Daily practice of Class 9 Hindi Important Questions and Class 9 Hindi Ganga Chapter 8 Extra Question Answer रैदास के पद builds a strong language foundation over time.
Class 9 Hindi रैदास के पद Extra Question Answer
Class 9 Hindi Chapter 8 रैदास के पद Extra Question Answer
रैदास के पद Extra Question Answer लघु उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
पहले पद में भगवान और भक्त की जिन-जिन चीजों से तुलना की गई है, उनका उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पहले पद में भगवान और भक्त की निम्नलिखित चीज़ों से तुलना की गई है-
भगवान की – भक्त की
1. चंदन से – पानी से
2. घन (बादल) से – मोर से
3. चाँद से – चकोर से
4. दीपक से – बत्ती से
5. मोती से – धागे से
6. सोने से – सुहागे से
प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) ऐसी लाल तुझ बिन कौन करे।
(ख) नीच हूँ ऊँच करै मेरा गोविंद काहू तै न डरें।
उत्तरः
(क) प्रभु ही सबका कल्याण कर्ता है। उसके अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं है, जो गरीबों, दीनों को ऊपर उठाने का काम करता है।
(ख) कवि ने प्रभु को पतित पावन और उद्धारक बताया है। वह निडर है। प्रभु ही नीच जाति के व्यक्ति को सम्मान प्रदान कर ऊँचा उठाता है।
प्रश्न 3.
चकोर पक्षी का उदाहरण कवि ने किस संदर्भ में दिया है?
उत्तरः
चकोर पक्षी अपने प्रिय चाँद की ओर निरंतर निहारता रहता है। यही दिशा भक्त की भी होनी चाहिए, उसे भी अपने प्रियतम प्रभु को चितवत (एकटक) निहारना चाहिए, तभी उसे प्रभु मिलते हैं।
![]()
पद
प्रश्न 4.
रैदास अपने पदों के द्वारा हमें क्या संदेश देना चाहते हैं?
उत्तरः
रैदास अपने पदों के द्वारा यह संदेश देना चाहते हैं कि प्रभु की भक्ति करने के लिए बाह्य आडंबरों का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं है। प्रभु तो समदर्शी है तथा गरीबों और निम्न कुल में जन्में लोगों के उद्धारकर्ता हैं। हमें उस पर पूरा विश्वास रखना चाहिए।
प्रश्न 5.
‘नीचहुँ ऊँच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै’ – का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कवि रैदास अपने गोविंद (प्रभु) के स्वभाव की विशेषता बताते हुए कहते हैं कि वह नीच कहे जाने वाले व्यक्तियों को अपनी कृपा से ऊँचा बना देता है अर्थात् समाज में उन्हें ऊँचा स्थान दिला देता है। वह सर्वथा निडर होता है। उसे किसी का भय नहीं होता।
प्रश्न 6.
‘गरीब निवाजु गुसईया’ की किस कृपा का वर्णन कवि ने किया है?
उत्तर:
‘गरीब निवाजु गुसईया’ में कवि अपने स्वामी की कृपा का वर्णन करता है। उसका स्वामी गरीबों पर कृपा करने वाला है, वह गरीबों पर दया करने वाला है। वह उनका उद्धार करता है।
प्रश्न 7.
रैदास के ‘लाल’ की क्या विशेषताएँ है?
उत्तर:
रैदास के लाल की यह विशेषता है कि गरीबों का उद्धार करने में सबसे आगे हैं। वे गरीबों निम्न जाति के लोगों को समाज में सम्मानजनक स्थान दिला देते हैं। इस कास में वे किसी से नहीं डरते।
प्रश्न 8.
रैदास ने प्रभु को चाँद और स्वयं को चकोर क्यों माना है?
उत्तरः
रैदास ने प्रभु को चाँद और स्वयं को चकोर माना है। इसका कारण यह है कि कवि रैदास अपने स्वामी को उसके प्रकार चितवत निहारता रहता है, जैसे चकोर पक्षी चाँद की ओर देखता रहता है। इससे कवि की एकनिष्ठता प्रकट होती है।
प्रश्न 9.
कवि रैदास नामदेव, कबीर, त्रिलोचन और सधना की चर्चा क्यों करते हैं?
