Daily practice of Class 9 Hindi Important Questions and Class 9 Hindi Ganga Chapter 4 Extra Question Answer ऐसी भी बातें होती हैं builds a strong language foundation over time.
Class 9 Hindi ऐसी भी बातें होती हैं Extra Question Answer
Class 9 Hindi Chapter 4 ऐसी भी बातें होती हैं Extra Question Answer
प्रश्न 1.
लताजी के मन में पिताजी की कौन-सी स्मृतियाँ अंत तक बनी रहीं?
उत्तर:
लताजी के पिता बहुत अनुशासन प्रिय थे। वे नियमों का पालन करते थे तथा करवाते थे।
लताजी ने बताया- मेरे पिताजी कमाल के आदमी थे, जिन्हें मैंने हमेशा अपने काम और संगीत में डूबा हुआ ही देखा। उनकी ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होते थे और देर रात दो से तीन बजे तक जाकर समाप्त होते थे। इतनी देर एक नाटक में समय इसलिए लगता था कि एक नाटक के पाँच अंक होते थे। फिर उसमें लंबी-लंबी रागदारी वाले गायन की भी परंपरा थी। एक बार पिताजी जब गाना शुरू करते थे, तो खूब सीटियाँ, तालियाँ और ‘वन्स मोर’ मिलता था। बाबा माइक पर थोड़ी तेज आवाज़ में गाते थे, जो सुनने पर बहुत अच्छा लगता था। मेरे पिताजी की एक बड़ी विशेषता यह भी थी कि वे एक राग को गाते हुए उसमें सुर बदलकर भी अपना गायन करते थे। मतलब एक राग गाते समय किसी भी सुर को ‘सा’ (षडज) बनाकर इस तरह राग को बदल देते थे कि वह कुछ नया हो जाता था और फिर उसी समय नए राग में गाते हुए दोबारा से पहले राग और उसके सुर में वापस लौट आते थे।
ऐसी भी बातें होती हैं ( लता मंगेशकर से साक्षात्कार)
प्रश्न 2.
लताजी के भाई बहन किस प्रकार फिल्मों की नकल उतारते थे?
उत्तर:
लताजी ने स्वयं बताया- उन दिनों फिल्में ही मनोरंजन का एक ऐसा माध्यम थीं जिनको देखकर बच्चे अपने ढंग से कुछ-कुछ करते रहते थे। मुझे याद है कि प्रभात फिल्म कंपनी की एक पिक्चर थी ‘संत तुकाराम’ फिल्म में दिखाया गया है कि तुकाराम सदेह बैकुंठ जाते हैं और उन्हें लेने ईश्वर का विमान आता है। वे यह गीत गाते हुए स्वर्ग जाते हैं-‘अमी जातो अमचा गावा, अमचा राम-राम ध्यावा’ (मैं अपने गाँव जा रहा हूँ। सभी लोग मेरा राम-राम ले लीजिए। हम कमरे में घर भर के गद्दे, तकिए एक के ऊपर एक रखकर ऊँचा स्वर्ग बनाते थे, जिस पर चढ़कर मैं बैठती थी और वहीं से यह गीत गाती थी। नीचे कमरे में मीना, मेरे फूफा का बेटा पंढरीनाथ और आशा, ये तीनों तुकाराम के अनुयायी बनकर रोते थे और कहते थे- ‘हमें भी साथ ले लीजिए। हमें भी साथ ले चलिए।’ (खिलखिलाकर हँसती हैं) उस समय उषा बहुत छोटी थी, इसलिए वह इन नाटकों में नहीं रहती थी तो यह सब होता था। हम बहुत सारी फिल्मों की नकल उतारते थे।
प्रश्न 3.
लताजी ने माता-पिता से क्या सीखा?
उत्तर:
लताजी ने पिताजी से स्वाभिमानपूर्वक जीना सीखा। पिताजी से गायन सीखा। काम में पूरी तरह डूबकर उसे पूरा करना सीखा। पिताजी से लताजी ने अपनी सही बात पर अंत तक खड़े रहना सीखा। माँ ने सिखाया कि कभी किसी के आगे हाथ मत पसारो।
प्रश्न 4.
