Health Is Wealth Essay In Hindi

स्वास्थ्य ही धन है पर निबंध – Health Is Wealth Essay In Hindi

“स्वास्थ्य ही धन है” पर छोटे तथा बड़े निबंध (Essay on Health is Wealth in Hindi)

बढ़ते अस्पताल : घटता स्वास्थ्य – पहला सुख निरोगी काया। (Growing Hospital: Declining Health – The First Joyous Body)

रूपरेखा-

  • प्रस्तावना,
  • स्वास्थ्य एक वरदान,
  • अस्वस्थता के कारण,
  • स्वास्थ्य-सुविधाओं की भूमिका,
  • चिकित्सा पर निर्भरता का परिणाम,
  • स्वस्थ जीवनचर्या ही आशा का केन्द्र,
  • उपसंहार।

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

प्रस्तावना-
ईश्वर या प्रकृति ने मनुष्य को दवाओं के साथ पैदा नहीं किया। दवाएँ आदमी ने बनायीं। दवाओं की आवश्यकता अस्वस्थ होने पर पड़ी। पशुओं को देखें-पालतू पशुओं को नहीं-स्वाभाविक और मुक्त जीवन बिताने वाले पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि। इन प्राणियों ने किसी चिकित्सा-प्रणाली की खोज नहीं की। न कोई अस्पताल ही खोले, पर वे मनुष्य से अधिक स्वस्थ हैं, अपनी पूरी आयु तक जीते हैं।

इसका सीधा-
सा अर्थ यही है कि केवल चिकित्सा की सुविधाएँ बढ़ने से मनुष्यों का स्वस्थ रहना सम्भव नहीं है। आज जितने अस्पताल बढ़ते जा रहे हैं उतने ही रोग भी बढ़ते जा रहे हैं। अत: स्वस्थ रहने के लिए क्या उपाय होने चाहिए, इस पर विचार करना आवश्यक है।

स्वास्थ्य एक वरदान-अनेक प्रकार के सुख मनुष्य-जीवन में माने गये हैं। सुन्दर वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन, भव्य निवास, सुखद मनोरंजन, वंशवृद्धि, शक्ति और अधिकार प्राप्ति आदि-आदि सुखों के विविध स्वरूप हैं। किन्तु गहराई में देखें तो शरीर की नीरोगता या स्वस्थता ही सबसे बड़ा सुख है। तभी तो कहा गया है- “पहला सुख निरोगी काया”।

सारे सुखों का आनन्द स्वस्थ व्यक्ति ही उठा सकता है। कहावत है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। अस्वस्थ व्यक्ति का जीवन उमंगरहित, पराश्रित और असन्तोष से पूर्ण रहता है।

अस्वस्थता के कारण-
वातावरण का प्रदूषण, अनियमित दिनचर्या, विषम जलवायु, संक्रमण, असन्तुलित भोजन, कुपोषण, अनियन्त्रित आचरण तथा स्वास्थ्य के प्रति उदासीनता आदि अस्वस्थता के प्रमुख कारण हैं। स्वास्थ्य का सम्बन्ध तन और मन दोनों से है। केवल शरीर की स्वस्थता ही पर्याप्त नहीं है, मन का स्वस्थ होना भी परम आवश्यक है।

किसी भी रूप में शरीर की स्वाभाविक कार्य-
प्रणाली में व्यतिक्रम उत्पन्न होना रोग है। रोग से मुक्त होने के लिए औषधि ली जाती है, चिकित्सा कराई जाती है। लेकिन तनिक-तनिक-सी बातों पर दवाओं का सेवन करना लाभ के बजाय हानि पहुँचाता स्वास्थ्य-सुविधाओं की भूमिका-आजकल स्वास्थ्य सुविधाओं अथवा चिकित्सा-सुविधाओं का पर्याप्त विस्तार हुआ है।

विज्ञान की कृपा से नित्य नयी औषधियाँ सामने आ रही हैं। अस्पताल खुलते जा रहे हैं। डॉक्टरों की संख्या में भी निरन्तर वृद्धि हो रही है। किन्तु ज्यों-ज्यों अस्पताल और क्लीनिक खुलते जा रहे हैं, रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है।

हम समझते थे कि जितने अधिक अस्पताल और डॉक्टर होंगे, लोगों का स्वास्थ्य उतना ही अच्छा होगा। परन्तु यह भ्रम अब टूटता जा रहा चिकित्सा पर निर्भरता का परिणाम-रोगों से बचने की जो क्षमता हमें प्रकृति से प्राप्त हुई थी, वह निरन्तर कम होती जा रही है।

औषधियाँ एक रोग को ठीक करती हैं तो दस को पैदा कर रही हैं। उनकी प्रतिक्रियाएँ बड़ी जटिल और दूरगामी हैं। नये-नये रोग उत्पन्न हो रहे हैं। कैन्सर और एड्स जैसे असाध्य रोग आम होते जा रहे हैं। बच्चे भी मधुमेह तथा रक्तचाप से पीड़ित हैं। इसके साथ ही अस्पतालों में रोगियों का शोषण भी बड़ी समस्या बन चुका हैं। आवश्यक जाँचें कराना शोषण का लज्जाजनक पहलू है।

स्वस्थ जीवनचर्या ही आशा का केन्द्र-पहले स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य-समाज में आहार और व्यवहार के आवश्यक नियम प्रचलित थे। जागने, सोने, खाने, पहनने तथा दिनचर्या का एक निश्चित विधान था।

आज उसे पुराणपंथी आचार मानकर त्याग दिया गया है। एक पाश्चात्य विद्वान ने कहा है कि सभ्यता ने मनुष्य को जो सबसे हानिकारक वस्तु दी है, वह है देर से सोना तथा देर से जागना।

एक कहावत है-इलाज से बचाव अधिक महत्त्वपूर्ण है। रोगों से बचाव कैसे हो ? इसके लिए स्वस्थ जीवनचर्या को अपनाना ही एकमात्र उपाय है। उचित आहार-विहार, व्यायाम, स्वच्छता, सावधानी अपनाने से शरीर बलवान, रोग प्रतिरोधी-क्षमतायुक्त और स्वस्थ रहेगा। अस्पतालों पर निर्भरता घटेगी।

उपसंहार-
हमारे शास्त्रों में योग द्वारा स्वस्थ रहने की विधियाँ लिखी हुई हैं। हजारों व्यक्ति योगाभ्यास से स्वस्थ होते रहे हैं। औषधियाँ अथवा अस्पताल कभी स्वास्थ्य का विकल्प नहीं बन सकते। अत: हमें अपने ऋषि-मुनियों द्वारा बनाई गई स्वस्थ रहने की विधियों को अपनाकर ही अपने तन और मन को स्वस्थ रखना चाहिए।

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