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राम लक्ष्मण परशुराम संवाद Class 9 Summary in Hindi
राम लक्ष्मण परशुराम संवाद कविता की व्याख्या भावार्थ Class 9
राम लक्ष्मण परशुराम संवाद Bhavarth Vyakhya Explanation
काव्यांश 1
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।।
पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।।
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।।
जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।।
आसिष दीन्हि सखीं हरषानी। निज समाज लै गईं सयानीं।।
बिस्वामित्र मिले पुनि आई पद सरोज मेले दो भाई।।
रामु लखनु, दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।।
रामहि चितइ रहे थकि लोचन रूप अपार मार मद मोचन।।
बहुरि बिलोकि विदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।

शब्दार्थ:
भृगुपति – भृगुकुल के स्वामी (परशुराम जी); बेष – वेश / स्वरूपः कराला – भयानक / डरावना: उठे – उठ खड़े हुए; सकल – सभी भय – डर; बिकल – व्याकुल / घबराए हुए; भुआला – राजा / भूपाल; पित समेत – पिता सहित – निज – अपना; नामा – नामः दंड प्रनामा – दंडवत प्रणाम; सुभायें – स्वभाव / सहज प्रकृति; चितवहिं – देखते हैं/निहारते हैं: हितु – हितकारी/भला चाहने वाला; खुटानी – समाप्त होना / तृप्त होना; बहोरि – फिर / पुनः; सिरु नावा – सिर झुकायाः सीय – सीता; आसिष / असीस – आशीर्वाद; सखी – सहेलियाँ; सयानीं – समझदार; बिस्वामित्र – विश्वामित्रः पद सरोज – चरणकमल; दोउ – दोनों ढोटा – पुत्र /बेटे; जोटा – जोड़ा; चितड़ – देखते रहे; लोचन – आँखें; रूप अपार – अत्यंत सुंदर रूप; मार मद मोचन – कामदेव के गर्व को हरने वाला; बिलोकि – देखकर; बिदेह – राजा जनक; काह – क्यों / क्या; अति – बहुत; भीर – भीड़; जानि – जानकर; अजान – अनजान; ब्यापेउ – व्याप्त हो गया; कोपु – क्रोध; सरीर शरीर।
संदर्भ:
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘गंगा’ में संकलित अध्याय ‘राम-लक्ष्मण – परशुराम संवाद’ से लिया गया है, जिसके रचयिता ‘गोस्वामी तुलसीदास’ हैं।
प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश में शिव धनुष भंग होने के पश्चात् परशुराम जी के जनक के दरबार में आगमन का वर्णन किया गया है। जहाँ उनके भयानक रूप को देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा भयभीत हो जाते हैं।
भावार्थ:
प्रस्तुत काव्यांश में तुलसीदास जी वर्णन करते हैं कि जब परशुराम जी क्रोधित रूप धारण करके राजा जनक की सभा में पहुँचे तो उनके भयानक स्वरूप को देखकर वहाँ उपस्थित सभी राजा अत्यंत भयभीत हो गए। वे अपने-अपने पिता सहित आगे बढ़कर उनका नाम लेकर दंडवत प्रणाम करने लगे। परशुराम जी जिस व्यक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार हितकारी समझते थे, वही उनसे निडर होकर मिल पाता था अन्य लोग उनके रौद्र स्वरूप से भयभीत हो जाते थे।
इसके बाद राजा जनक पुनः आगे आए और उन्होंने परशुराम जी को प्रणाम किया तथा सीता जी को बुलाकर उनसे भी प्रणाम करवाया। परशुराम जी ने सीता को आशीर्वाद दिया। सीता की सखियाँ इस दृश्य से अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्हें अपने साथ वापस ले गई। तत्पश्चात् परशुराम जी विश्वामित्र से मिलने के लिए आगे बढ़े। श्रीराम और लक्ष्मण दोनों भाइयों ने भी उनके चरणकमलों का स्पर्श करके उन्हें प्रणाम किया। परशुराम जी ने यह देखकर प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और उनके सुंदर रूप की प्रशंसा की। परशुराम जी श्रीराम के अनुपम रूप को देखते ही रह जाते हैं। उनका यह स्वरूप कामदेव के गर्व (अभिमान) को भी नष्ट करने वाला था।
इसके बाद, सबकुछ जानते हुए भी परशुराम जी अनजान बनने का अभिनय करते हुए राजा जनक से पूछते हैं कि बताइए, यहाँ इतनी अधिक भीड़ क्यों एकत्र हुई है? वास्तव में, शिव धनुष टूटने के कारण उनके पूरे शरीर में क्रोध भर उठा था।
काव्य सौंदर्य
(i) प्रस्तुत काव्यांश में परशुराम जी के अद्भुत (भयानक) व्यक्तित्व तथा उनके प्रभाव से उत्पन्न भय का सजीव चित्रण किया गया है।
(ii) इसमें चौपाई और दोहा छंद का सुंदर प्रयोग हुआ है।
