A Pinch of Snuff Summary in English and Hindi by Manohar Malgaonkar

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A Pinch of Snuff Summary in English and Hindi by Manohar Malgaonkar

A Pinch of Snuff Written by Manohar Malgaonkar About the Author

Manohar Malgaonkar was born in 1913. He was a famous novelist and short story writer who has 25 publications already to his creedit. Some of his main creations are – ‘A Bend in the Ganges’, ‘Distant Drum’, ‘Bombay Beware’ etc. he usually wrote comical short stories. His narrative with profound comedy ties up the reader’s excitement until the end.

A Pinch of Snuff Summary in English

The present short story, ‘A Pinch of Snuff’ is initially taken from ‘Contemporary Indian Short Stories in English’. This story is a comical and adventurous story that ties up reader’s excitement until the end.

Initially, the narrator’s mother announces the expected arrival of Nanukaka, her brother who has to stay there for 2-3 days. The narrator on
hearing this news from his mother advised her to send a telegram to him informing him of narrator’s transfer to avoid Nanukaka but she retorts that he must have started his travel. On asking the purpose of his arrival; he was acquainted that it was to meet some minister. The narrator perceives that Nanukaka would stay there for a long time because ministers do not see people for months but his mother assured him that Nanukaka would manage everything. The narrator is under-secretary on probation and has been taught to regard ministers higher than God.

The narrator goes to the station and he sees Nanukaka who has an impressive personality with white hair and mustache. When Nanukaka asks him the question to arrange his meeting with minister, the narrator explains that he is only an undersecretary on probation and can’t arrange for their interview. Nanukaka takes a pinch of snuff and seems to be lost in thoughts.

Narrator’s mother was very excited when Nanukaka arrived home, but to narrator’s hard luck, he had to give up his bedroom to Nanukaka. Narrator once took Nanukaka to the north block to see the welfare minister but after exactly two hours Nanukaka returned from the office with expletives in his mother tongue Marathi because he could not meet the minister but only could get an appointment with minister three days later. When they were driving back to home, a yellow car passed ahead of them and somebody waved his hand to the narrator. Nanukaka inquired about it and was told that he was Ratiram, the son of Sohanlal Ratiram, the party boss in Delhi. Sometimes later, Sohanlal said to Nanukaca that his son was in balance ministry but due to some reason some body had poisoned the ambassador’s mind against his son. Nanukaka announced that he will manage the problem.

Nanukaka then opened his snuff box and had a pinch of it and started to talk about the welfare minister. By the reaction of Sohanlal he came to know that the minister and he were now at daggers drawn because the minister has refused the proposal of his daughter’s marriage with his son and instead had decided to marry her to the prince of Ninnore. When they came back to home, (the narrator and Nanukaka) Nanukaka was strangely silent but the next morning he was back to usual. This day he decided to pay a visit to minister’s house. By using brain, Nanukaka managed to get an enormous, princely and outlandish car and the narrator was made its driver.

Nanukaka dressed himself and looked every inch like a pandit from the princely state. When the minister’s secretary asked his purpose of coming to the place he said that he had no wish to disturb the minister. He asked for visitors book and wrote his name as hereditary astrologer to Maharaja of Ninnore and gave out address and without delay, he ordered me to get to Sutkatta’s palace which he really did not meant, it was to show off. We drove quickly to home. We just had tea when a car with white triangle stopped in front of our house and the welfare minister stepped out. Nanukaka received him respectedly. After the meeting with minister, Nanukaka departed from my house next day.

The narrator thinks that if minister comes to know about the reality of Nanukaka what will happen and he also hopes that in a situation like this Nanukaka will not let his head down but he wants to be far away from the place when such thing happens.

A Pinch of Snuff Summary in Hindi

‘A Pinch of Snuff’ ‘Contemporary Indian Short Stories in English’ ली गई लघु कथा है। यह हास्यजनक और रोमांचक कथा है जो पाठकों को अंत तक बाँधे रहती है।

लेखक को अपनी माँ द्वारा नानूकाका के आने का समाचार मिलता है तो वह उन्हें (माँ) बहाने बनाकर नानूकाका को टालने के लिए कहाता है लेकिन माँ कहती है कि नानू काका अब तकं ट्रेन में बैठ गए होंगे और अब उन्हें मना करना अनुचित होगा। वे लेखक को आश्वस्त करती हैं कि नानूकाका 2-3 दिन से ज्यादा नहीं सकेंगे। उनके आने का कारण पूछने पर लेखक को ज्ञात हुआ कि नानूकाका किसी मंत्री से मिलने आ रहे हैं क्योंकि मंत्री लोगों से कई दिन तक नहीं मिलते । लेखक नया सहायक-अधिकारी था और उसे मंत्रियों को ईश्वर से ऊँचा मानना सिखाया गया था।

