Daily practice of Class 9 Hindi Important Questions and Class 9 Hindi Ganga Chapter 9 Extra Question Answer राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद builds a strong language foundation over time.
Class 9 Hindi राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Extra Question Answer
Class 9 Hindi Chapter 9 राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Extra Question Answer
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद Extra Question Answer लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
लक्ष्मण ने सीता स्वयंवर में किस मुनि को चुनौती दी? क्यों और कैसे?
उत्तरः
लक्ष्मण ने सीता स्वयंवर में परशुराम को चुनौती दी। मुनि परशुराम अपनी वीरता की डींग हाँक रहे थे और स्वयंवर में रखे धनुष को तोड़ने वाले को ललकार रहे थे। लक्ष्मण को मुनि का यह व्यवहार सहन नहीं हुआ। परशुराम ने लक्ष्मण को मार डालने की धमकी भी दी थी। अतः लक्ष्मण ने उसका समुचित उत्तर देते हुए मुनि को चुनौती दे डाली।
प्रश्न 2.
साहस और शक्ति के साथ विनम्रता हो तो बेहतर है। इस कथन पर अपने विचार लिखें।
उत्तरः
साहस और शक्ति दोनों सद्गुण हैं। विनम्रता भी एक अनुकरणीय गुण है। प्रायः साहस और शक्ति का प्रदर्शन करते समय विनम्रता पीछे छूट जाती है। इसे साहस और शक्ति का विरोधी मान लिया जाता है लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। साहस और शक्ति तभी प्रशंसनीय गुण बनते हैं, जब उनमें विनम्रता का पुट हो। राम के चरित्र में इन तीनों गुणों को देखा जा सकता है। विनम्रता, साहस और शक्ति को उदंड बनने से रोकती है। जब किसी का साहस विनम्रता की सीमा लाँघ जाता है तब वह दुस्साहस कहलाता है।
प्रश्न 3.
लक्ष्मण ने परशुराम को शूरवीर कहकर भी उनकी कायरता पर व्यंग्य किया है, कैसे?
उत्तरः
पहले तो लक्ष्मण ने परशुराम की प्रशंसा करते हुए उन्हें शूरवीर बताया, फिर शीघ्र ही शूरवीर के लक्षण बताते हुए उन पर व्यंग्य कर दिया। लक्ष्मण ने व्यंग्य किया शूरवीर तो युद्ध के मैदान में वीरता के काम करते हैं। कायर ही शत्रु के सामने अपनी वीरता की दंभपूर्ण उक्ति कहते फिरते हैं। परशुराम भी अपने मुँह से अपनी वीरता का बढ़-चढ़कर बखान कर रहे थे। लक्ष्मण ने उन्हें धरती सुँघा दी।
प्रश्न 4.
संकलित अंश में राम का व्यवहार विनयपूर्ण और संयत है, लक्ष्मण लगातार व्यंग्यबाणों का उपयोग करते हैं और परशुराम का व्यवहार क्रोध से भरा हुआ है। आप अपने आपको इस परिस्थिति में रखकर लिखें कि आपका व्यवहार कैसा होता?
उत्तर:
हमारा व्यवहार संतुलित होता। हम न तो किसी के सम्मुख स्वयं को उसका दास बताते (जैसा राम ने कहा) और न लक्ष्मण के समान परशुराम पर व्यंग्य बाण छोड़ते। हम परशुराम के क्रोध को भी अनुचित मानते हैं।
हम सीधी तरह से अपनी बात कहते। जो काम हमने किया है, उसे साहसपूर्ण ढंग से स्वीकार करते। यदि सामने वाला फिर भी क्रोध करता तो हम उसे युद्ध की चुनौती देते।
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प्रश्न 5.