(iii) ‘भय बिकल भुआला’, ‘रूप अपार मार मद मोचन’ पदों में अनुप्रास अलंकार तथा पद सरोज’ में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
(v) इस काव्यांश में मुख्यतः वीर रस तथा रौद्र रस के साथ श्रृंगार रस की भी झलक मिलती है।
(vi) काव्यांश में अवधी भाषा की सहज, सरस तथा प्रभावपूर्ण शैली में प्रस्तुत की गई है, जो प्रसंग को अत्यंत जीवंत बनाती है।
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काव्यांश 2
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।।
सुनत बचन फिरि अनत निहारे देखे चापखंड महि डारे।।
अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष के तोरा।।
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।।
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।
मन पछिताति सीय महतारी बिधि अब सँवरी बात बिगारी।।
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु विषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।

संदर्भ:
पूर्ववत्।
प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश में परशुराम जी द्वारा धनुष टूटने का कारण पूछने और उनके अत्यंत क्रोधित होने का वर्णन है।
भावार्थ:
प्रस्तुत काव्यांश में तुलसीदास जी वर्णन करते हैं कि राजा जनक परशुराम जी को शिव धनुष टूटने का पूरा समाचार सुनाते हुए बताते हैं कि इसी कारण से सभी राजा यहाँ एकत्र हुए हैं। जनक की बातें सुनकर परशुराम जी ने इधर-उधर दृष्टि डाली, तो उन्हें पृथ्वी पर पड़े हुए धनुष के टुकड़े दिखाई दिए। यह दृश्य देखकर वे अत्यंत क्रोधित हो जाते हैं और कठोर वचन बोलते हुए राजा जनक से पूछने लगे कि “हे मूर्ख जनक! बताओ, इस धनुष को किसने तोड़ा है? रे मूढ़! तुरंत उस मनुष्य को मेरे सामने प्रस्तुत करो, अन्यथा मैं आज ही तुम्हारे राज्य की धरती को उलट दूंगा अर्थात् नष्ट कर दूँगा।”
परशुराम जी के इन कठोर वचनों को सुनकर राजा जनक अत्यंत भयभीत हो गए और कुछ भी उत्तर नहीं दे सके। सभा में उपस्थित कुछ कुटिल स्वभाव वाले राजा मन-ही-मन प्रसन्न हो रहे थे। देवता, मुनि, नाग, नगर के स्त्री-पुरुष सभी के हृदय में भय और चिंता व्याप्त हो गई। माता सीता की माता (सुनयना) के मन में यह पछतावा हो रहा था कि विधाता ने बनी बनाई बात बिगाड़ दी।
परशुराम जी के क्रोधी स्वभाव के बारे में सुनकर सीता के लिए आधा पल भी एक कल्प (युग) के समान भारी बीत रहा था। जब श्रीराम ने देखा कि सभी लोग भयभीत हैं और सीता जी बहुत डरी हुई हैं, तब उनके मन में न कोई हर्ष (खुशी) था और न कोई विषाद (दुःख या चिंता)। वे पूरी तरह शांत और संतुलित थे। सभी का भय दूर करने के लिए और स्थिति को सँभालने के लिए अंतत: श्रीरघुबीर (राम जी) मधुर एवं गंभीर वाणी में बोले।
काव्य सौंदर्य
(i) प्रस्तुत काव्यांश में परशुराम जी के क्रोध, सभा के भय और सीता की चिंता का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है।
(ii) प्रस्तुत काव्यांश में चौपाई और दोहा छंद का सुंदर प्रयोग हुआ है।
(iii) प्रस्तुत काव्यांश में ‘अति रिस बोले बचन कठोरा’ तथा ‘त्रास उर भारी’ जैसे पदों में अनुप्रास अलंकार की छटा दिखाई देती है।
(iv) ‘अरध निमेष कलप सम बीता’ में अतिशयोक्ति अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है।
(v) प्रस्तुत काव्यांश में मुख्यतः रौद्र रस तथा भयानक रस की प्रधानता है।
(vi) प्रस्तुत काव्यांश अवधी भाषा की सहज, सरस तथा प्रभावपूर्ण शैली में रचित है।
काव्यांश 3
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
सेवकु सो जो करें सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा न त मारे जैहहिं सब राजा।।
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने बोले परसुधरहि अपमाने।।
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।

शब्दार्थ:
संभु – शंभु / शिव धनु – धनुष; भंजनिहारा – भंग करने वाला / तोड़ने वाला; के – कोई; आयसु – आज्ञा; काह – क्या; मोही – मुझे; रिसाइ – क्रोध करना; कोही – क्रोधी; अरि करनी – शत्रु का काम; लराई – लड़ाई; जेहिं – जिसने; सम – समान; सो – वह; रिपु – शत्रु; बिलगाउ – अलग होना; बिहाड़ – छोड़कर; जैहहिं – जाएँगे; अपमान – अपमान करना; लरिकाई – बचपन में; कबहुँ – कभी; असि – ऐसा; रिस – क्रोध; कीन्हि – किया; गोसाई – स्वामी / महाराज; एहि – इस; भृगुकुलकेतू – भृगुकुल की पताका अर्थात् परशुराम जी; नृप बालक – राजपुत्र/राजा का बेटा; तिपुरारि – शिवजी; बिदित – जानता है सकल – सारा।
