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Class 9 Hindi Chapter 9 MCQ राम लक्ष्मण परशुराम संवाद
Class 9 Hindi राम लक्ष्मण परशुराम संवाद MCQ
राम लक्ष्मण परशुराम संवाद MCQ Questions – Class 9 Hindi Chapter 9 MCQ Online Test
दिए गए गद्यांशों और उन पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तरों को पढ़िए।
(1)
देखत भृगुपति वेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।।
पितु समेत कहि कहि निज नामा लगे करन सब दंड प्रनामा।।
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी सो जानई जानु आई खुटानी।।
जनक बहोरि आई सिरु नावा। सीय बोलाई प्रनामु करावा।।
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं।।
बिस्वामित्र मिले पुनि आई पद सरोज मेले दोउ भाई।।
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचना।।
बहुरि बिलोकि विदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूछत जानि अजान जिमि ब्यादेउ कोपु सरीर।।
शब्दार्थ – भृगुपति – भृगुकुल के स्वामी, परशुराम, वेषु – वेश, कराला – भयानक, डरावना, विकल – बेचैन, मुआला – राजा पितु – पिता, निज – अपना, सुभायै – स्वभाव, चितवहि – ध्यान से देखना, खुटानी – पूरी होना, बहोरि – फिर से सिरु – सिट, नाता – झुकाया, आसिष – आर्शीवाद, हषांनी – प्रसन्न हुई, पद – चरण, सरोज – कमल, ढोटा – पुत्र, जोटा – जोड़ा, लोचन – नेत्र, मद – मस्ती, मोचन – दूर करना, व्यापहु – व्याप्त हो गया, समा गया, कोपु – क्रोध, जिमि – जैसे।
प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश रामभक्त तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के ‘बालकांड से अवतरित है।
सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव धनुष का समाचार जब मुनि परशुराम को मिलता है, तो वे आक्रोशित होकर वहाँ आ जाते हैं। वे शिव-धनुष को खडित देखकर सभा में उपस्थित सभी राजाओं पर क्रोधित होते हैं। यहाँ उसी स्थिति का वर्णन हुआ है।
व्याख्या – अचानक भृगुपति अर्थात् परशुराम का भयानक क्रोध देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा व्याकुल हो गए। वे उठकर खड़े हो गए और पिता सहित अपना-अपना नाम बता-बताकर परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे।
परशुरामजी जिसे अपना प्रिय समझकर उसकी ओर देखते वह समझने लगता कि अब मेरी आयु पूर्ण हो गई है। फिर जनक जी ने अपना सिर नवाया और बेटी सीता को बुलाकर प्रणाम करवाया। परशुरामजी ने सीताजी को आशीर्वाद दिया। यह देखकर सीता जी की सखियाँ हर्षित हुई और वे उन्हें अपनी मंडली में ले गईं। फिर विश्वामित्र आकर मिले और उन्होंने दोनों भाईयों (राम-लक्ष्मण) को परशुराम के चरण कमलों को प्रणाम करने के लिए कहा।
विश्वामित्र ने उन दोनों का परिचय देते हुए बताया कि ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र है। उनकी मनोहर जोड़ी को देखकर परशुराम ने उन्हें आशीर्वाद दिया। कामदेव के मद को भी नष्ट करने वाले श्रीरामचंद्रजी , के अपार रूप को देखकर परशुरामजी के नेत्र चकित अर्थात् स्तंभित रह गए।
दोहा: फिर जब देखकर जानते हुए भी अनजान की तरह परशुराम पूछने लगे कि कहो, यहाँ यह भारी भीड़ क्यों एकत्रित है? यह पूछते समय उनके शरीर में क्रोध छा गया।
विशेष-
1. चौपाई-दोहा छंदों का प्रयोग है।
2. पद-सरोज में रूपक अलंकार है।
बहुविकल्पी प्रश्न
प्रश्न 1.
सभा में अचानक कौन आए थे?
(क) परशुराम
(ख) विश्वामित्र
(ग) अन्य राजा
(घ) वशिष्ठ
उत्तर:
(क) परशुराम
राम-लक्षमण – परशुराम संवाद
प्रश्न 2.
विकराल वेष को देखकर कौन भय भीत हो गया?
(क) राजा जनक
(ख) सभी राजा
(ग) सीता जी
(घ) ये सभी
उत्तर:
(घ) ये सभी
प्रश्न 3.
किस-किसने परशुराम के सम्मुख सिर नवाया?
(क) राजाओं ने
(ख) राजा जनक ने
(ग) सीताजी ने
(घ) इन सभी ने
उत्तर:
(घ) इन सभी ने
प्रश्न 4.
सखियाँ शीघ्र ही सीताजी को अपनी मंडली में क्यों ले गई होंगी?
(क) ताकि सीता परशुराम के क्रोध का शिकार न बन जाए
(ख) अन्य लोगों की नजरों से बचाने के लिए
(ग) राजाओं से बचाने के लिए
(घ) अपने साथ रखने के लिए
उत्तर:
(क) ताकि सीता परशुराम के क्रोध का शिकार न बन जाए
प्रश्न 5.