अपने किसी परिचित या मित्र के स्वभाव की विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
हमारे मित्र के स्वभाव की विशेषताएँ-
- हमारा मित्र मित्रता का निर्वाह करना जानता है।
- वह विनम्र है, पर सीमा से बढ़कर नहीं।
- मेरा मित्र माता-पिता एवं गुरुजनों का पूरा-पूरा सम्मान करता है।
- वह एक-दूसरे के साथ सहयोग करता है।
- वह जिज्ञासु प्रवृत्ति का है। वह प्रत्येक नई बात की तह में जाकर उसे समझना चाहता है।
- मेरा मित्र क्रोधी स्वभाव का नहीं है, पर आत्मसम्मानी है।
प्रश्न 6.
आपके विचार से परशुराम का आना सामान्य बात तो नहीं होगी? वे क्या सोचकर आए होंगे।
उत्तर:
परशुराम शिवभक्त थे। जब शिव का धनुष भंग हुआ तब आकाश में भयंकर टंकार हुई थी। परशुराम ने भी वह टंकार सुनी होगी। उसी के बारे में उनके मन में जो आशंका हुई होगी, उसी प्रत्यक्ष रूप देखने वे राजा जनक के दरबार में आ गए।
प्रश्न 7.
सीता की माता का नाम क्या था? उस की चिंता किस प्रकार की थी?
उत्तरः
सीता की माता का नाम सुनयना था। पहले तो वह धनुष टूटने पर प्रसन्न थी पर परशुराम ने वहाँ आकर बखेड़ा खड़ा कर दिया तब वह चिंतित हो गई। उसे लगा कि बना बनाया सारा का कही बिगड़ न जाए। अर्थात् पुत्री सीता के विवाह में कोई अड़चन न आ जाए।
प्रश्न 8.
परशुराम की किस बात से जनक की सभा में सन्नाटा छा गया। उत्तर: परशुराम विकराल रूप धारण करके, फरसा चमकाते हुए राजा जनक की सभा में आए थे। सभा में उपस्थित सभी लोग उनके क्रोधी स्वभाव से भली भांति परिचित थे। उन्हें देखकर कोई भी खुश नहीं होता था। परशुराम का आगमन कोई-न-कोई अनिष्ट ही लेकर होता था। अतः भावी आशंका के भय में सभा में सन्नाटा छा गया।
Class 9 Hindi Chapter 9 Extra Questions and Answers दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
परशुराम के क्रोध करने पर राम और लक्ष्मण की जो प्रतिक्रियाएँ हुईं उनके आधार पर दोनों के स्वभाव की विशेषताएँ अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तरः
राम के स्वभाव की विशेषताएँ-
- राम विनयशील स्वभाव के हैं। उन्होंने स्वयं को परशुराम का दास बताया।
- राम बड़ों की आज्ञा का पालन करने वाले हैं। यही कारण है। कि वे परशुराम से अपने लिए आज्ञा पूछते हैं।
- राम अत्यंत धैर्यवान हैं। वे परशुराम की क्रोधपूर्ण बातों को अत्यंत धैर्यपूर्वक सुनते और सहते रहे।
- वे मृदुभाषी हैं। उन्होंने लक्ष्मण को शांत रहने का निर्देश दिया।
लक्ष्मण के स्वभाव की विशेषताएँ-
- लक्ष्मण वीर एवं साहसी हैं।
- लक्ष्मण की भाषा में व्यंग्य का समावेश रहता है।
- लक्ष्मण का स्वभाव निडर है। वे परशुराम के क्रोध और फरसे राम-लक्षमण – परशुराम संवाद से आतंकित नहीं होते हैं।
- लक्ष्मण व्यंग्यपूर्ण हँसी हँसते हैं।
- वे किसी भी प्रकार के अन्याय को सहन नहीं कर पाते हैं।
प्रश्न 2.
निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए।
नाथ संभुधनु भंजनिहारा।
होइहि केड एक दास तुम्हारा।।
आयेसु काह कहिअ किन मोही।
सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
सेवकु सो जो करै सेवकाई।
अरि करनी करि करिअ लराई||
सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा।
सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।
न त मारे जैहहिं सब राजा।।
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने।
बोले परसु धरहि अवमाने।।
बहु धनुही तोरी लरिकाई।
कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
येहि धनु पर ममता केहि हेतू।
सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
(i) धनुष के टूट जाने पर क्रोधित परशुराम को शांत करने के लिए राम ने क्या कहा? उन वचनों में उनका कौन-सा गुण झलकता है?