उत्तर:
कवि रैदास इन संतों की चर्चा इसलिए करते हैं क्योंकि उसके स्वामी गोविंद ने इन सभी का उद्धार किया है। इसी प्रकार कवि अपना भी उद्धार कराना चाहता है।
प्रश्न 10.
‘ऐसी लाल तुझ बिनु’ पद में ईश्वर की क्या विशेषता बताई गई हैं?
उत्तर:
इस पद में ईश्वर की ये विशेषताएँ बताई गई हैं-
- वह गरीबों पर विशेष दया भाव दर्शाते हैं।
- वह गरीबों को समाज में सम्मान दिलवाते हैं।
- वह अछूतों से विशेष प्रेम करते हैं।
- वह नीच को भी ऊँचा बना देते हैं।
- वह किसी से भयभीत नहीं होते हैं।
प्रश्न 11.
रैदास ईश्वर के साथ किन-किन रूपों में एकाकार हो गए हैं?
उत्तर:
रैदास ईश्वर के साथ निम्नलिखित रूपों में एकाकार हो गए हैं-
- चंदन-पानी के रूप में
- घन-मोर के रूप में
- चाँद-चकोर के रूप में
- दीपक-बाती के रूप में
- धागा-मोती के रूप में
![]()
Class 9 Hindi Chapter 8 Extra Questions and Answers दीर्घ उत्तरीय प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1.
रैदास के पदों का केंद्रीय भाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
पुस्तक में रैदास के दो पद संकलित हैं। दोनों पदों में ईश्वर के गुणों का बखान किया गया है। कवि ने पहले पद में स्वयं को ईश्वर का दास बताते हुए ईश्वर को महान बताया है। कवि को रामनाम की रट लग गई है और वह अब छुटने वाली नहीं है। इस पद में प्रभु की चंदन, घन, दीपक, मोती आदि उपमाएँ दी गई हैं तथा स्वयं को पानी, मोर, बाती, धागा आदि बताया है। कवि प्रभु की ओर एकटक निहारते रहते हैं। दोनों में अद्वैतवाद का संबंध है।
दूसरे पद में कवि ने अपने प्रभु गरीब निवाज बताकर उसकी अपार महिमा का गुणगान किया है। वह नीच को भी ऊँचा बनाने की योग्यता रखता है। वह छुआछूत की भावना से परे है, परम कृपालु है उसका प्रभु निडर है।
प्रश्न 2.
रैदास के पदों की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः
रैदास ने अपने पदों में सरल व्यावहारिक ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में अवधी, राजस्थानी खड़ी बोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। रैदास को उपमा और रूप अलंकार विशेष रूप से प्रिय रहे हैं। रैदास ने अपने पहले पद में अनेक उपमाएँ। दी हैं। जैसे- घन मोरा, चंद चकोरा, दीपक बाती आदि। रैदास ने स्वयं को नाथपंथ की कठीन शब्दावली से बचार रखा है।
प्रश्न 3.
पद 2 में रैदास की भक्ति भावना का वर्णन कीजिए।
उत्तरः
पद 2 में रैदास की अटूट निष्ठा और विश्वासपूर्ण भक्ति प्रकट होती है। वे कहते हैं कि यदि प्रभु भी संबंध तोड़ दें, तो भी वे नहीं तोड़ेंगे। उनका पूरा भरोसा प्रभु के चरणों पर है और वे हर स्थान पर केवल प्रभु की ही पूजा करते हैं। वे अपना मन प्रभु से जोड़ते हैं और संसार के अन्य सभी संबंधों से विरक्त हो जाते हैं। यह भक्ति पूर्ण समर्पण, विश्वास और निष्ठा का उदाहरण है।
भाषा की बात
प्रश्न 1.
पहले पद की प्रत्यकक पंक्ति के अंत में तुकांत शब्दों के प्रयोग से नाद – सौंदर्य आ गया है, जैसे- पानी, समानी आदि। इस पद में से अन्य तुकांत शब्द छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
अन्य तुकांत शब्द

प्रश्न 2.
पहले पद में कुछ शब्द अर्थ की दृष्टि से परस्पर संबद्ध हैं। ऐसे शब्दों को छाँटकर लिखिए-
उत्तर:

प्रश्न 3.