लेखक बेमन से नानूकाका को लेने स्टेशन गया। उसने देखा कि नानूकाका का व्यक्तित्व प्रभावशाली था। उनके बाल सफेद थे और मूछे भी शानदार थी। उन्होंने उतरकर एक टोकरी लेखक को पकड़ाई और बाहर निकलने को कहा। वे दोनों घर की ओर चल पड़े। रास्ते में नानूकाका ने लेखक से मंत्री के साथ अपनी मीटिंग कराने के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह केवल एक सहायक-अधिकारी है और उनकी महायता नहीं कर सकता । नानूकाका सूंघनी की एक चुटकी लेते हैं और चिंतामग्न हो जाते हैं और बीच में जीभ से आवाजें निकालते हैं।

माँ नानूकाका के आने पर बहुत खुश होती हैं। लेकिन लेखक को अपना बिस्तर नानूकाका को देना पड़ता है। नानूकाका के कहने पर लेखक उन्हें मंत्रीजी के कार्यालय में ले जाता है लेकिन

नानूकाका मंत्री से नहीं मिल पाते और उन्हें तीन दिनों बाद का समय दिया जाता है। वे वापस लौटते समय मराठी में गालियाँ देते हैं। जब वह और लेखक वापस घर जाते होते हैं तो एक आदमी लेखक को हाथ हिलाता है और उसकी गाड़ी आगे निकल जाती है। पूछने पर नानूकाका को पता चलता है कि वह लड़का सोहनलाल रतिराम का बैटा है और लेखक के विभाग में ही कार्यरत है। जब लेखक और नानूकाका घर पहुंचते हैं तो नानूकाका लेखक को जोधपुर कोट और पगड़ी पहनने को और उसे सोहन लाल के घर चलने को कहते हैं। वे सोहन लाल के कार्यालय पहुंचते हैं। वहाँ नानूकाका सेक्रेटरी पर धाक जमाने के लिए अपने खास होने का बोध कराते हैं और बड़े-बड़े नेताओं से संपर्क की बात करते हैं। सेक्रेटरी सोहनलाल को बताने अंदर जाता है।

नानूकाका ऊंची आवाज में हजरत बरकत अली, जो रादूत थे उनके बारे में ऐसे बोलते हैं जैसे वे और अली पक्के दोस्त हैं। उधर सोहनलाल अली के बारे में सुनते ही बाहर आते हैं। नानूकाका का अच्छा स्वागत होता है और सोहनलाल और वे बातें करने लगते हैं और कुछ देर बाद सोहनलाल नानूकाका से कहते हैं कि उनका बेय वित्त विभाग में कार्यरत है पर किसी ने राजदूत के मन में उनके बेटे के प्रति जहर भर दिया । नानूकाका सोहनलाल को आश्वस्त करते हैं कि वे खुद अली से बात करेंगे। नानूकाका ने फिर सुड़की ली और मंत्रीजी के बारे में बात करना शुरू किया। सोहनलाल की बातों से नानूकाका को पता चला कि मंत्री और सोहनलाल में दुश्मनी हो गई है क्योंकि मंत्री अपनी पुत्री का विवाह सोहनलाल के बेटे से न कर निन्नौर के राजकुमार से कर रहे थे। कुछ देर बातचीत के बाद नानूकाका और लेखक घर आ गए। अगले दिन नानूकाका और लेखक ने एक बड़ी विदेशी कार की व्यवस्था कर ली।

नानूकाका ने खुद एक पंडित जैसे कपड़े पहने और लेखक को ड्राइवर जैसे कपड़े पहनाए और फिर उस कार से चल पड़े मंत्री के कायालय की ओर । वहाँ पहुँचने पर जब सेक्रेटरी ने अपने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा वे मंत्री को परेशान करने नहीं आए हैं और उन्होंने विजिटर्स-बुक मंगवाकर लिखा-निन्नौर के महाराज के राजज्योतिषी और उन्होंने हमारे घर का पता लिखो और कार्यालय से निकलते हुए बोले-हमें महाराज सुतकता के महल में ले चलो। वहाँ से हम घर अपनी कार से पधारे । नानूकाका दिल्ली से वापस लौट गए। लेखक सोचता है कि जब मंत्रीजी को सच्चाई मालूम होगी तो क्या होगा यह आशा करता है कि इस स्थिति में भी नानूकाका कोई रास्ता निकाल लेंगे। वो चाहता है कि जब इस तरह की परिस्थिति उत्पन्न हो तो वह घर से बहुत दूर हो।

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