उत्तरः
धनुष के टूट जाने पर परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम ने यह कहा कि इस शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला व्यक्ति आपका ही कोई दास होगा अन्य कोई व्यक्ति इसे तोड़ने का साहस नहीं कर सकता है। आप मुझे आज्ञा दीजिए, मैं उसे पूरा करूँगा । इन वचनों से राम की अनयशीलता का गुण झलकता है।
(ii) राम के वचन सुनकर परशुराम ने क्या कहा? उससे उनके स्वभाव के बारे में क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर:
राम के वचन सुनकर परशुराम ने क्रोध में भरकर यह कहा कि सेवक तो वह होता है जो सेवा का काम करता है। शत्रुता का काम करने वाले से तो लड़ाई ही की जाती है। जिस व्यक्ति ने धनुष तोड़ा है वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।
इस कथन से परशुराम के क्रोधी स्वभाव की जानकारी मिलती है।
(iii) लक्ष्मण बीच में क्यों बोल पड़े? उन्हें परशुराम के कथन पर क्या आपत्ति थी?
उत्तर:
परशुराम की क्रोध भरी बातें सुनकर लक्ष्मण बीच में ही बोल पड़े। परशुराम को याद दिलाने लगे कि हमने तो बचपन में ही ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ी थीं, तब तो आपने क्रोध नहीं किया। इस धनुष पर आपकी इतनी ममता का क्या विशेष कारण है?
प्रश्न 3.
परशुराम ने धनुष तोड़ने वाले के विषय में पूछा तो श्रीराम ने ‘धनुष मेरे द्वारा टूट गया हैं’ सीधा उत्तर न देकर ऐसा क्यों कहा कि ‘धनुष तोड़ने वाला आपका कोई दास होगा’।
उत्तरः
श्रीराम यह बात भली भाँति जानते थे कि परशुराम अत्यंत क्रोधी स्वभाव के हैं। वे परशुराम को और अधिक उत्तेजित होने का अवसर नहीं देना चाहते थे। राम सीधे अपना नाम लेकर परशुराम के क्रोध को भड़काने नहीं चाहते थे। वे सीधे-सीधे अपना नाम न लेकर, घुमाकर यह कह देते हैं कि धनुष तोड़ने वाला आपका ही कोई दास होगा। अर्थात् यह धनुष अन्य किसी ने नहीं, आपके ही दास ने तोड़ा है। इस कथन के द्वारा वे परशुराम के क्रोध को शांत करना चाहते थे।
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प्रश्न 4.
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद से हमें क्या नैतिक शिक्षाएँ मिलती हैं? विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
इस संवाद में तुलसीदास ने कई महत्त्वपूर्ण नैतिक शिक्षाएँ दी हैं: विनम्रता सबसे बड़ी शक्ति है: राम ने अत्यंत कठिन परिस्थिति में भी विनम्रता नहीं छोड़ी। उन्होंने श्नाथ कहकर और दास – भाव से बात की। क्रोध विवेक नष्ट करता है: परशुराम जैसे महान ऋषि भी क्रोध में अनुचित वचन बोलते हैं और गलत निर्णय लेने को उद्यत हो जाते हैं। अहंकार से बचना चाहिए: परशुराम का अहंकार उन्हें राम के वास्तविक रूप को पहचानने से रोकता है। साहस और मर्यादा का संतुलन: लक्ष्मण साहस दिखाते हैं, परंतु यह भी शिक्षा है कि साहस को मर्यादा के साथ व्यक्त करना चाहिए। गुरु और विद्वानों का सम्मान : विश्वामित्र के हस्तक्षेप से परिस्थिति सुधरती है – गुरु का मार्गदर्शन अमूल्य है। संक्षेप में, यह संवाद जीवन के आदर्शों. विनम्रता, धैर्य, साहस और संयम का सुंदर चित्रण है।
प्रश्न 5.
