The Three Vows Summary in English and Hindi by Mulk Raj Anand

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The Three Vows Summary in English and Hindi by Mulk Raj Anand

The Three Vows by Mulk Raj Anand About the Author

Mulk Raj Anand (1906-2004) internationally know novelist and an art critic, began his career as writer of fiction in Sabarmati Ashram of Mahatma Gandhi, where he drafted his first novel, “The Untouchable.” He is the author of more than 40 books. He was alternately engaged in teaching; writing and journalism. He is known for his innovativeness and originality of approach to the novel form. His important works include; Coolies, “The untouchable” and Two leaves of a Bud. “The three vows” is the first scene of “Little plays of Mahatma Gandhi” which is again the first part of his big novel “Ans So he Plays his Part.”

The Three Vows Written by Mulk Raj Anand Introduction to the Chapter

“The Three Vows” is the first scene of “Little plays of Mahatma Gandhi”. It is again the first part of his big novel, “And so he plays his part.”

The Three Vows Summary in English

“The Three Vows” is the first scene of “Little plays of Mahatma Gandhi”. It is again the first part of his big novel, “And so he plays his part.”

In this extract, Mahatma Gandhi has been characterised as saint politician. He was narrated as an immediate human being of the earth, but his head raised to the unbound sky. The lesson also throws light on the importance of following a routine to ensure discipline in life. It lays emphasis on living a simple, honest, non-violent and peaceful life. “Sabarmati Ashram” in Ahmedabad is just like a pilgrimage, because it is the center place of the struggle for freedom. The rays of non-violent movement has enlightened the whole of the nation.

There are small rooms at both ends of the verandah. In one big room, behind the verandah a white woman is typing some papers and one person is writing letters. This is the scene of the asshram at the time Gandhiji was organising struggle for freedom from the Sabarmati Ashram.

Mahatma Gandhi is resting on a rest chair and his wife Kasturba Gandhi is plastering his belly with thin mud. There are books, pen and papers on the right side table. Mahatma Gandhi’s secretary Mahadeo Desai is standing beside him to take down dictation from Gandhi. Someone K. C. Azad enters the cottage of the Ashram. He discloses his name as Krishna chander Azad and narrates the significance of his name. Krishna for Lord Krishna (Love God), chander for moon and Azad as he wants to be free and work for India’s freedom. Gandhi tell his the message of Gita, to contract the senses of human beings. He further advises him to leave English dress and to wear kurta Payjama” Azad intends to live in the Ashram and to get himself trained there. Gandhi agrees with some of these conditions.
(i) He should not look at a woman with desire. (ii) He should not drink liquor. (iii) He should clean latrines once in a week. Azad agrees to his conditions.

He was offered a Kurta and Payjama, Azad is informed of the routine of the Ashram,
(i) Morning walk at 5 A.M. (ii) Prayer 6.15 A.M. (iii) Milk or tea at 7.30 A.M. (iv) Work till 12 noon. (v) Mid-day meal at 12.30 P.M. (vi) Siesta_from 1.30 to 3.00 P.M. (vii) Evening Prayer at 6.30P.M. (viii) Meal at 7.30 P.M. (ix) Lights off at 10 P.M.
-Bath, Kitchen etc. conveniently during its time.
Thus, the life at Ashram was routined and systemetic. Everybody was bound to follow it strictly. A model code of conduct was followed there. Really Sabarmati is a ‘paradise’ on the earth.