बचपन में लताजी अपने पिताजी तथा अन्य कलाकारों को देखकर क्या सोचती थीं?
उत्तरः
लताजी ने बताया- मेरे पिताजी उस समय जीवित थे और जब वे अपने कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे, तो उनको जितने मेडल मिले थे, वे अपने कपड़ों पर सीने के बाईं तरफ लगाते थे। वह जमाना ऐसा था जिसमें यह प्रचलन रहा कि कलाकार लोग अपने प्रदर्शनों में मिले हुए मेडल पहनकर ही बैठते थे। मुझे जगह तो याद नहीं है, मगर यह ठीक से याद है कि पिताजी के अलावा बाहर के किसी कलाकार को जो सबसे पहले मैंने गाते हुए सुना है, वह पंडित कुमार गंधर्व थे। कुमार गंधर्व जी जब काली शेरवानी पहनकर और अपने ढेर सारे मेडल लगाकर गाने के लिए बैठे, तो वह बात मुझे बहुत पसंद आई। मुझे तब हमेशा यह लगता था कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मुझे भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे, तब मैं भी इन्हें लगाकर किसी कार्यक्रम में जाऊँगी।
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प्रश्न 5.
लताजी के समय में संगीतकार क्या विशेष बात करते थे?
उत्तरः
लताजी के समय में अनेक संगीतकार गानों में कुछ विशेष प्रभावों को देने के लिए अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सलिल चौधरी और सी. रामचंद्र ने कुछ नए तरीके और अजीबोगरीब टोटके आजमाए थे, जिनसे गीतों में वह प्रभाव पैदा हो सका। आज, जो स्थिति है और जिस तरह हमारी तकनीक विकसित हो चुकी है, उसमें अगर इन लोगों को काम करने का मौका मिलता तब तो कमाल ही हो गया होता, न जाने कितना और अधिक एडवांस किस्म का ये लोग संगीत रच पाते, आप सोच सकते हैं। ठीक उसी तरह, . जैसा सुंदर और स्तरीय संगीत आज के संगीतकार बना रहे हैं रहमान, जतिन-ललित और तमाम अन्य लोग अगर पीछे जाकर काम करते. तो कितनी मुश्किलें आतीं और कितना संघर्ष करते हुए वे सब अपना गाना बनाते इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है।
भाषा की बात
प्रश्न 1.
उपसर्ग – प्रत्यय
निम्नलिखित शब्दों में से उपसर्ग-प्रत्यय अलग-अलग करके लिखिए-
• होलिका
• अप्रतिम
• असंख्य
• बचपन
• गंभीरता
• स्वाभिमान
• विशेषता
• जीवित
उत्तरः
• होलिका = इका (प्रत्यय)
• अप्रतिम = अ (उपसर्ग)
• असंख्य = अ (उपसर्ग)
• बचपन = पन (प्रत्यय)
• गंभीरता = ता (प्रत्यय)
• स्वाभिमान = स्व (उपसर्ग), मान (प्रत्यय)
• विशेषता = वि (उपसर्ग), ता (प्रत्यय)
• जीवित = इत (प्रत्यय)
प्रश्न 2.
संज्ञा
वाक्यों में संज्ञा छाँटो तथा भेद बताओ।
(क) पं. दीनानाथ मिश्र संगीतकार थे।
(ख) वे गंभीरता से लेते थे।
(ग) पिकचर जी-संत तुकाराम।
उत्तरः
(क) पं. दीनानाथ मिश्र – व्यक्तिवाचक संज्ञा, संगीतकार – जातिवाचक संज्ञा,
(ख) गंभीरता – भाववाचक संज्ञा,
(ग) पिक्चर – जातिवाचक संज्ञा, संत तुकाराम – व्यक्तिवाचक संज्ञा।
प्रश्न 3.
सर्वनाम
सर्वनाम छाँटकर भेद बताओ।
(क) वे मेडल लगाकर आते थे।
(ख) बाहर कौन खड़ा है।
(ग) कोई गा रहा है।
उत्तरः
(क) वे – अन्यपुरुषवाचक सर्वनाम,
(ख) कौन – प्रश्नवाचक सर्वनाम
(ग) कोई – अनिश्चयवाचक सर्वनाम।
प्रश्न 4.