‘इस संवाद में तुलसीदास ने राम को मर्यादा और धैर्य का प्रतीक दिखाया है’ – इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
यह कथन पूर्णतः सत्य है। संवाद के अनेक प्रसंगों से इसकी पुष्टि होती है: मर्यादित संबोधन: राम ने परशुराम को श्नाथ कहा – यद्यपि परशुराम अत्यंत क्रोधित और अपमानजनक वचन बोल रहे थे। विनम्र उत्तरः श्नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा इस पंक्ति में राम ने स्वयं को दास कहकर अत्यंत मर्यादित उत्तर दिया। लक्ष्मण को रोकने का प्रयासः लक्ष्मण के उग्र वचनों से राम चिंतित थे उनकी मर्यादा रक्षा की भावना स्पष्ट थी। शांत मुद्राः शहृदयँ न हरषु बिषादु कछुए राम न अत्यधिक प्रसन्न थे, न दुखी; वे पूर्ण धैर्य से तटस्थ रहे। तुलसीदास ने राम को श्मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में स्थापित किया है जो हर परिस्थिति में अपने आदर्शों पर दृढ़ रहते हैं।
भाषा की बात
प्रश्न 1.
निम्नलिखित शब्दों के खड़ी हिंदी रूप लिखिए-
• सुमायँ
• बहोरि
• जोटा
• रिसाइ
• कोही
• लरकाई
उत्तर:
• स्वभाव
• एकत्रित करना
• जोड़ा
• क्रोध
• क्रोधी
• लड़कपन
प्रश्न 2.
संज्ञा-भेद बताइए-
• जनक
• धनुष
• लरकाई
• सरोज
• मुनि
उत्तर:
• जनक – व्यक्ति वाचक संज्ञा
• धनुष – जातिवाचक संज्ञा
• लरकाई – भाववाचक संज्ञा
• सरोज – (नाम) व्यक्तिवाचक संज्ञा (फूल) जातिवाचक संज्ञा
• मुनि जातिवाचक
प्रश्न 3.
अलंकार बताओ –
(क) पद सरोज
(ख) सो बिलगाइ बिहाइ समाजा
(ग) चरण-कमल
(घ) मा मद मोचन
उत्तरः
(क) रूपक अलंकार
(ख) अनुप्रास अलंकार
(ग) रूपक अलंकार
(घ) अनुप्रास अलंकार
प्रश्न 4.
विशेषण के नीचे रेखा खींचो-
उत्तरः
• मृगुपति वेष कराला
• जानत सकल संसार
यह भी जाने
दोहा : दोहा एक लोकप्रिय मात्रिक छंद है जिसकी पहली और तीसरी पंक्ति में 13-13 मात्राएँ होती हैं। दूसरी और चौथी पंक्ति में 11-11 मात्राएँ, कुल 24 मात्राएँ होती हैं।
चौपाई : मात्रिक छंद चौपाई चार पंक्तियों का होता है और इसकी प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ होती हैं।
तुलसी से पहले सभी कवियों ने भी अवधी भाषा में दोहा- चौपाई छंद का प्रयोग किया है जिसमें मलिक मुहम्मद जायसी का पद्मावत उल्लेखनीय है।
परशुराम और सहस्रबाहु की कथा
पाठ में ‘सहस्त्रबाहु सम सो रिपु मेरा का कई बार उल्लेख आया है। परशुराम और सहस्त्रबाहु के बारे में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। महाभारत के अनुसार यह कथा इस प्रकार है-
परशुराम ऋषि जमदग्नि के पुत्र थे। एक बार राजा कार्तवीर्य सहस्त्रबाहु शिकार खेलते हुए जमदग्नि के आश्रम में आए। जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी जो विशेष गाय थी। कहते हैं वह सभी कामनाएँ। पूरी करती थी। कार्तवीर्य सहस्त्रबाहु ने ऋषि जमदग्नि से कामधेनु गाय की माँग की। ऋषि द्वारा मना किए जाने पर सहस्त्रबाहु ने कामधेनु गाय का बलपूर्वक अपहरण कर लिया।
इस पर क्रोधित होकर परशुराम ने सहस्त्रबाहु का वध कर दिया। इस कार्य की ऋषि जमदग्नि ने बहुत निंदा की और परशुराम को प्रायश्चित करने को कहा। उधर सहस्त्रबाहु के पुत्रों ने क्रोध में आकर ऋषि जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर पुनः क्रोधित होकर परशुराम ने पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने की प्रतिज्ञा की।