कथन और कारण का सही मिलान कीजिए।
कथन : रामहि चितई रहे थकि लोचन
कारण : श्री राम का अपार रूप देखकर परशुराम की यह दशा हुई।
विकल्प-
(क) कथन सच है, पर कारण गलत हैं
(ख) कथन गलत है, पर कारण सही हैं
(ग) कथन और कारण दोनों सही हैं। कारण कथन की सही व्याख्या करता है
(घ) कारण सही व्याख्या नहीं करता है
उत्तर:
(ग) कथन और कारण दोनों सही हैं। कारण कथन की सही व्याख्या करता है
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(2)
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।।
अति रिस बोले बचन कठोर। कहु जड़ जनक धानुष कै तोरा।।
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। अलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।।
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी सोचहिं सकल त्रास उस भारी।।
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।।
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।
सभय बिलाके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।
शब्दार्थ – महीप – राजा, अनत – अन्यत्र, निहोरे – देखे, चापखंड – धनुष के अंग (टुकड़े), महि – पृथ्वी, रिस – गुस्सा, जड़ – मूर्ख कै – किसने, बेगि – शीघ्र, मूढ़ – मूर्ख, आजू – आज, महि – पृथ्वी, अति – अत्यंत, डरु – डर, उतरु – उत्तर नृपु – राजा, कुटिल – मक्कार, भूप – राजा, हरषे – खुश हुए,
सुर – देवता, नाग – सूर्य, सकल – सारे, त्रास – दुख, कष्ट, पछितााहि – पछताने लगी, सीय महतारी – सीता की माँ सुनयना, विधि – भाग्य, बिगारी – बिगड़ी, भृगुपति – परशुराम, निमेष – थोड़ी देर के लिए, कलप – कल्प, लंबा समय, सभय – भय सहित बिलोके – देखे, अरध – आधा क्षण भीरु – भयभीत, हरषु – हर्ष, विषाद – दुख।
प्रसंग – प्रस्तुत अवतरण रामभक्त कवि तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरित मानस’ के ‘बालकांड’ से अवतरित है।
सीता-स्वयंवर के अवसर पर शिवजी के धनुष भंग का समाचार सुनकर मुनि परशुराम का अचानक आगमन हो जाता है। उनके क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर वहाँ का वातावरण अत्यंत तनावपूर्ण हो जाता है। राजा जनक, सीता की माता सुनयना तथा सीताजी स्वयं भयभीत हो जाती हैं। तब अंत में श्रीरामचंद्र परशुराम का क्रोध शांत करने के लिए बोले।
व्याख्या – परशुराम के पूछने पर राजा जनक ने सभी समाचार कह सुनाए राजा जनक के वचन सुनकर परशुराम जी ने घूमकर दूसरी ओर देखा तो उन्होंने शिव धनुष के टुकड़े भूमि पर पड़े हुए दिखाई दिए।
तब परशुराम अत्यंत क्रोध में भरकर कठोर वचन बोले ‘रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा, धनुष किसने तोड़ा’ मुझे उसे शीघ्र ही दिखा नहीं तो अरे मूढ़ राजा जनक, आज में जहाँ तक तेरा राज्य है, वहाँ तक की सारी पृथ्वी को उलट दूँगा।
यह सुनकर राजा जनक को डर लगने लगा। इसी कारण वे कोई उत्तर नहीं दे पाए। यह दृश्य देखकर सभा में उपस्थित कुटिल राजा मन में बड़े प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगर के स्त्री-पुरुष सभी चिंतित हो गए। सभी के हृदय भयभीत हो गए।
सीताजी की माता सुनयना मन में पछताने लगीं कि हाय ! विधाता ने अब बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। परशुरामजी का स्वभाव सुनकर सीतजी का आधा क्षण भी कल्प के समान बीतने लगा।
दोहा : तब श्री रामचंद्रजी सब लोग को भयभीत देखकर और सीताजी को डरी हुई जानकर बोले। उस समय उनके हृदय में न कुछ हर्ष था और न विषाद। वे सामान्य थे।
विशेष-
• भय के वातावरण का सजीव चित्रण किया गया है।
• सीय महतारी सोचहि सकल में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।
• चौपाई दोहा छंद शैली अपनाई गई है।
• अवधी भाषा का प्रयोग है।
बहुविकल्पी प्रश्न
प्रश्न 1.
परशुराम ने सभा में क्या देखा?
(क) उपस्थित राजा
(ख) शिव धनुष के टुकड़े
(ग) ‘क’ और ‘ख’ दोनों
(घ) सीता को
उत्तर:
(ग) ‘क’ और ‘ख’ दोनों
प्रश्न 2.
परशुराम ने कठोर भाषा में राजा जनक से क्या कहा?
(क) मूर्ख राजा, यह धनुष किसने तोड़ा है।
(ख) मुझे शीघ्र ही धनुष तोड़ने वाले को दिखाए
(ग) मैं तेरे राज्य की पूरी धरती को उलटकर रख दूँगा
(घ) उपर्युक्त सभी बातें
उत्तर:
(घ) उपर्युक्त सभी बातें
प्रश्न 3.