विशेषण के नीचे रेखा खींचो तथा भेद बताओ।
(क) पं. रविशंकर मधुर गाना गाते थे।
(ख) अली अहमद ने तीन गाने गाए।
उत्तरः
(क) मधुर – गुणवाचक विशेषण,
(ख) तीन – संख्यवाचक विशेषण।
प्रश्न 5.
क्रिया
क्रिया पहचानो, भेद बताओ।
(क) मुझे मेडल मिला।
(ख) मैं रोने लगी।
(ग) पिताजी ने मुझसे गाना गववाया।
उत्तर :
(क) मिला – सकर्मक क्रिया (मेडल-कर्म), (ख) रोने लगी – अकर्मक क्रिया, (ग) गववाया – प्रेरणार्थक क्रिया।
प्रश्न 6.
अर्थ के आधार पर वाक्य भेद बताइए।
(क) अरे! आप भी गाते हैं।
(ख) मैं नहीं गा सकती हूँ।
(ग) हम गुड़ि की पूजा करते हैं।
(घ) आप शीघ्र चले जाएँ।
उत्तर:
(क) विस्मयसूचक वाक्य,
(ख) निषेधवाचक वाक्य,
(ग) विधानवाचक वाक्य,
(घ) आज्ञावाचक वाक्य।
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Class 9 Ganga Chapter 4 Extra Question Answer अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न
गद्यांश (1)
मैंने शुरू में तो फिल्मों में काम ही किया था और कुल छह या सात फिल्मों में किया था। मैं बहुत छोटी थी उस समय, जब फिल्मों की दुनिया में अभिनय के मार्फत ही आई। मुझे कभी अच्छा नहीं लगा मेकअप करना, लाइट के सामने जाना और काफी लोग खड़े हैं, तो उनके सामने कभी रो रहे हैं और कभी हँस रहे हैं। गा भी रहे हैं। मुझे वह कभी अच्छा नहीं लगा। अच्छी फिल्मों को देखकर सराहने का जी जरूर करता है, मगर अभिनय करने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। एक फिल्म हमारे यहाँ हिंदी और मराठी दोनों में बनी थी ‘छत्रपति शिवाजी’। उसमें भालजी पेंढारकर थे जिन्हें मैं बाबा कहती थी। मैं उनके पास गई, हालाँकि उस वक्त तक मैंने अभिनय का काम छोड़ दिया था। मैंने उनको खुद कहा – ‘बाबा मैं चाहती हूँ कि इस फिल्म का आखिर का जो गाना है, उसमें दो लाइनें मैं भी आकर गाऊँ।’ तो फिर मैंने उसके हिंदी और मराठी, दोनों ही संस्करणों में बाद की कुछ पंक्तियाँ गाई हैं, जिन दृश्यों में मैं मौजूद भी हूँ। मैं छत्रपति शिवाजी को बहुत पसंद करती हूँ।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
लताजी फिल्मी दुनिया में कैसे आई थीं?
उत्तर:
लताजी फिल्मी दुनिया में अभिनय के माध्यम से ही आई थीं, गायन तो बाद में शुरू हुआ।
प्रश्न 2.
लताजी बाबा के पास क्यों गई?
उत्तर:
बाबा (भालजी पेंढारकर) ने एक फिल्म बनाई थी- छत्रपति शिवाजी। लताजी उस फिल्म के अंतिम गाने की दो पंक्तियाँ गाना चाहती थी। इसीलिए वे बाबा के पास गई। बाद में उन्होंने फिल्म के हिंदी और मराठी संस्करणों में वे पंक्तियाँ गाई।
गद्यांश (2)
ऐसा कोई सपना तो खास नहीं है, मगर आपको बचपन की एक बात बताती हूँ। मेरे पिताजी उस समय जीवित थे और जब वे अपने कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे, तो उनको जितने मेडल मिले थे, वे अपने कपड़ों पर सीने के बाईं तरफ लगाते थे। वे जमाना ऐसा था, जिसमें यह प्रचलन रहा कि कलाकार लोग अपने प्रदर्शनों में मिले हुए मेडल पहनकर ही बैठते थे। मुझे जगह तो याद नहीं है, मगर यह ठीक से याद है कि पिताजी के अलावा बाहर के किसी कलाकार को जो सबसे पहले मैंने गाते हुए सुना है, वह पंडित कुमार गंधर्व थे। कुमार गंधर्व जी जब काली शेरवानी पहनकर और अपने ढेर सारे मेडल लगाकर गाने के लिए बैठे, तो वह बात मुझे बहुत पसंद आई। मुझे तक हमेशा यह लगता था कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मुझे भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे, जिसे लगाकर किसी कार्यक्रम में जाऊँगी।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
कार्यक्रम में जाते समय लताजी के पिता क्या करते थे?
