में शीतल कर लेना चाहते थे। वर्षा भी कितनी शीतल और सुखद लगती है, यह तो भीगने वालों से ही जाना जा सकता है, पर मेघ की गरजना सुनकर आम आदमी क्या सीता विहीन श्रीराम भी डरने लगे थे-

“घन घमंड गरजत नभ घोरा।
प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।”

दो घंटे की लगातार वर्षा में सब कुछ जलाशमय हो गया। खेत, बाग, गलियाँ नीची जगहें तालाब का रूप धारण कर चुकी थीं। पेड़-पौधे नहाए-धोए प्रसन्नचित्त लगने लगे थे। लोगों के चेहरों पर छायी मायूसी गायब हो चुकी थी। जंगल की ओर से मयूरों की कर्णप्रिय आवाज़ अब भी आ रही थी। किसान खेत की ओर चल पड़े। ऐसे में हम बच्चे कहाँ शांत बैठने वाले थे, हम भी कागज की नावें लिए तालाब की ओर चल पड़े क्योंकि हमें भी जल-क्रीड़ा का आनंद लेना था।

मेरा प्रिय खेल-क्रिकेट पर निबंध – My Favorite Game Cricket Essay In Hindi

My Favorite Game Cricket Essay In Hindi

मेरा प्रिय खेल-क्रिकेट पर निबंध – Essay On My Favorite Game Cricket In Hindi

सकेत बिंदु:

  • खेलों का महत्त्व
  • सर्वाधिक लोकप्रिय खेल क्रिकेट
  • खेल के नियम
  • क्रिकेट के प्रकार
  • प्रमुख खिलाड़ी।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

खेल का नाम आते ही मन उत्साह एवं उल्लास से भर उठता है। खेलना-कूदना सभी को अच्छा लगता है, विशेषतः बच्चों द्वारा अपनी रुचि, आयु, पंसद आदि के आधार पर खेलों को पसंद किया जाता है और खेला जाता है। हालाँकि मुझे क्रिकेट सर्वाधिक पसंद है।

क्रिकेट को आउटडोर खेलों की श्रेणी में रखा जाता है। यह विश्व के कुछ ही देशों में खेला जाता है, परंतु इसे देखने और पसंद करने वाले बहुत से देश हैं। युवावर्ग इस खेल को पागलपन की हद तक पसंद करता है। जब यह खेल विश्व के दो देशों के बीच खेला जाता है तो स्टेडियम में मैच न देख पाने वाले लोग टेलीविजन और रेडियो से चिपके होते हैं।

क्रिकेट एक बड़े-से मैदान में खेला जाता है। मैदान के बीचोबीच बाईस गज लंबी पिच होती है। इसके निर्धारण के लिए दोनों किनारों पर तीन तीन विकेट खड़े किए जाते हैं। यह दो टीमों के बीच खेला जाता है। प्रत्येक टीम में ग्यारह-ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। इस खेल में निर्णय देने के लिए दो अंपायर भी होते हैं। मैदान के बाहर एक तीसरा अंपायर होता है जो टीवी पर रिप्ले देखकर जटिल मामलों में फैसले देता है। एक टीम के खिलाड़ी मैदान में फैलकर गेंद को बाहर जाने से रोकते हैं और दूसरी टीम के दो खिलाड़ी बल्लेबाजी करते हैं।

क्रिकेट में हार-जीत का फैसला बनाए गए रनों के आधार पर होता है। जो टीम अधिक रन बनाती है या जिस टीम के कम खिलाडी आउट होते हैं, वही विजयी घोषित कर दी जाती है। बल्लेबाज दुवारा गेंद को हिट करने पर यदि वह निर्धारित सीमा रेखा छू जाती है तो चार रन और उसके ऊपर से होकर सीमा रेखा से बाहर गिरने पर छह रन माने जाते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट को आजकल तीन प्रारूपों में खेला जाता है-टेस्ट मैच, यह पाँच दिनों तक खेला जाता है। प्रत्येक दिन 90 ओवर अर्थात् 540 गेंदें फेंकनी होती हैं। इसमें हार-जीत का फैसला कम हो पाता है। अतः आजकल इसकी लोकप्रियता घटती जा रही है। इसका दूसरा प्रारूप एक दिवसीय मैच है, जिसमें प्रत्येक टीम पचास-पचास ओवर खेलती है।

इसमें हार-जीत का फैसला हो जाता है जो बहुत ही लोकप्रिय है। इसका तीसरा प्रारूप टी-20 नाम से प्रसिद्ध है। इसमें प्रत्येक टीम 20-20 ओवर खेलती है। आजकल यह बहुत ही लोकप्रिय है। इसे फटाफट क्रिकेट भी कहा जाता है। भारत में खेले जाने वाला आई.पी. एल., जिसमें विश्व के प्रमुख देशों के मुख्य खिलाड़ी खेलते हैं, दुनियाभर में बहुत ही लोकप्रिय हो रहा है। अब तक आई.पी.एल. का 6 बार सफल आयोजन किया जा चुका है।

सचिन तेंदुलकर, महेंद्रसिंह धोनी, वीरेंदर सहवाग, जहीर खान, सुरेश रैना आदि प्रसिद्ध भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी हैं।