The Three Vows Summary in Hindi

1. The scene is a…………………… master may say.
अनुवाद-यह दृश्य अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में महात्मा गाँधी जी की कुटिया के बरामदे में एक कोने का है। बरामदे के दोनों सिरों पर छोटे-छोटे कमरे हैं जिनके दरवाजे खुले हैं।
बरामदे के पीछे एक गोरी महिला टाइप करती हुई दिखाई पड़ती है जबकि एक सहवासी रजिस्टर में कुछ लिख रहा है। कुटिया के दाएँ कमरे के दरवाजे के समीप एक महिला चरखा
कात रही है।
और परे, बरामदे में दाईं ओर दो सचिव प्रूफ में गलतियाँ ठीक कर रहे हैं।
महात्मा जो लकड़ी के तख्ते की कमर वाली आरामकुर्सी पर लेटे हैं जबकि एक छोटी-सी गम्भीर स्त्री, उनकी पत्नी कस्तूरबा गाँधी, सफेद खादी की साड़ी पहने, उनके पेट पर पतली मिट्टी की पुताई कर रही है।
महात्मा जी के बाईं ओर मेज पर पुस्तकें व कागजों का चट्टा लगा हुआ है, दाईं ओर वाले मेज पर पेंसिलें, पेन, दवाते हैं। एक सफेद कलश गीले कपड़े से ढका हुआ है और तीन पीतल के कटोरे उसके समीप रखे हैं। दाईं ओर एक हट्टा-कट्टा भूरा आदमी-महात्मा गाँधी जी का सचिव-महादेव देसाई, पेन व कागज लेकर तैयार है वह लिखने के लिए जो उसका स्वामी उससे कहे।

2. Krishan Chander……………….of the Mahatma.
अनुवाद-कृष्ण चन्द्र आजाद प्रवेश करता है। महात्मा जी अपने हाथ से दरी (चटाई) की ओर संकेत करते हैं आगंतुक पालथी मारकर बैठता है, कुछ दिक्कत से, क्योंकि कठोर कार्डराई की पतलून को मोड़कर पद्मासन में बैठना कठिन है।
महात्मा गाँधी (कस्तूरबा से) : अच्छा!
कस्तूरबा महात्मा जी के पेट को गीले तौलिए से साफ करती है, उनके पेट को हल्के से थपथपाती है। मिट्टी के लेप वाला सामान इकट्ठा करती है, उनको उठाती है, और हट जाती है। कृष्ण चन्द्र आजाद कस्तूरबा की ओर अटपटे ढंग से हाथ जोड़ता है। वह आरामकुर्सी का एक लीवर हिलाती है, जिससे कमर ऊपर उठ जाती है, और फिर वह चली जाती है। घबराकर आगंतुक अपने जोड़े हुए हाथ महात्मा जी की और उठाता है जो अपना दायाँ हाथ आशीर्वाद देने के लिए उठाते हैं। और साथ-साथ अपनी गर्दन के नीचे का तकिया ठीक करते हैं और झुकी हुई स्थिति में बैठ जाते हैं।
महात्मा अपनी बाईं फोकल ऐनक के ऊपरी भाग में से प्रश्नात्मक दृष्टि से आगंतुक को देखते हैं। अतिथि महात्मा जी की टिकटिकी से घबरा जाता है।

3. Gandhi: Don’tyou ………………. himapair.
अनुवाद-गाँधी जी-क्या आपको कार्डराई के सूट में गर्मी नहीं लग रही ?
के.सी. आजाद-मेरे पास एक यही सूट है … मैं लन्दन से कल ही आया ….
गाँधी जी-अंग्रेज भी जब बंबई उतरते हैं तो अल्पेका (एक प्रकार का रेशमी कपड़ा) या सूती कपड़े पहन लेते हैं।
के. सी. आजाद-वे, आर्मी और नेवी स्टोर में जाकर खरीद सकते हैं….
गाँधी जी-चलो कोई बात नहीं, आप इस प्रकार बन्दर दिखाई देना, क्यों चाहते हो ? ।
के.सी. आजाद-(सोच-समझकर और स्वयं पर नियन्त्रण रखकर कुछ हिचकिचाहट के पश्चात) महात्मा जी, आप भी बन्दर दिखाई देते थे जब आप लम्बा कोट, पतली धारियों वाली पतलून ओर ऊँचा हैट पहनते थे! ….. लन्दन में।
गाँधी जी-(मुस्कराते हुए) अब तो मैं बन्दर नहीं दिखाई देता …. जब मैं दक्षिण अफ्रीका से लौटकर आया तो मुझे बोध हुआ कि हमारे विदेशी वस्त्र हमें अपने लोगों से दूर करते हैं और आप पतलून में पालथी मारकर भी नहीं बैठ सकते । जाकर कुर्ता-पाजामा पहन लो-महादेव, इसे एक जोड़ा दे दो।