उत्तरः
कार्यक्रम जाते समय लताजी के पिता अपने कपड़ों पर बाईं ओर उन मंडलों को लगाते थे जो उन्हें प्रशंसा स्वरूप मिले थे।
प्रश्न 2.
कार्यक्रम के दौरान लताजी को क्या लगता था?
उत्तरः
कार्यक्रम के दौरान लताजी को लगता था कि वह बड़ी होकर उन्हें मिले मेडलों को अपने कपड़ों पर लगाकर जाया करेंगी।
गद्यांश (3)
यह बहुत पहले की बात है, जब मेरे पिताजी जीवित थे। आजकल तो मैंने होली खेलना ही बंद कर दिया है। पहले सारा दिन रंग खेलना और भीगना और बाद में जाकर देर शाम तक नहाना, अब यह सब सालों से अच्छा नहीं लगता है। यह जो होली पूरे देश में प्रचलित है, हम उसे होली की तरह नहीं मनाते थे। मेरा मतलब यह है कि होली के एक दिन पहले जब होली जलाते हैं और उस समय होलिका की पूजा होती है, उसमें जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, उन तमाम तरह की मिठाइयों को होलिका में डालते हैं। नारियल भी होलिका में आखिरी में जलाया जाता है, जिसे जल जाने के बाद आग से निकालकर उसे तोड़कर प्रसाद लेते हैं। वह जो राख बनती है, उसे उठाकर दूसरे दिन एक-दूसरे पर डालते हैं। इसे हम लोग ‘गुड़वड़’ कहते हैं। होली के बाद पाँचवें दिन रंग पंचमी आती है, उस दिन मेरी माँ और पिताजी हम सब भाई-बहनों पर केसर घोलकर थोड़ा छिड़कते थे। माँ घर में कुछ मीठा बनाती थीं, जो भगवान को चढ़ाकर हमें प्रसाद में खाने को मिलता था। हम सभी की अलग-अलग आरतियाँ भी माँ उतारती थीं और इस तरह हमारे घर में बचपन में होली का त्योहार मनता था। यह होली जो आजकल प्रचलित है, इसका कोई प्रभाव हमारे घर में नहीं था।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
लताजी के घर में होली मनाने का ढंग क्या होता था?
उत्तरः
लताजी के घर में एक दिन पहले होली जलाई जाती थी। इसे ‘होलिका’ कहते थे। होलिका की पूजा की जाती थी। आखिर में नारियल जलाया जाता था। नारियल के जल जाने के बाद उसे तोड़कर प्रसाद के रूप में बाँटा जाता था।
प्रश्न 2.
रंग पंचमी कब और कैसे मनाई जाती थी?
उत्तरः
रंग पंचमी को होली के पाँचवें दिन मनाया जाता था। माँ-पिताजी बच्चों पर केसर घोलकर छिड़कते थे। माँ घर में कुछ मीठा बनाकर भगवान को चढ़ाती थी। वही प्रसाद के रूप में सभी को खाने को मिलता था। आरतियाँ भी उतारी जाती थीं।
गद्यांश (4)
हमारे यहाँ होली और दीवाली पर तो इस तरह घरों में गीत नहीं होते। यह जरूर है कि विवाह के बाद जब नई बहू घर में आती है, तब एक पूजा होती है घरों में, जिसमें पास-पड़ोस की बहुत सारी औरतें आती हैं। यह मंगलागौर कहलाता है। सारी औरतें बिल्कुल मुग्ध भाव से गीत गाती हैं और नाचती भी हैं। बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर आहिस्ता आहिस्ता वह भी अब खत्म हो रहा है। मुझे अच्छी तरह से याद है; जब मैं बहुत छोटी थी, तब घर-परिवार या पड़ोस में किसी की भी शादी के बाद यह मंगलागौर मनाया जाता था और हम सभी लोग उसमें ‘खूब नाचते-गाते थे। उनमें स्त्रियाँ नौटंकी और तमाशा की तरह भी कुछ-कुछ करती थीं। मतलब कोई कुछ भी रूप धरकर नाचता था।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
‘मंगलागौर’ कब और कैसे होता था?