संदर्भ:
पूर्ववत्।
प्रसंग:
प्रस्तुत काव्यांश में श्रीराम द्वारा शिव धनुष टूटने के बाद अत्यंत क्रोधित होकर आए मुनि परशुराम जी और लक्ष्मण के बीच हुए संवाद का वर्णन है।
भावार्थ:
प्रस्तुत काव्यांश में तुलसीदास जी कहते हैं कि सीता स्वयंवर में शिव धनुष खंडित हो जाने पर परशुराम जी बहुत क्रोधित होते हैं एवं धनुष तोड़ने वाले का नाम बताने का आग्रह करते हैं। परशुराम जी के क्रोध को देखकर जब जनक के दरबार में सभी लोग भयभीत हो गए, तो श्रीराम ने आगे बढ़कर कहा – “हे नाथ! भगवान शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा।” राम के वचन सुनकर क्रोधित परशुराम जी बोले – “दास तो वह कहलाता है, जो सेवा का कार्य करता है। शत्रुता का काम करके तो लड़ाई ही मोल ली जाती है।” हे राम! जिसने भगवान शिवजी के इस धनुष को तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है। वह इस समाज (सभा) को छोड़कर तुरंत अलग हो जाए, नहीं तो यहाँ उपस्थित सभी राजा मारे जाएँगे।”
परशुराम जी के इन क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कुराए और परशुराम जी का अपमान करते हुए बोले- “हे गोसाईं! बचपन में हमने ऐसे बहुत से धनुष तोड़े हैं, पर आपने कभी इतना क्रोध नहीं किया। इसी धनुष पर आपकी इतनी ममता क्यों है?” लक्ष्मण की व्यंग्य भरी बातें सुनकर परशुराम जी क्रोधित स्वर में बोले- “अरे राजा के पुत्र! मृत्यु के वश में होने से तुझे यह भी होश नहीं कि तू क्या बोल रहा है? तू सँभलकर नहीं बोल पा रहा है। समस्त विश्व में विख्यात भगवान शिव का यह धनुष क्या तुझे बचपन में तोड़े हुए धनुषों के समान ही दिखाई देता है?”
काव्य सौंदर्य
(i) प्रस्तुत काव्यांश में शिव धनुष के खंडित होने पर परशुराम जी के क्रोधित होने का उल्लेख किया गया है।
(ii) प्रस्तुत काव्यांश में दोहा और चौपाई छंदों का प्रयोग हुआ है।
(iii) ‘सेवकु सो जो करै सेवकाई’ और ‘बहु धनुहीं तोरीं लरिकाई’ में अनुप्रास अलंकार है तथा ‘सहसबाहू सम सो रिपु मोरा’ में उपमा अलंकार है, जहाँ धनुष तोड़ने वाले की तुलना सहस्रबाहु से की गई है।
(v) प्रस्तुत काव्यांश में वीर रस और रौद्र रस की प्रधानता है, जो लक्ष्मण के व्यंग्य और परशुराम जी के क्रोध को दर्शाता है।
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राम लक्ष्मण परशुराम संवाद Summary
राम लक्ष्मण परशुराम संवाद पाठ परिचय

गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म वर्तमान उत्तर प्रदेश में माना जाता है। इनका जीवन काल 16वीं- 17वीं शताब्दी के मध्य माना गया है। ‘राम-लक्ष्मण परशुराम संवाद’ रामचरितमानस के बालकांड से लिया गया एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है, जिसमें सीता स्वयंवर के अवसर पर शिव धनुष भंग होने के बाद परशुराम जी के क्रोध, जनक सभा की स्थिति तथा राम-लक्ष्मण के धैर्य, विनम्रता और वीरता का प्रभावशाली चित्रण हुआ है। तुलसीदास ने इस संवाद के माध्यम से परशुराम के रौद्र एवं क्रोधपूर्ण व्यक्तित्व, लक्ष्मण के व्यंग्यपूर्ण उत्तर और श्रीराम के शांत, संतुलित एवं मर्यादित चरित्र को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत किया है।
राम लक्ष्मण परशुराम संवाद पाठ का उद्देश्य
इस पाठ का उद्देश्य विद्यार्थियों को श्रीराम के धैर्य, विनम्रता और मर्यादा, लक्ष्मण के साहस तथा परशुराम जी के क्रोधी स्वभाव और रौद्र रूप से परिचित कराना है। साथ ही यह बताना है कि विपरीत परिस्थितियों में संयम, शिष्टाचार और साहस बनाए रखना जीवन में अत्यंत आवश्यक गुण हैं।
राम लक्ष्मण परशुराम संवाद पाठ का संदेश
- यह पाठ हमें यह संदेश देता है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपना धैर्य और विवेक नहीं खोना चाहिए। जब सामने वाला व्यक्ति क्रोध में हो तब शांत रहकर और सोच समझकर बोलना ही बुद्धिमानी है।
- इसके अलावा यह पाठ हमें यह भी समझाता है कि क्रोध मनुष्य की सोचने और समझने की शक्ति को कमजोर कर देता है, इसलिए क्रोध पर नियंत्रण रखना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है।