4. (Mahadev Desaigets up………….galley of proof).
अनुवाद-(महादेव देसाई खड़ा हो जाता है। वह कृष्ण आजाद को बरामदे के दाएँ कमरे की ओर ले जाता है।
(कस्तूरबा गाँधी बड़े कमरे से तीन मिट्टी के प्याले बाएँ हाथ में और एक बड़ा मिट्टी का बर्तन दाएँ हाथ में लेकर आती है।) वह लस्सी एक छोटे प्याले में डालकर अपने पति को देती है।)
(फिर वह लस्सी दूसरे दो प्यालों में डाल देती है। वह उन्हें छोटी-छोटी मिट्टी की तश्तरियों से ढक देती है।)
(एक सहायक सम्पादक, मोटे चश्मे पहने बूढ़ा झुरींदार आदमी, गैली प्रूफ लेकर पिछले कमरे से आता है।)

5. Assistant Editor : Bapu……… uncomfortably).
अनुवाद-सहायक सम्पादक-बापू-आपकी सम्पादकीय टिप्पणियाँ-इनमें कुछ गलतियाँ हैं । गाँधी जी-(सतर्क होकर)-मुझे पढ़कर सुनाओ।
(सहायक सम्पादक अटक-अटककर अंग्रेजी पढ़ता है। गाँधी जी गैली प्रूफ माँगते हैं। वे शुद्धियों को परखते हैं, फिर वे गलतियों को ठीक करते हैं और गैली प्रूफ लौटा देते हैं।)
गाँधी जी-(सहायक सम्पादक से) जाने से पहले कुछ लस्सी पी लो ! और थोड़ी-सी मुझे भी दो। (सहायक सम्पादक मिट्टी के बर्तन में डालकर पहले गाँधी जी को देता है। फिर स्वयं पीता है।) कृष्ण चन्द आजाद महादेव के पीछे-पीछे लौट आता है।) आगंतुक ने ढीले पाजामे को, जो उसके लिए अधिक लम्बा है, मोड़ रखा है और स्वयं को देखता हुआ आत्मचेतना से चल रहा है, और संकोच से मुस्करा रहा है।

6. K.C.Azad: I feel…………….Mem Sahab’s frock!
अनुवाद-के.सी. आजाद-मुझे कवि टी.एस. इलिअट के प्रूफ राक जैसा लग रहा है, जो गाता है
“मैं अपनी पतलून की पोंचे मोड़कर पहनूँगा ।”
गाँधी जी-कहावत है, जैसा देश, वैसा भेष ! आपको कोई अंग्रेज धोती पहने न मिलेगा। वे समझते हैं कि हम असभ्य हैं । वे यह नहीं समझते कि यह गर्म देश है, हमें बहुत कम कपड़े पहनने पड़ते हैं। वे सूट पहनते हैं। अल्पेका के सूट ! यदि सर्ज के सूट नहीं । गर्मी के महीनों . में भी और बड़े बूट भी। हमारे बाबू उनकी नकल करते हैं। …..
के. सी. आजाद-मैं कहीं पढ़ा था कि क्लाइव ने प्लासी की लड़ाई में अपना जैकेट, गर्म जुराबें और बड़े बूट उतार दिए थे…….
गाँधी जी-उसके उत्तराधिकारी सायं की पोशाक पहनते हैं-आसाम की अति गर्म ग्रीष्म ऋतु में भी-अपने बगीचों में क्लब में भोजन करने के लिए।
के. सी. आजाद-‘पागल कुत्ते और अंग्रेज ।’ वे कहते हैं-हमें यह मानना होगा कि उनमे हास्य की भावना है। वे स्वयं पर हँस लेते हैं। हम अधिक गम्भीर हैं।
गाँधी जी-हो सकता है …. आप ठीक कहते हो …. जब मैं लंदन में था मैं पंच (एक पत्रिका) हर सप्ताह पढ़ता था। हाँ, वे यहाँ भी हँसी-मजाक करते हैं….. परन्तु अधिकतर खानसामा का, जो उनका टोस्ट जला देता है। या धोबी का, जो मेम साहब की फ्रॉक झुलसा देता है।