Class 9 Ganga Chapter 9 Extra Question Answer अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
(1)
देखत भृगुपति वेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।।
पितु समेत कहि कहि निज नामा लगे करन सब दंड प्रनामा।।
जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी सो जानई जानु आई खुटानी।।
जनक बहोरि आई सिरु नावा। सीय बोलाई प्रनामु करावा।।
आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं।।
बिस्वामित्र मिले पुनि आई पद सरोज मेले दोउ भाई।।
रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।
रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचना।।
बहुरि बिलोकि विदेह सन कहहु काह अति भीर।
पूछत जानि अजान जिमि ब्यादेउ कोपु सरीर।।
शब्दार्थ – भृगुपति – भृगुकुल के स्वामी, परशुराम, वेषु – वेश, कराला – भयानक, डरावना, विकल – बेचैन, मुआला – राजा पितु – पिता, निज – अपना, सुभायै – स्वभाव, चितवहि – ध्यान से देखना, खुटानी – पूरी होना, बहोरि – फिर से सिरु – सिट, नाता – झुकाया, आसिष – आर्शीवाद, हषांनी – प्रसन्न हुई, पद – चरण, सरोज – कमल, ढोटा – पुत्र, जोटा – जोड़ा, लोचन – नेत्र, मद – मस्ती, मोचन – दूर करना, व्यापहु – व्याप्त हो गया, समा गया, कोपु – क्रोध, जिमि – जैसे।
प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश रामभक्त तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के ‘बालकांड से अवतरित है।
सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव धनुष का समाचार जब मुनि परशुराम को मिलता है, तो वे आक्रोशित होकर वहाँ आ जाते हैं। वे शिव-धनुष को खडित देखकर सभा में उपस्थित सभी राजाओं पर क्रोधित होते हैं। यहाँ उसी स्थिति का वर्णन हुआ है।
व्याख्या – अचानक भृगुपति अर्थात् परशुराम का भयानक क्रोध देखकर सभा में उपस्थित सभी राजा व्याकुल हो गए। वे उठकर खड़े हो गए और पिता सहित अपना-अपना नाम बता-बताकर परशुराम को दंडवत प्रणाम करने लगे।
परशुरामजी जिसे अपना प्रिय समझकर उसकी ओर देखते वह समझने लगता कि अब मेरी आयु पूर्ण हो गई है। फिर जनक जी ने अपना सिर नवाया और बेटी सीता को बुलाकर प्रणाम करवाया। परशुरामजी ने सीताजी को आशीर्वाद दिया। यह देखकर सीता जी की सखियाँ हर्षित हुई और वे उन्हें अपनी मंडली में ले गईं। फिर विश्वामित्र आकर मिले और उन्होंने दोनों भाईयों (राम-लक्ष्मण) को परशुराम के चरण कमलों को प्रणाम करने के लिए कहा।
विश्वामित्र ने उन दोनों का परिचय देते हुए बताया कि ये राम और लक्ष्मण राजा दशरथ के पुत्र है। उनकी मनोहर जोड़ी को देखकर परशुराम ने उन्हें आशीर्वाद दिया। कामदेव के मद को भी नष्ट करने वाले श्रीरामचंद्रजी , के अपार रूप को देखकर परशुरामजी के नेत्र चकित अर्थात् स्तंभित रह गए।
दोहा: फिर जब देखकर जानते हुए भी अनजान की तरह परशुराम पूछने लगे कि कहो, यहाँ यह भारी भीड़ क्यों एकत्रित है? यह पूछते समय उनके शरीर में क्रोध छा गया।
विशेष-
1. चौपाई-दोहा छंदों का प्रयोग है।
2. पद-सरोज में रूपक अलंकार है।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
राजा जनक की स्वयंवर सभा में अचानक कौन किस वेश में आ गए थे? इसका वहाँ क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तरः
राजा जनक की स्वयंवर सभा में अचानक परशुराम विकराल अर्थात् भयंकर, डरावने वेश में वहाँ आ गए थे। उनके इस रूप को देखकर वहाँ उपस्थित सभी राजा भयभीत हो गए।
प्रश्न 2.