पद 1 में रैदास ने भक्त और प्रभु के संबंध को कौन-कौन सी उपमाओं द्वारा व्यक्त किया है? किन्हीं तीन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
चंदन-पानी: प्रभु चंदन हैं, भक्त पानी – चंदन की सुगंध जैसे पानी में समा जाती है। घन-मोरः प्रभु बादल हैं, भक्त मोर – जैसे मोर बादल देखकर नाचता है। दीपक-बाती प्रभु: दीपक हैं, भक्त बाती – जिसकी ज्योति दिन-रात जलती रहती है।
यह भी जाने
रैदास का एक अन्य पद देखिए
ऐसी लाल तुझ बिनु कउन करै।
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै॥
जाकी छोति जगत कए लागै ता पर तुहीं ढरै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै।
नामदेव कबीरु तिलोचन सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुन रे संतहु हरिजीउ ते सधै सरै॥
शब्दार्थ
लाल = स्वामी, कउनु = कौन, गरीब निवाजु = दीन-दुखियों पर दया करने वाला, गुसईआ = स्वामी, गुसाई, माथै छत्रु धरे = मस्तक पर स्वामी होने का मुकुट धारण करता है।, छोति = छुआछूत, अस्पृश्यता, जगत कउ लागे = संसार के लोगों को लगती है, ता पर तुहीं ढरै = उन पर द्रवित होता है, नीचहु ऊच करै = नीच को भी ऊँची पदवी प्रदान करता है। नामदेव = महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध संत, इन्होंने मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में रचना की है, सधना = एक उच्च कोटि के संत जो नामदेव के समकालीन माने जाते हैं। सैनु = ये भी एक प्रसिद्ध संत हैं, आदि ‘गुरुग्रंथ साहब’ में संगृहीत पद के आधार पर इन्हें रामानन्द का समकालीन माना जाता है। तिलोचनु (त्रिलोचन) =
एक प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य, जो ज्ञानदेव और नामदेव के गुरु थे, हरिजीउ = हरि जी से, सर्भे सरै = सब कुछ संभव हो जाता है।
प्रसंग – प्रस्तुत पद निगुर्ण काव्यधारा के प्रमुख कवि रैदास द्वारा रचित है। इसे उनके पद संग्रह से लिया गया हैं। इस पद में कवि ने भगवान की अपान उदारता, कृपालुता और उनके समदर्शी स्वभाव का वर्णन किया है। उनकी मान्यता है कि भगवान ने कथित निम्न कुल में उत्पन्न भक्तों को भी सहज भाव से अपनाया है और उन्हें लोक में सम्माननीय स्थान दिलाया है।
व्याख्या – कवि रैदास कहते हैं- हे ईश्वर! आपके अतिरिक्त भक्त को इतना मान-सम्मान देने वाला और कोई नहीं है। अर्थात् नीची जाति में उत्पन्न होने के कारण समाज में तो आदर-सम्मान मिलना कठिन है पर ईश्वर के यहाँ जातिगत भेदभाव नहीं। वे सबके सम्मान की लाज रखते हैं। वे सबके स्वामी हैं, अतः गरीबों पर विशेष कृपा करते हैं। कवि कहते हैं कि दीनदयाल के कारण ही तुमने मेरे सिर पर छत्र धारण करा दिया है, अर्थात् तुम्हारी भक्ति के कारण ही समाज में मुझे सम्मान प्राप्त हुआ है।
सांसारिक लोग निम्न जाति में उत्पन्न मनुष्य के प्रति स्पर्श दोष मानते हुए उसे अछूत समझते हैं, परंतु ईश्वर ही एकमात्र ऐसा है जो उस पर भी प्रसन्न रहता है। ईश्वर निम्न जाति वाले को भी उच्च बना देता है, अर्थात् समाज में आदरणीय स्थान दिला देता है। उसे किसी का भय नहीं होता है। वह निम्न जाति वालों पर भी कृपा करता है। संत नामदेव भक्त कबीर, त्रिलोचन, साधना (सदना) तथा सैन आदि ईश्वर के भक्तगण सांसारिक बंध नों से मुक्त हो गए अर्थात् ईश्वर की कृपा से निम्न जाति में उत्पन्न लोग भी भवसागर से पार हो जाते हैं।
संत रैदास कहते हैं कि हे संतो! सुनो, ईश्वर ने सभी को समान बनाया है। उनका नाम स्मरण करने से सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
विशेष-
- ईश्वर के समदर्शी स्वभाव का वर्णन हुआ है।
- संत कवियों को उद्धृत करने में दृष्टांत अलंकार का प्रयोग हुआ है।