7. (He points to the………………… he has made).
अनुवाद-(वे लस्सी के साथ महादेव को रसोई की ओर संकेत करते हैं, वह आगंतुक को लस्सी परोसता है और फिर स्वयं भी लेता है।)
(महात्मा जी आगंतुक को सम्बोधित करते हैं।)
गाँधी जी-आप मुझसे क्या चाहते हो?
के.सी. आजाद-मैं आपको अपना उपन्यास दिखाना चाहता हूँ।
गाँधी जी-उपन्यास? वह किस बारे में है? कोई लड़के और लड़की का प्रेम-सम्बन्ध ? (वृद्ध व्यक्ति के. सी. आजाद की ओर अपनी ऐनक के ऊपरी भाग में देखता है।)
के. सी. आजाद-नहीं, यह आपके जैसे प्रेम के बारे में है।
गाँधी जी-मेरा प्रेम किस प्रकार का है?
के. सी. आजाद-यह एक अछूत के बारे में है। एक झाडू वाले लड़के बखा ।
गाँधी जी-आपका अभिप्राय हरिजन से है-हम यहाँ अछूत शब्द का प्रयोग नहीं करते ।
महादेव देसाई-हरिजन ! ईश्वर का बेटा कृष्ण चन्द्र आजाद अपनी भारी गलती के कारण अपना सिर लज्जा से झुका लेता है।)

8. Gandhi: How can!……………… remains silent).
अनुवाद-मैं आपके उपन्यास में कैसे सहायता कर सकता हूँ? जब मैं लन्दन में विद्यार्थी था उसके पश्चात् मैंने कोई उपन्यास नहीं पढ़ा । केवल टॉलस्टाय का ‘इवान इलिच की मृत्यु । और मैने उसकी आत्मकथा ‘बचपन लड़कपन, जवानी’ पढ़ी है |…… और उसकी ‘पाप स्वीकृति’।
के. सी. आजाद-मैं टॉलस्टाय का ‘युद्ध और शांति’ पढ़ा है।
गाँधी जी-मैंने टॉलस्टाय से बहुत कुछ सीखा है । वह यीशू का सच्चा अनुयायी था … उसे अहिंसा में विश्वास था ।
के. सी. आजाद-उसने ईसाई धर्म का पाप का सिद्धांत स्वीकार किया था । यद्यपि वह उससे प्रवृत्त होता रहा। सदा …..
गाँधी जी-पाप केवल ईसाई धर्म की ही धारणा नहीं है। हमारे अपने शास्त्र विवाह के बिना यौन सम्बन्धों को पाप मानते हैं।
(के. सी. आजाद विषय बदलता है।)
के. सी. आजाद-मैं उस ढंग से लिखना सीखना चाहता हूँ जैसे आपने झाडू वाले लड़के ऊका की कहानी लिखी थी।
गाँधी जी-ऊका वास्तविक व्यक्ति है-वह आश्रम में रहता है। उसने बुनना सीख लिया है। अब वह लड़का नहीं रहा । उसने हमें शौचालय साफ करना सिखाया है। वह रसोईघर में भोजन भी पकाता है।
के. सी. आजाद-मैं उसका सहायक बनना चाहता हूँ। मैंने भोजन बनाना सीखा है क्योंकि मैं जीविका कमाने के लिए लन्दन में एक रेस्तराँ में काम करता था। आपकी मंत्रणा के अनुसार-“पढ़ते हुए कमाओ ।”
गाँधी जी-अच्छा, हम आपको भोजन पकाने का अपना गुजराती ढंग सिखाएंगे। आपको रसोईघर की सफाई करना सीखना पड़ेगा। बर्तन धोना ! और आप मुझे अपना उपन्यास दिखाना । परन्तु आपको तीन शपथें लेनी होंगी, यदि आप आश्रम में रहना चाहो ।
.. (गाँधी जी के. सी. आजाद को अपनी ऐनक के ऊपरी भाग में से पैनी दृष्टि से देखते हैं, और चुप रहते हैं।)