राजाओं ने तत्काल क्या काम किया।
उत्तरः
राजाओं ने तत्काल अपने स्थान से उठकर मुनि परशुराम को दंडवत प्रणाम किया तथा अपने पिता के नाम सहित अपना परिचय दिया।
प्रश्न 3.
राजा जनक ने परशुराम के प्रति अपना सम्मान कैसे प्रकट किया?
उत्तरः
राजा जनक ने परशुराम के समक्ष अपना सिर झुकाकर प्रणाम किया। अपनी पुत्री सीता को बुलवाकर उससे भी प्रणाम करवाकर परशुराम का आर्शीवद दिलवाया।
प्रश्न 4.
विश्वामित्र ने क्या कार्य किया?
उत्तर:
विश्वामित्र ने आकर परशुराम का सम्मान करके राम-लक्ष्मण का परिचय करवाया कि ये राजा दशरथ के पुत्र हैं। फिर उन्हें ऋषि परशुराम ने आशीर्वाद भी दिया।
प्रश्न 5.
परशुराम ने राजा जनक से क्या पूछा?
उत्तर:
परशुराम ने सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनते हुए राजा जनक से यह पूछा कि आपकी सभा में इतनी भारी भीड़ क्यों एकत्रित है? यह पूछते समय परशुराम के शरीर में क्रोध व्याप्त हो रहा था।
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(2)
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।
सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।।
अति रिस बोले बचन कठोर। कहु जड़ जनक धानुष कै तोरा।।
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। अलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।।
अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।
सुर मुनि नाग नगर नर नारी सोचहिं सकल त्रास उस भारी।।
मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।।
भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।
सभय बिलाके लोग सब जानि जानकी भीरु।
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।
शब्दार्थ – महीप – राजा, अनत – अन्यत्र, निहोरे – देखे, चापखंड – धनुष के अंग (टुकड़े), महि – पृथ्वी, रिस – गुस्सा, जड़ – मूर्ख कै – किसने, बेगि – शीघ्र, मूढ़ – मूर्ख, आजू – आज, महि – पृथ्वी, अति – अत्यंत, डरु – डर, उतरु – उत्तर नृपु – राजा, कुटिल – मक्कार, भूप – राजा, हरषे – खुश हुए,
सुर – देवता, नाग – सूर्य, सकल – सारे, त्रास – दुख, कष्ट, पछितााहि – पछताने लगी, सीय महतारी – सीता की माँ सुनयना, विधि – भाग्य, बिगारी – बिगड़ी, भृगुपति – परशुराम, निमेष – थोड़ी देर के लिए, कलप – कल्प, लंबा समय, सभय – भय सहित बिलोके – देखे, अरध – आधा क्षण भीरु – भयभीत, हरषु – हर्ष, विषाद – दुख।
प्रसंग – प्रस्तुत अवतरण रामभक्त कवि तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरित मानस’ के ‘बालकांड’ से अवतरित है।
सीता-स्वयंवर के अवसर पर शिवजी के धनुष भंग का समाचार सुनकर मुनि परशुराम का अचानक आगमन हो जाता है। उनके क्रोधपूर्ण वचनों को सुनकर वहाँ का वातावरण अत्यंत तनावपूर्ण हो जाता है। राजा जनक, सीता की माता सुनयना तथा सीताजी स्वयं भयभीत हो जाती हैं। तब अंत में श्रीरामचंद्र परशुराम का क्रोध शांत करने के लिए बोले।
व्याख्या – परशुराम के पूछने पर राजा जनक ने सभी समाचार कह सुनाए राजा जनक के वचन सुनकर परशुराम जी ने घूमकर दूसरी ओर देखा तो उन्होंने शिव धनुष के टुकड़े भूमि पर पड़े हुए दिखाई दिए।