उत्तरः
घर में नई बहू के आगमन पर पास-पड़ोस की औरतें मिलकर मंगलागौर मनाती थी। तब पूजा होती थी, नाच-गाना होता था। ये सब गँवई अंदाज़ में।
प्रश्न 2.
नौटंकी क्या होती है?
उत्तर:
नौटंकी में स्त्रियाँ तरह-तरह का रूप धारण करती हैं और तमाशे की तरह कुछ-कुछ करती हैं। इसमें खूब नाच-गाना होता है।
गद्यांश (5)
हमारे यहाँ दशहरा और दीवाली का ज्यादा महत्व था। नवरात्रि भी बहुत धूमधाम के साथ हम लोगों के यहाँ मनती है। नवरात्रि के पहले दिन हम ‘गुड़ि पड़वा’ मनाते हैं, जिसका विशेष महत्व है। इसमें हम घर में बाहर ‘गुड़ि’ बाँधते हैं और कलश स्थापना करते हैं। सूर्योदय के समय ही ‘गुड़ि’ पर बताशों की माला या हार बनाकर चढ़ाई जाती है, जिसे सूर्यास्त होने तक उतार लिया जाता है और प्रसाद के रूप में घर के सभी सदस्य उसे लेते हैं। यह एक बहुत महत्वपूर्ण आयोजन है। हमारी तरफ और ऐसी मान्यता है कि भगवान राम चौदह वर्ष बाद जब अयोध्या लौटे थे, तो हर घर में ऐसे ही बताशों की लड़ी सजाकर ‘गुड़ि’ बाँधी गई थी। महाराष्ट्र में ऐसा ही कहा जाता है। पहले दिन ‘गुड़ि’ बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है, जिसके अंत में नवमी पर राम जी के जन्म की तिथि रामनवमी आती है।
लघुत्तरात्मक प्रश्न
प्रश्न 1.
‘गुड़ि पड़वा’ कब और कैसे मनाई जाती है?
उत्तर:
‘गुड़ि पड़वा’ नवरात्रि से एक दिन पहले मनाई जाती है। इस दिन घर के बाहर ‘गुड़ि’ बाँधते हैं और कलश की स्थापना करते हैं। सूर्योदय के साथ ही बताशों का हार गुड़ि को पहनाया जाता है। सूर्यास्त होने तक इसे उतार लिया जाता है, फिर इन्हीं बताशे का प्रसाद बाँट दिया जाता है।
प्रश्न 2.
महाराष्ट्र के गुड़ि बाँधने के बाद क्या होता है?
उत्तर:
गुड़ि बाँधने के बाद नौ दिनों तक उत्सव मनाया जाता है। इसके अंत में रामनवमी मनाई जाती है।
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Class 9 Hindi Chapter 4 Extra Question Answer for Practice
निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए-
प्रश्न 1.
लता जी ने अपने पिता दीनानाथ मंगेशकर के बारे में क्या यादें साझा कीं?
प्रश्न 2.
‘ऐसी भी बातें होती हैं’ पाठ में ‘सेतु चित्र’ का क्या महत्व है?
प्रश्न 3.
लता मंगेशकर को किस उक्ति से जाना जाता है?
प्रश्न 4.
पाठ के आधार पर लता मंगेशकर के व्यक्तित्व की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
प्रश्न 5.
साक्षात्कार में संगीत से जुड़ी कौन-सी महत्वपूर्ण बातें सामने आती हैं?
चित्र वर्णन करो
प्रश्न 1.

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