9. K.C.Azad……………………desire her body.
अनुवाद-के. सी. आजाद-वे तीन कसमें कौन-सी हैं ?
(महादेव देसाई ·लकर मुस्कराता हुआ दिखाई पड़ता है, जैसे कि वह भूरे साहब की घबराहट (पराजय) से प्रसन्न हुआ है।)
गाँधी जी-आप किसी स्त्री को इच्छा की दृष्टि से न देखोगे।
के. सी. आजाद-परन्तु … परन्तु मेरी सहेली ने मेरी यात्रा का किराया दिया था। वह आयरलैण्ड में जेल में है। यदि मैं उसके बारे में दिन के समय न सोचूंगा तो रात को सपना तो देगा।
गाँधी जी-(मनोरंजन की मुस्कान से दूसरी ओर देखते हुए। वे फिर उसकी ओर देखकर कहते हैं) आप उसके बारे में रात को सपना देख लेना परन्तु दिन में उसके बारे में न सोचना ।
के. सी. आजाद-कठिन है।। गाँधी जी-वो जेल में क्यों है ?
के. सी. आजाद-वह मैडम माडगान के साथ मिलकर आयरलैण्ड के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले रही थी। जब वह दो आयरिश पुरुषों, जिनके पास एक-एक पिस्तौल थी, के साथ लीवरपूल से आई तो ब्रिटिश पुलिस ने उस पर बन्दूकों की तस्करी का आरोप लगाया।
गाँधी जी-उनके पास पिस्तौलें थी? उसे हिंसा अच्छी लगती है? के. सी. आजाद-ब्रिटिश ऐसा कहते हैं।
गाँधी जी-अच्छा ! आप आयरिश स्वतंत्रता के लिए काम करने में उसके साहस से प्रेरण लेने के लिए सोच सकते हों, परन्तु उसके शरीर की इच्छा करने के लिए नहीं। .. ___10.K.C.Azad

10. K.C.Azad (confused,…………………..goes out).
अनुवाद-के. सी. आजाद-(उलझन में पड़कर, हँसी आने होकर, चुप रहता है) मुझे विश्वास नहीं कि कोई व्यक्ति किसी स्त्री के बारे में विचार को विभक्त कर सकता है । मैं उसकी सुन्दरता के कारण उससे प्यार करता हूँ, उसके साहस के कारण भी। यदि मैं उसके बारे में दिन में न सोचूँगा तो रात को तो सपने लूँगा।
गाँधी जी-अच्छा ! आप रात को उसका सपना देखना, परन्तु दिन में उसके बारे में न सोचना ।
के. सी. आजाद-दूसरी शपथ क्या है ? गाँधी जी-आप यहाँ शरबि न पिएँगे।
के. सी. आजाद-(परेशान होकर और चेहरे से पसीना पोंछते हुए)। मैं लन्दन में मधुशालाओं के चक्कर लगाता रहता हूँ। हम लेखक मधुशाला की बातों से ही लिखते हैं। मैं कभी मदहोश न हुआ। केवल एक बार जब मैं इनर टेम्पल में शराब मिला ली थी।
गाँधी जी-(दृढ़ता से) आप लन्दन में पी सकते हो-परन्तु यहाँ नहीं। …. आप बिना शराब पिए लिखोगे यदि आप पर सत्य का नशा चढ़ गया।
के. सी. आजाद-तीसरी क्रसम? गाँधी जी-आपको सप्ताह में एक बार शौचालय साफ करने होंगे …. जैसे हम बारी-बारी से करते हैं।
के. सी. आजाद-मैं ऊका की भाँति सीखना चाहता हूँ। मैं शौचालय खुशी से साफ कर दूंगा।
गाँधी जी-महादेव ! इसे छोटी-सी अतिथि कुटिया दे दो।
महादेव देसाई-आपका सामान कहाँ है ? ।
के. सी. आजाद-मैंने उसे अहमदाबाद स्टेशन पर अमानत सामान घर में रख दिया था। गाँधी जी-जाओ लेकर आओ।
के. सी. आजाद-महात्मा जी क्या आप आश्रम के गेट के चौकीदार को कह देंगे कि वह आगंतुकों से नाराज न हो, बल्कि उनसे शिष्टता से व्यवहार करे।
गाँधी जी-ओह, आचार्य गारखा ! दूसरों ने भी शिकायत की है। महादेव, उसे जाकर बुला लाओ।
(महादेव चला जाता है।)