- अनेक स्थलों पर अनुप्रास अलंकार की छटा है- कौन करे, मेरे माथे सधना सैनु आदि में।
- रैदास की मूल भाषा ब्रज है, पर इसमें अवधी और उर्द शब्द (गरीब निवाजु) का भी प्रयोग हुआ है।
- लयात्मकता है।
![]()
Class 9 Ganga Chapter 8 Extra Question Answer अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
पद (1)
अब कैसे छूटै राम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक, हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती, हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी, हम दासा, ऐसी भगति करै रैदासा।
शब्दार्थ-रट – लगन। बास – सुगंध। मोरा – मोर। चितवत – टकटकी लगाकर देखना। चंद – चंद्रमा। ज्योति – प्रकाश रोशनी। घन-वन – गहरा जंगल। बरै – जलती रहती है। सोनहिं – सोने में। घन – बादल।
प्रसंग – प्रस्तुत पद संत कवि रैदास (रविदास) द्वारा रचित है। इस पद में उन्होंने अपनी प्रभुभक्ति के ढंग पर प्रकाश डाला है। प्रभु को सभी गुणों से सम्पन्न तथा स्वयं को दीन-हीन बताया गया है।
व्याख्या – संत रैदास कहते हैं- हे प्रभु! मुझे तो तेरे नाम की रट अर्थात् लगन लग गई है। यह लगन अब किसी भी प्रकार से नहीं छूट सकती है। हे प्रभु, तुम चंदन हो और मैं पानी हूँ अर्थात् जैसे पानी में घिसकर ही चंदन का रंग निखरता है, उसी प्रकार भक्तों की भक्ति से ही प्रभु का महत्त्व बढ़ता है। प्रभु के चंदन रूप की सुंगधि मेरे अंग-अंग में समा गई है। तात्पर्य यह है कि प्रभु के नाम की सुगंधि मेरे रोम-रोम में व्याप्त हो गई है। हे प्रभु! आप गहरे वन के समान हैं और मैं उसमें नाचने वाला मोर हूँ। अगर चाँद हैं तो मैं चकोर हूँ। जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा की ओर टकटकी लगाए हुए देखता रहता है।
उसी प्रकार मैं भी तुम्हारी ओर देखता रहता हूँ। हे प्रभु, तुम दीपक हो तो मैं उसमें जलकर रोशनी देने वाली बत्ती के समान हूँ। मैं बाती के समान तुम्हारे प्रेम में जलता रहता हूँ। उसी की ज्योति दिन-रात जलकर मेरे मन में प्रकाश देती रहती है। हे प्रभु, यदि आप मोती हो तो मैं उसे पिरोकर माला बनाने वाला धागा हूँ। मेरा तन-मन तुम्हारी चमक से ही प्रकाशित है। जैसे सोने में सुहागा मिलने से वह और भी चमक उठता और दोनों मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम्हें पाकर प्रभु मेरा जीवन भी निखर गया है। मैं आप में मिलकर एक हो गया हूँ। हे प्रभु आप स्वामी हैं, मैं आपका दास हूँ। संत रैदास कहते हैं कि मैं तो इसी प्रकार की भक्ति करता हूँ।
भावार्थ – भक्त और भगवान दो होते हुए भी एक होते हैं। सोने और सुहागे के समान तथा दीपक और बत्ती के समान एक-दूसरे का महत्त्व बढ़ाने वाले हाते हैं।
काव्य-सौंदर्य-
1. प्रस्तुत पद में ‘अद्वैतवाद’ स्पष्ट है। आत्मा परमात्मा का ही अंश है।
2. कवि ने अपने भाव को प्रकट करने के लिए अनेक उपमाएँ दी हैं।
3. कवि ने चंदन और पानी, घन वन और मोर, चंद्रमा और चकोर, दीपक और बाती, मोती और धागा, सोना और सुहागा आदि विविध उपादानों से अपनी अनन्य भक्ति को व्यक्त किया है।
4. सरल एवं सुबोध भाषा का प्रयोग हुआ है।
5. पद में लयात्मकता है।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
पहले पद में भगवान और भक्त की जिन-जिन चीज़ों से तुलना की गई है, उनका उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पहले पद में भगवान की तुलना निम्नलिखित चीजों से की गई हैं-
- चंदन से,
- घन (बादल से),
- चंद्रमा से,
- दीपक से,
- मोती से तथा,
- सोने से।
भक्त की तुलना निम्नलिखित चीजों से की गई है-
- पानी से,
- मोर से,
- चकोर से,
- बत्ती से,
- धागे से तथा,
- सुहागे से।
पद
प्रश्न 2.