कुटिल राजाओं के हर्षित होने का क्या कारण था?
(क) राजा जनक द्वारा परशुराम के प्रश्न का उत्तर न दे पाना
(ख) अपने को सुरक्षित जानकर
(ग) परशुराम के क्रोध से बच जाने के कारण
(घ) स्वयंवर के रद्द हो जाने की संभावना जानकर
उत्तर:
(क) राजा जनक द्वारा परशुराम के प्रश्न का उत्तर न दे पाना
प्रश्न 4.
सीता की माता क्यों पछता रही थीं?
(क) स्वयंवर का आयोजन करके
(ख) शिव धनुष-भंग करने की शर्त रखकर
(ग) परशुराम का क्रोध देखकर
(घ) अपने गलत निर्णय पर
उत्तर:
(ख) शिव धनुष-भंग करने की शर्त रखकर
प्रश्न 5.
श्री रामचंद्र जी परशुराम को उत्तर देते समय कैसे लग रहे थे?
(क) न हर्षित
(ख) न विषादम्य
(ग) ‘क’ और ‘ख’ दोनों
(घ) भयभीत
उत्तर:
(ग) ‘क’ और ‘ख’ दोनों
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(3)
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयुस काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाई बोने मुनि कोही।।
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।
बहु धनुहीं तो लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
एहि धनु पर ममता केहि हेतू सुनि रिसाई कह भृगुकुलकेतू।।
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।
शब्दार्थ – संभुधनु – शिवजी का धनुष, भंजन हारा – तोड़ने वाला, नष्ट करने वाला होइहि – होगा, केऊ – कोई,
आयेसु – आज्ञा, रिसाई – गुस्सा आ गया।, अरि करनी – शत्रु का काम करने वाला, राई – लड़ाई, रिपु – शत्रु, मोरा मेरा, बिलगाउ – अलग होना, अवमाने – अपमान करना, लरिकाई – बचपन में ममता – लगाव, नृप राजा।
प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के ‘बाल कांड’ से अवतरित है। सीता स्वयंवर में रामचंद्र शिव धनुष को तोड़ देते हैं। जब परशुराम को यह समाचार मिलता है तो वे क्रोधित होते हुए वहाँ आते हैं और राम-लक्ष्मण से क्रोधपूर्ण अवस्था में संवाद करते हैं। यहाँ वही संवाद लिया गया है।
व्याख्या – जब मुनि परशुराम ने अत्यंत क्रोध में भरकर राजा जनक से पूछा कि इस शिवधनुष को किसने तोड़ा है तब राम ने सभी को भयभीत जानकर स्वयं उत्तर दिया-
हे नाथ! (मुनि परशुराम) शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा अर्थात् मैं आपका दास हूँ। कहिए मेरे लिए क्या आज्ञा है, मुझसे कहिए। यह सुनकर मुनि परशुराम क्रोधित होकर बोले-सेवक तो वह होता है जो सेवा का काम करे।
शत्रुता का काम करने वाले से तो लड़ाई ही की जाती है। हे राम! सुनो, जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु वह (धनुष तोड़ने वाला) इस समाज को छोड़कर स्वयं अलग हो जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे। मुनि के ऐसे वचन सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कराए और परशुराम जी का अपमान करते हुए बोले- गोसाई ! बचपन में हमने ऐसी बहुत से धनुहियाँ तोड़ डालीं, तब आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुष पर आपकी ममतास किस कारण से है? यह सुनकर भृगुवंश की ध्वजास्वरूप परशुराम जी कुपित होकर कहने लगे –
दोहा : अरे राजपुत्र! काल के वश होने के कारण, तुझे बोलने की कुछ भी समझ नहीं है। सारे संसार में विख्यात शिवजी का यह धनुष क्या धनुही के समान है?
राम-लक्षमण-परशुराम संवाद
बहुविकल्पी प्रश्न
प्रश्न 1.
कौन स्वयं को दास बता रहा है?
(क) राम
(ख) लक्ष्मण
(ग) परशुराम
(घ) जनक
उत्तर:
(क) राम
प्रश्न 2.
शिवधनुष तोड़ने वाले को परशुराम किसके समान बता रहे हैं?
(क) शत्रु
(ख) सहस्रबाहु के समान
(ग) दुष्ट के समान
(घ) वध करने के समान
उत्तर:
(ख) सहस्रबाहु के समान
प्रश्न 3.
मुनि के वचन सुनकर कौन मुस्कराने लगे?
(क) लक्ष्मण
(ख) राम
(ग) वशिष्ट
(घ) जनक
उत्तर:
(क) लक्ष्मण
प्रश्न 4.
परशुराम की बातों में क्या झलक रहा था?
(क) क्रोध
(ख) डींग मारने की प्रवृत्ति
(ग) (क) और (ख) दोनों
(घ) कुछ नहीं
उत्तर:
(ग) (क) और (ख) दोनों
प्रश्न 5.
इस काव्यांश की भाषा कौन सी है?
(क) बृज
(ख) अवधी
(ग) मैथिली
(घ) भोजपुरी
उत्तर:
(ख) अवधी