11. Gandhi: Let me ………………. benignly and says):
अनुवाद-गाँधी जी-मैं आपको टॉलस्टाय का ‘कन्फैशन’ देता हूँ। (गाँधी जी खड़े होकर बाई ओर के कमरे में जाते हैं।)
के. सी. आजाद-(वह चारों ओर व्यस्त दृश्य देखता है। वह गाँधी जी की नैतिकता की भावना के कारण तनाव में है।)
गाँधी जी-यह लो पुस्तक-यह आपको सिखाएगी कि आप अपनी सहेली को कैसे भूल सकते हो।
के. सी. आजाद-कभी नहीं-मैं उससे प्रेम करता हूँ। . गाँधी जी-सभी भावावेशों का अंत दुखद होता है। आपका नाम क्या है ?
के. सी. आजाद-कृष्ण चन्द्र आजाद …. और इस नाम को सार्थक करना चाहता हूँ। कृष्ण की भाँति मैं प्रेम का देवता बनना चाहता हूँ। चन्द्र का अर्थ चाँद है। आजाद क्योंकि मै। स्वतंत्र रहना चाहता हूँ और भारत की स्वतंत्रता के लिए काम करना चाहता हूँ इसलिए मैंने आजाद उपनाम अपनाया है। मैं कविताएँ लिखता हूँ।
गाँधी जी-आपका प्रेमदेवता गीता में अर्जुन का पथ-प्रदर्शक भी था। उसने इंद्रियों को वश में करने का उपदेश दिया है और सच्चाई पर चलने का । बाद में तांत्रिकों ने उसे दूषित कर दिया। चलो, मुझे अपना उपन्यास दिखाओ। . (कृष्ण चन्द्र टॉलस्टाय आजाद अपना पत्रधारणा खोलता है, उसमें से पाण्डुलिपि कॉपती उँगलियों से निकालता है। महात्मा जी शीर्षक के पन्ने को उलट कर पहला पन्ना खोलते हैं, और प्रथम अनुच्छेद पढ़ते हैं। फिर मुस्कराते हैं, और कृष्ण चन्द्र की ओर सौम्य दृष्टि से देखकर कहते हैं)

12. Gandhi: Mocking bird………………..I hear!
अनुवाद-गाँधी जी-पूर्णतः नकलची पक्षी! ऐसे बड़े-बड़े शब्द । आप नहीं जानते कि हरिजन आहें भरते हैं, कराहते हैं, सिसकियाँ भरते हैं, और थोड़े से शब्द बोलते हैं। वे इतने बड़े-बड़े शब्दों में नहीं बोलते । आप उनको डॉ. जानसन बनाना चाहते हों! . .
के. सी. आजाद-(लज्जित होकर) मैं जेम्स जोइस का पात्रों का स्ट्रीम ऑफ कॉन्शियसनेस का ढंग अपना रहा हूँ। उसने नई भाषा का निर्माण किया है। उसमें यमक है। उपहासात्मक शब्द हैं। कविता के शब्द हैं । मैने सोचा था कि यदि मैं भी बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग करूँ, और यमक बनाऊँ, अंग्रेज लोग सोचेंगे कि मैंने अंग्रेजी भाषा पर महारत प्राप्त कर ली है।
गाँधी जी-लन्दन में मैं भी ऐसा ही सोचता था । तब एक अंग्रेज क्वेकर मित्र ने मुझे सरल लिखने के लिए कहा। मैंने गुजराती से अंग्रेजी में अनुवाद करना आरम्भ कर दिया । आप अपनी भाषा में क्यों नहीं लिखते ?
के. सी. आजाद-मेरी कोई भाषा नहीं है। मेरी मातृभाषा पंजाबी है। परन्तु सरकार ने अंग्रेजी व उर्दू को सरकारी (अदालती) भाषाओं को नियुक्त किया है। सिवाए भाई वीर सिंह और धनी राम के…. हममें से कुछ ही अपनी भाषा में लिखते हैं। नानक सिंह अकेले उपन्यास लेखक हैं। पंजाबी या उर्दू में कोई प्रकाशक नहीं है। डॉ. मोहम्मद इकबाल भी उर्दू व फारसी में लिखता है, पंजाबी में नहीं। पंजाबी में लिखकर कोई लेखक जीविका नहीं कमा सकता। अंग्रेजी में हो सकता है कि मेरा उपन्यास लंदन में छप जाए।
गाँधी जी-अच्छा ! जो भाषा ठीक लगे उसमें लिखो। परन्तु वही कहो जो हरिजन कहते हैं, और निर्धन कहते हैं। उनकी भाषा का शाब्दिक अनुवाद करो । ‘दीज’ और ‘दाउज’ का प्रयोग न करो और सबसे बढ़कर आपको ईमानदार सच्चा बनना चाहिए । जीवन के बारे में वैसे हो लिखो जैसे यह वास्तव में है। गरीबों के बारे में। बहुत कम लेखकों ने गरीबों के बारे में लिखा है। केवल शरत बाबू, और प्रेमचन्द-मैने सुना है।

