Beti Bachao Essay In Hindi

बेटी बचाओ पर निबंध – Beti Bachao Essay In Hindi

बेटी बचाओ पर निबंध – Essay On Beti Bachao In Hindi

संकेत-बिंदु –

  • भूमिका
  • महिलाओं की संख्या में आती गिरावट
  • आर्थिक संपन्नता और लिंगानुपात में विपरीत संबंध
  • कमी आने का कारण
  • सुधार के उपाय
  • उपसंहार

लड़कियों की संख्या में आती कमी (Ladkiyon Ki Sankhya Mein Aate Kami) – Decrease in the number of girls

साथ ही, कक्षा 1 से 10 तक के छात्र उदाहरणों के साथ इस पृष्ठ से विभिन्न हिंदी निबंध विषय पा सकते हैं।

भूमिका – मानव जीवन एक गाड़ी के समान है। स्त्री और पुरुष इस गाड़ी के दो पहिए हैं। जिस प्रकार एक पहिए पर गाड़ी चलना कठिन हो जाता है उसी तरह समाज में स्त्रियों की संख्या कम होने पर सामाजिक ढाँचा चरमरा जाता है। यह स्थिति मनुष्य और समाज दोनों में से किसी के लिए अच्छी नहीं समझी जाती है।

महिलाओं की संख्या में आती गिरावट – हमारे देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। 2011 में यह संख्या 120 करोड़ पार गई थी। वर्तमान में यह 122 करोड़ से भी ज़्यादा हो चुकी है, परंतु दुखद बात यह है कि जनसंख्या की इस बेतहाशा वृद्धि के बाद भी स्त्रियों की संख्या में कमी आई है। आज स्थिति यह है देश में एक हजार पुरुषों के पीछे नौ सौ से भी कम स्त्रियाँ हैं। केरल एक मात्र राज्य है जहाँ लिंगानुपात देश के अन्य राज्यों से बेहतर है। देश के शेष अन्य राज्यों में लिंगानुपात अर्थात लड़कियों की संख्या पुरुषों से कम है।

आर्थिक संपन्नता और लिंगानुपात में विपरीत संबंध – जनसंख्या संबंधी आँकड़े देखने से एक विडंबनापूर्ण स्थिति हमारे सामने यह आती है कि जो राज्य आर्थिक रूप से और शिक्षा की दृष्टि से जितने आगे समझे जाते हैं, लिंग अनुपात के मामले में वे उतने ही पीछे हैं। इसके विपरीत जो राज्य जितने गरीब और शैक्षिक दृष्टि से पीछे हैं, वहाँ लिंगानुपात अन्य राज्यों से उतना ही अच्छा है।

हरियाणा और पंजाब उच्च संपन्न और शिक्षित राज्य हैं, जहाँ लिंगानुपात एक हजार पुरुषों पर 870 से भी कम है, जबकि बिहार, झारखंड और उड़ीसा जैसे गरीब और कम शिक्षित राज्यों में लिंगानुपात, पंजाब, हरियाणा से बेहतर ही नहीं, बहुत बेहतर है। पंजाब-हरियाणा की स्थिति तो अब यह है कि वहाँ लड़कों के विवाह के लिए लड़कियों की कमी हो गई है। इससे वे अन्य राज्यों का रुख करते हैं और खरीद-फरोख्त को बढ़ावा देते हैं। इससे सामाजिक असंतुलन तथा अन्य समस्याएँ उत्पन्न होने का खतरा पैदा हो गया है।

कमी आने का कारण – भारतीय समाज में लड़कियों से जुड़ी यह मान्यता प्रचलित है कि वे घर की इज़्ज़त होती हैं। मध्यकाल से ही विदेशी आक्रमणकारियों के हाथों में पड़ने से बचाने के लिए उन्हें परदे में रखा गया तथा उनके अधिकार छीन लिए गए। विवाह योग्य कन्याओं के विवाह में आने वाली परेशानियों को देखते हुए उन्हें बोझ समझा जाने लगा। बस धीरे-धीरे लड़कियों को जन्म लेने से रोकने के उपाय अपनाए जाने लगे।

यदि परिवार में लड़की का जन्म हो भी गया, तो उसके पालन-पोषण और इलाज पर ध्यान नहीं दिया जाता था ताकि किसी तरह उसका जीवन समाप्त हो जाए। विज्ञान के साधनों एवं शिक्षा के विस्तार के साथ ही कन्याभ्रूण को ही मार देने के तरीके अपनाए जाने लगे। पुरुष प्रधान समाज में कन्या का जन्म लेना ही हीन समझा जाने लगा। इससे कन्या के जन्मने से पूर्व ही उसे मार दिया जाने लगा, जिसका दुष्परिणाम आज हम सबके सामने है।

सुधार के उपाय – समाज में लड़कियों की संख्या बढ़ाने के लिए सामाजिक जागरुकता ही ज़रूरत है। पुरुष प्रधान समाज को अपनी सोच में बदलाव लाना चाहिए। उसे लड़की-लड़के में भेद करने की प्रवृत्ति त्याग देनी चाहिए। युवाओं को इस दिशा में विशेष रूप से आगे आने की आवश्यकता है। यद्यपि सरकार ने एक ओर कन्या भ्रूण हत्या को अपराध घोषित किया है, तो दूसरी ओर कन्याओं के पालन-पोषण और शिक्षण से जुड़ी अनेक योजनाएं शुरू की हैं, ताकि समाज कन्या जन्म को बोझ न समझे। फिर भी समाज को अपनी सोच में बदलाव लाने की नितांत आवश्यकता है।

उपसंहार – समाज का संतुलन बनाए रखने के लिए लड़की-लड़के दोनों की जरूरत होती है। किसी एक की कमी सामाजिक असंतुलन की स्थिति उत्पन्न कर देगी। समाज में लड़कियों की संख्या में गिरावट को रोकने के लिए हमें भारतीय संस्कृति का आदर्श पुनः लाने की आवश्यकता है—’यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।

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