तब परशुराम अत्यंत क्रोध में भरकर कठोर वचन बोले ‘रे मूर्ख जनक! बता, धनुष किसने तोड़ा, धनुष किसने तोड़ा’ मुझे उसे शीघ्र ही दिखा नहीं तो अरे मूढ़ राजा जनक, आज में जहाँ तक तेरा राज्य है, वहाँ तक की सारी पृथ्वी को उलट दूँगा।
यह सुनकर राजा जनक को डर लगने लगा। इसी कारण वे कोई उत्तर नहीं दे पाए। यह दृश्य देखकर सभा में उपस्थित कुटिल राजा मन में बड़े प्रसन्न हुए। देवता, मुनि, नाग और नगर के स्त्री-पुरुष सभी चिंतित हो गए। सभी के हृदय भयभीत हो गए।
सीताजी की माता सुनयना मन में पछताने लगीं कि हाय ! विधाता ने अब बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। परशुरामजी का स्वभाव सुनकर सीतजी का आधा क्षण भी कल्प के समान बीतने लगा।
दोहा : तब श्री रामचंद्रजी सब लोग को भयभीत देखकर और सीताजी को डरी हुई जानकर बोले। उस समय उनके हृदय में न कुछ हर्ष था और न विषाद। वे सामान्य थे।
विशेष-
• भय के वातावरण का सजीव चित्रण किया गया है।
• सीय महतारी सोचहि सकल में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।
• चौपाई दोहा छंद शैली अपनाई गई है।
• अवधी भाषा का प्रयोग है।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
राजा जनक का उत्तर सुनकर परशुराम पर क्या प्रतिक्रिया हुई?
उत्तरः
राजा जनक ने परशुराम के प्रश्न का उत्तर तो दे दिया, पर परशुराम को उस उत्तर को सुनकर पूरी तरह संतोष नहीं हुआ। उन्होंने घूमकर पूरी स्थिति का जायजा लिया। उन्हें एक ओर भूमि पर शिवधनुष के दो टुकड़े पड़े हुए दिखाई दिए। इन्हें देखकर परशुराम अत्यंत क्रोधित हो गए।
प्रश्न 2.
परशुराम के क्रोध को देखकर कौन-कौन भयभीत हो गए?
उत्तर:
परशुराम के क्रोध को देखकर देवता, मुनि, नाग और नगर के सभी स्त्री-पुरुष सभी भयभीत हो गए। उन्हें चिंता सताने लगी सीता जी भी इतनी डर गई कि उनका आधा क्षण भी कल्प के समान व्यतीत होने लगा।
प्रश्न 3.
सीताजी सहित अन्य सभी लोगों को भयमुक्त किसने कराया।
उत्तर:
श्री रामचंद्र जी ने उठकर सभी को भयमुक्त कराया।
(3)
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
आयुस काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाई बोने मुनि कोही।।
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।।
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।
बहु धनुहीं तो लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
एहि धनु पर ममता केहि हेतू सुनि रिसाई कह भृगुकुलकेतू।।
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।
शब्दार्थ – संभुधनु – शिवजी का धनुष, भंजन हारा – तोड़ने वाला, नष्ट करने वाला होइहि – होगा, केऊ – कोई,
आयेसु – आज्ञा, रिसाई – गुस्सा आ गया।, अरि करनी – शत्रु का काम करने वाला, राई – लड़ाई, रिपु – शत्रु, मोरा मेरा, बिलगाउ – अलग होना, अवमाने – अपमान करना, लरिकाई – बचपन में ममता – लगाव, नृप राजा।
प्रसंग – प्रस्तुत काव्यांश गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ के ‘बाल कांड’ से अवतरित है। सीता स्वयंवर में रामचंद्र शिव धनुष को तोड़ देते हैं। जब परशुराम को यह समाचार मिलता है तो वे क्रोधित होते हुए वहाँ आते हैं और राम-लक्ष्मण से क्रोधपूर्ण अवस्था में संवाद करते हैं। यहाँ वही संवाद लिया गया है।