इस पद में कवि रैदास अनेक वस्तुओं से प्रभु और अपनी तुलना करके क्या बात सिद्ध करनी चाही है?
उत्तर:
इस पद में कवि रैदास ने अपने प्रभु और अपने लिए अनेक से तुलना करके यह बात सिद्ध करनी चाही है कि भक्त और भगवान दो होते हुए भी मूलतः एक हैं। आत्म परमात्मा का ही अंश है। सभी रूपों में परमात्मा की ज्योति ही झलकती है।
पद (2)
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जीरौ।
तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हारे चरन कमल एक भरोसा।
जहँ जहाँ जाओ तुम्हारी पूजा, तुम सा देव और नहिं दूजा।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।
शब्दार्थ-तोरी – तुम्हारा। कवन – कौन। जोरी – जोड़ी। दूजा – दूसरा। सबन – सब। पहर – प्रहर। आसा – आशा। अंदेसा – भ्रम।
व्याख्या – इस पद में भक्त अपने प्रभु के प्रति गहरी श्रद्धा और पूर्ण समर्थन व्यक्त करता है। वह कहता है-
1. हे प्रभु, तुम भले ही मुझसे प्रीति करना छोड़ दो, किंतु मैं तुमसे प्रीति करना नहीं छोडूंगा।
2. मैं केवल तुम पर ही भरोसा करता हूँ और तुम्हारे चरणों को ही अपना सहारा मानता हूँ।
3. जहाँ-जहाँ मैं जाता हूँ वहाँ-वहाँ मैं तुम्हारी ही पूजा करता हूँ क्योंकि तुम जैसा कोई देव नहीं है।
4. भक्त अपने मन को हरि से जोड़ना चाहता है और संसार के मोह-माया से हटाकर भगवान में समाना चाहता है।
5. अंत में वह कहता है कि मुझे केवल तुमसे ही आशा है और मैं मन- कर्म और वचन से तुम्हारी भक्ति करता रहूँगा।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
कवि किसके साथ अपना संबंध जोड़ना चाहता है?
उत्तर:
कवि राम (भगवान) के साथ संबंध जोड़ना चाहता है। राम से संबंध तोड़कर भला वह कहाँ जाएगा। यहाँ राम से कवि का तात्पर्य भगवान से है। उसे तो उन्हीं के चरण कमलों का भरोसा है। वह अन्य किसी देवता की पूजा नहीं करता।
प्रश्न 2.
कवि रैदास की पूजा करने का ढंग क्या है?
उत्तर:
कवि कोई विशेष पूजा नहीं करता है वह तो जहाँ जहाँ जाता है, वहीं भगवान की पूजा हो जाती है क्योंकि भगवान तो सर्वत्र व्याप्त है। वह तीर्थ व्रत करने में विश्वास नहीं रखता। वह तो मन, वचन, कर्म से उसी हरि पूजा में रम जाता है, उसे अन्य किसी के पास जाने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती।
![]()
Class 9 Hindi Chapter 8 Extra Question Answer for Practice
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
प्रश्न 1.
रैदास ने सच्चे धर्म के बारे में क्या विचार व्यक्त किए हैं?
प्रश्न 2.
रैदास की भाषा – शैली कैसी है?
प्रश्न 3.
पद 1 में रैदास ने भक्त और भगवान के संबंध को कैसे व्यक्त किया है?
प्रश्न 4.
रैदास के पदों में प्रयुक्त उपमाओं का महत्व स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 5.
रैदास के पदों से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
प्रश्न 6.
रैदास के अनुसार सच्ची भक्ति का स्वरूप क्या है?