A Child is Born Summary in English and Hindi by Germaine Greer

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A Child is Born Summary in English and Hindi by Germaine Greer

A Child is Born by Germaine Greer The Author

Germaine Greer was born in 1939 and educated in Australia. She is a famous feminist writer. Her major and well known works include, “The Female Eunuch”, “Sex and Destiny”. “The politics of Human fertility”, and “The change”, She examines by going through the social and cultural aspects of a life of woman. She believes that socio-cultural practices are designed to suit male interests. At the same time, they further subjugate women.

A Child is Born Written by Germaine Greer Introduction

The present piece “A child is born” is an extract from her book “Sex and Destiny: The politics of Human Fertility”. It examines into and going through the cultural peculiarities of the east and the west regarding child-birth and parent-child relationship.

A Child is Born Summary in English

The essay “A child is Born” is written by Germain Greer. In this essay she has thoroughly examined the cultural peculiarities of the East and the west regarding child-birth and parent-child relationship.

The author explains the ways of managing-child birth in traditional societies. According to greer there are many ways. Some of them are diverted to one other. Their usefulness may be seen in the fact that they are culturally and collectively accepted. In this way their mother does not have mental burden to find out the new ways (methods) of course of action. A woman who follows the legitimate ways and religious ceremony will be able to come across the problem. She will have other stronger set in observing many activities relating to religious ceremony. This will increase her sense of security and she will realise that she is conducting the pregnancy and not that it is conducting her. Some educated women are found a victim of superstition and adopting old, unscientific methods of delivery (child-birth) which is really bad.

Mortality of infant and mother is higher in traditional births. Every body will accept that each infant and particularly every maternal death is a tragedy to be prevented if at all possible. In many societies, women go to live with their mother-in-law from mother’s houses after marriage. It is an evident truth that such women do not become members of their new family until they have born a child. In eastern countries woman would lose her own name and become known as the mother of her first-born. Mostly their own title (lineage) would be changed after their husband’s surname. But in the west, she would not lose her own name after her marriage.

There is a custom in the Sylheti woman (woman belongs to Sylhet district of Bangladesh). If her parents are alive, she goes to her mother’s house for the last few months of her pregnancy and remains there about the first three months of the baby’s birth. There she gets a lot of love and care. In Bangladesh children under the age of five or six years are looked after by the whole family. The children play out of doors with natural objects. Here people say that Asian children do not play with toys.

In Bangladesh they do not need toys. They make their own simple things. In south Africa, in “Bantu woman’s case birth of a child of a pregnant lady is far from normal.

The authoress says that the main obstacles for the modem western technology for reaching in huts and small cottage is poverty, still the cultural dominance of western technology has achieved its Objectives.

A Child is Born Summary in Hindi

“ए चाइल्ड इज बॉर्न” (A child is born) नामक निबन्ध जमैन ग्रीयर द्वारा लिखा गया एक भावोत्तेजक निबंध है। पस्तुत निबन्ध में विद्वान लेखिका ने पुरुब तथा पश्चिम के देशों में शिशु के जन्म तथा नवजात शिशु का अपने माता-पिता के साथ संबंध में पाई जानेवाली विशिष्टता का विशद् विवेचन किया है।

लेखिका पारंपरिक समाज में शिशु के जन्म के समय की व्यवस्था का वर्णन कर रही है। उनके अनुसार अनेकों प्रकार की पद्धतियाँ प्रचलित है। उनमें से अनेकों परंपराएं एक-दूसरे से -भिन्न हैं। उनकी उपयोगिता इस तथ्य में निहित है कि उन्हें सांस्कृतिक एवं सामूहिक रूप से स्वीकारा गया है तथा उसका अनुसरण किया जाता है। इस प्रकार शिशुओं की माताओं को कार्यविधि की नई पद्धतियों की तलाश करने के मानसिक बोझ से मुक्ति मिल जाती है । एक महिला जो समुचित (वैधानिक) तरीके तथा धार्मिक रीति-रिवाजों का अनुसरण करती है वह समस्याओं के समाधान में सक्षम होती है तथा उसके द्वारा धार्मिक समारोह के अनेक कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न होंगे। इसके द्वारा उसमें सुरक्षा की भावना सुदृढ़ होगी। वह ऐसा अनुभव करेगी कि वह गर्भावस्था से संचालित नहीं है । कुछ शिक्षित महिलाएँ अंधविश्वास से ग्रसित होती हैं। वे प्राचीन, घिसे-पिटे अवैज्ञानिक (अकुशल) प्रसव (प्रजनन) की पद्धति का सहारा लेती हैं।

पारम्परिक (पुराने ढंग) से प्रजनन कराने में शिशु तथा मां की मृत्यु-दर का आँकड़ा काफी अधिक होता है। प्रत्येक व्यक्ति इस बात को स्वीकार करेगा कि प्रत्येक शिशु की विशेषकर माता से सम्बन्धित मृत्यु अत्यन्त दु:खद बात है। यदि इसका रोका जाना संभव है तो इस दिशा में समुचित प्रयास किया जाना चाहिए। अनेकों समाज में विवाह के बाद महिलाएं अपने मायके से ससुराल आती हैं। यह एक प्रमाणित सत्य है कि जब तक ये महिलाएँ एक शिशु को जन्म नहीं देती तबतक वे अपने नए परिवार की सदस्य नहीं होती हैं। अर्थात् उन्हें नये परिवार का दर्जा प्राप्त नहीं होता है। पूरब के देशों में महिलाएं अपना नाम छोड़कर अपने नवजात शिशु की माँ के नाम से जानी जाती हैं। किन्तु पाश्चात्य देशों में महिला विवाह के बाद भी अपना नाम नहीं खोती हैं, उसके नाम में कोई परिवर्तन नहीं होता है।

सिलहटी (बंगलादेश के एक क्षेत्र सिलहट की निवासी) औरतों में एक रिवाज है कि यदि उसके माता-पिता जीवित हैं तो अपनी गर्भावस्था के अंतिम कुछ महीनों के लिए वह अपने मायक चली जाती है तथा प्रसव के बाद वह लगभग तीन महीने तक वहीं रहती है। वहाँ उसकी तथा नवजात शिशु को पूर्ण प्रेम तथा देखभाल प्राप्त होती है । बंगलादेश पाँच अथवा छ: वर्ष के बच्चों की देखभाल सम्पूर्ण परिवार मिलकर सामूहिक रूप से करता है। बच्चे घर के बाहर खुले मैदान में प्राकृतिक वस्तुओं से खेलते हैं। यहाँ लोगों का कहना है कि एशिया महादेश के बच्चे खिलौनों से नहीं खेलते । बंगलादेश में उन्हें खिलौनों की आवश्यकता नहीं है। वे खेलने के लिए स्वयं सीधी-सादी वस्तुओं का प्रयोग करते हैं । दक्षिणी अफ्रीका में बंटू महिलाओं में एक गर्भवती महिला के प्रसव के समय सामान्य अवस्था में बच्चा पैदा नहीं होता है।

लेखिका का कथन है कि आधुनिक पाश्चात्य तकनीक झोपड़ी तथा अल्प वित्त-भोगी छोटे मकानों तथा अपनी पहुँच नहीं बना पाई है, फिर भी पाश्चात्य तकनीक ने अपने सांस्कृतिक प्रभुत्व द्वारा अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर ली है।

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