13. K.C.Azad…………………….Mahadev Desai).
अनुवाद-के. सी. आजाद-मैं अपराधी हूँ, यदि मैं लातीनी भाषा के शब्द का प्रयोग करूँ। मैं सारा उपन्यास फिर से लिखूगा परन्तु उपन्यास में मुझे कल्पना का प्रयोग तो करना पड़ता है।
गाँधी जी-ऊका से बात करना और अन्य लोगों से । उनको अपने भाई-बहन के रूप में स्वीकार करना, मैं आपका उपन्यास फिर से लिखे जाने के पश्चात् पढूँगा।
(महादेव देसाई आचार्य गोरखा के साथ लौट आता है।) गाँधी जी-आपने आजाद से क्या कहा था?
के. सी. आजाद-उसने कहा था, “आश्रम में मत प्रवेश करो। वहाँ पुलिया पर बैठ जाओ।” मैंने उससे कहा, “क्या एक गिलास पानी मिल सकता है ?” वह बोला “जाकर पान की दुकान से ले लो।”
गाँधी जी-आचार्य ? (आचार्य चुप रहता है।) गाँधी जी-उत्तर दो । (आचार्य ने स्वीकृति में सिर हिलाया ।)
गाँधी जी-अच्छा, आपको अपनी उइंडता को ठीक करने के लिए एक दिन व रात का व्रत रखना पड़ेगा। हम सी.आई.डी. वालों के लिए आश्रम के द्वार बन्द कर देते हैं। परन्तु सभी के लिए नहीं जो मुझे मिलने आते हैं।
के. सी. आजाद-मैने उसे बताया था कि मैंने आपसे मिलने का चार बजे का समय ले रखा है।
आचार्य-आप 3 बजे आए थे। के. सी. आजाद-हमारे गाँव में अतिथियों का हर समय स्वागत होता है
गाँधी जी-यह बात भिन्न है। आश्रम के नियम मेरी समय-सारणी के अनुसार हैं। परन्तु उसे उद्देण्ड नहीं होना चाहिए था। वह उपवास करेगा । महादेव, आजाद को आश्रम के नियम समझा दो । आचार्य, जाओ। अपने दुर्व्यवहार पर विजय प्राप्त करने के लिए एक दिन का उपवास करो।
महादेव देसाई-गाँधी जी अपेक्षा करते हैं कि सभी सवेरे पाँच बजे उनके साथ साबरमती के सूखे तल पर सैर करें। स्नान के पश्चात् प्रार्थना 6.15 पर । दूध या चाय कैन्टीन में साढ़े सात बजे । काम 12 बजे दोपहर तक । दोपहर का भोजन साढ़े बारह बजे । डेढ़ बजे से तीन बजे तक दोहपर का आराम । स्नानघर, रसोईघर या बगीचे में काम । सायं की प्रार्थना साढ़े छ: बजे । भोजन साढ़े सात बजे सायं । दस बजे दीपक-बत्ती बुझानां महात्मा जी आपको सप्ताह में आधे घंटे के लिए दो बार मिल सकते हैं रविवार को आप बाहर जाने के लिए स्वतंत्र हैं।
गाँधी जी-खादी भण्डार से । आश्रम से अधिक दूर नहीं है।
(के. सी. आजाद गाँधीजी को हाथ जोड़ता है ओर महादेव देसाई के साथ चला जाता है ।)

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