व्याख्या – जब मुनि परशुराम ने अत्यंत क्रोध में भरकर राजा जनक से पूछा कि इस शिवधनुष को किसने तोड़ा है तब राम ने सभी को भयभीत जानकर स्वयं उत्तर दिया-
हे नाथ! (मुनि परशुराम) शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा अर्थात् मैं आपका दास हूँ। कहिए मेरे लिए क्या आज्ञा है, मुझसे कहिए। यह सुनकर मुनि परशुराम क्रोधित होकर बोले-सेवक तो वह होता है जो सेवा का काम करे।
शत्रुता का काम करने वाले से तो लड़ाई ही की जाती है। हे राम! सुनो, जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु वह (धनुष तोड़ने वाला) इस समाज को छोड़कर स्वयं अलग हो जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे। मुनि के ऐसे वचन सुनकर लक्ष्मण जी मुस्कराए और परशुराम जी का अपमान करते हुए बोले- गोसाई ! बचपन में हमने ऐसी बहुत से धनुहियाँ तोड़ डालीं, तब आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुष पर आपकी ममतास किस कारण से है? यह सुनकर भृगुवंश की ध्वजास्वरूप परशुराम जी कुपित होकर कहने लगे –
दोहा : अरे राजपुत्र! काल के वश होने के कारण, तुझे बोलने की कुछ भी समझ नहीं है। सारे संसार में विख्यात शिवजी का यह धनुष क्या धनुही के समान है?
राम-लक्षमण-परशुराम संवाद
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
धनुष तोड़ने का दोष अप्रत्यक्ष रूप से राम ने अपने ऊपर किस प्रकार लिया?
उत्तर:
राम ने अपना नाम तो नहीं लिया, पर अप्रत्यक्ष रूप में कहा- हे भृगुपति मुनि शिवजी के धनुष को तोड़ने वाला तो आपका ही कोई एक दास होगा। यह कहकर उन्होंने यह जता दिया कि वे ही आपके दास हैं फिर उन्होंने पूछा कि बताइए मुझ दास के लिए आपकी क्या आज्ञा है? मैं आपकी हर इच्छा पूरी करूंगा।
प्रश्न 2.
परशुराम ने राम को क्या उत्तर दिया?
उत्तर:
परशुराम ने राम को उत्तर दिया- तुम स्वयं को सेवक बताते हो, पर सेवक तो वह होता है, जो सेवा करता है। शत्रुता करने वाले से सेवा नहीं ली जाती। बल्कि लड़ाई की जाती हैं, हे राम! सुनो, जिसने भी यह शिवधनुष तोड़ा है, वह सहस्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।
प्रश्न 3.
परशुराम ने यह कथन किसलए कहा- रे, नृप बालक कालबाण।
उत्तर:
परशुराम के यह कथन लक्ष्मण से इसलिए कहा क्योंकि लक्ष्मण ने जली-कटी बातें कहकर परशुराम के क्रोध को भड़का दिया था। उसे बड़बोला भी बताया था।
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Class 9 Hindi Chapter 9 Extra Question Answer for Practice
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
प्रश्न 1.
इस संवाद में श्रीराम का चरित्र चित्रण किस प्रकार किया गया है?
प्रश्न 2.
परशुराम के चरित्र की कौन-कौन सी विशेषताएँ इस संवाद में उभरकर आती हैं?
प्रश्न 3.
तुलसीदास ने इस संवाद में किन-किन मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है?
प्रश्न 4.
‘अरध निमेष कलप सम बीता’ – इस पंक्ति का आशय क्या है?
प्रश्न 5.
परशुराम का क्रोध अंत में किस प्रकार शांत हुआ?
प्रश्न 6.
परशुराम का पूरा नाम क्या है और वे किस कुल के ऋषि हैं?
प्रश्न 7.
‘चापखंड’ शब्द का क्या अर्थ है?
प्रश्न 8.
चित्र वर्णन : निम्न चित्र का 100 शब्दों में वर्णन कीजिए।
